Wednesday, October 10, 2012

""कान्हा जी हमे अपनी पायल नही तो
पायल का एक घुँघरू ही बना लो
और उसे अपने चरणकमलों से लगा लो

कान्हा जी हमे अपने कंगन नही तो
कंगन में जड़ा हुआ एक पत्थर ही बना दो
और उसे अपनी प्यारी कलाईयों में सजा लो
कान्हा जी हमे अपनी मुरली नही तो
अपनी मुरली की कोई धुन ही बना लो
और उसे अपने अधरों से इक बार तो बजा लो
कान्हा जी और कुछ नही तो अपने
चरणों की धूल ही बना लो
वो चरणधूल फिर ब्रज में उड़ा दो
सच कहूँ मेरे कान्हा जी देखना फिर
चरणों की धूलकण बन कैसे इतराऊँ मै.....""

ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है
यहां सर दे के होते हैं सौदे, आशिकी इतनी सस्ती नहीं है
प्रेम वालों ने कब वक्त पूछा
उनकी पूजा में, सुन ले ऐ उद्धव
यहां दम दम में होती है पूजा

सर झुकाने की फुर्सत नहीं है

ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है !!

जो असल में हैं मस्ती में डूबे

उन्हें क्या परवाह ज़िंदगी की

जो उतरती है, चढ़ती है मस्ती

वो हकीकत में मस्ती नहीं है

ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है !!

जिसकी नज़रों में हैं श्याम प्यारे

वो तो रहते हैं जग से न्यारे

जिसकी नज़रों में मोहन समाये

वो नज़र फिर तरसती नहीं है

ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है !!

यहां सर दे के होते हैं सौदे, आशिकी इतनी सस्ती नहीं है

!!!!!!!!!!!!! HARE KRISHNA!!!!!!

Friday, September 28, 2012

भाद्रमास मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी अनन्त चतुर्दशी के रूप में मनाई जाती है। इस दिन भगवान अनन्त की पूजा की जाती है। इस दिन महिलाएं सौभाग्य की रक्षा एवं सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं। दस दिवसीय गणेशोत्सव की समापन भी इसी दिन होता है। इस बार अनन्त चतुर्दशी का पर्व 29 सितंबर, शनिवार को है।

व्रत विधि

इस दिन व्रती (व्रत करने वाला) को सुबह व्रत के लिए संकल्प लेना चाहिए व भगवान विष्णु की पूजा करना चाहिए। भगवान विष्णु के सामने 14 ग्रंथियुक्त अनन्त सूत्र (14 गांठ युक्त धागा, जो बाजार में आसानी से मिल जाता है) को रखकर भगवान विष्णु के साथ ही उसकी भी पूजा करनी चाहिए। पूजा में रोली, मोली, चंदन, फूल, अगरबत्ती, धूप, दीप, नैवेद्य आदि का प्रयोग करना चाहिए और प्रत्येक को समर्पित करते समय ऊँ अनन्ताय नम: का जप करना चाहिए।

पूजा के बाद यह प्रार्थना करें-

नमस्ते देवदेवेशे नमस्ते धरणीधर।

नमस्ते सर्वनागेंद्र नमस्ते पुरुषोत्तम।।

न्यूनातिरिक्तानि परिस्फुटानि

यानीह कर्माणि मया कृतानि।

सर्वाणि चैतानि मम क्षमस्व

प्रयाहि तुष्ट: पुनरागमाय।।

दाता च विष्णुर्भगवाननन्त:

प्रतिग्रहीता च स एव विष्णु:।

तस्मात्तवया सर्वमिदं ततं च

प्रसीद देवेश वरान् ददस्व।।

प्रार्थना के पश्चात कथा सुनें तथा रक्षासूत्र पुरुष दाएं हाथ में और महिलाएं बाएं हाथ में बांध लें। रक्षासूत्र बांधते समय इस मंत्र का जप करें-

अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान् समभ्युद्धर वासुदेव।

अनन्तरूपे विनियोजितात्मामाह्यनन्तरूपाय नमोनमस्ते।।

इसके बाद ब्राह्मण को भोजन कराकर व दान देने के बाद स्वयं भोजन करें। इस दिन नमक रहित भोजन करना चाहिए।



Tuesday, September 25, 2012

भादौ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी, जयझूलनी, वामन, डोल ग्यारस व अन्य कई नामों से जाना जाता है। इस बार यह एकादशी 26 अगस्त, बुधवार को है। परिवर्तिनी एकादशी के व्रत की विधि इस प्रकार है-

परिवर्तिनी एकादशी व्रत का नियम पालन दशमी तिथि (25 सितंबर, मंगलवार) की रात्रि से ही शुरु करें व ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनकर भगवान वामन की प्रतिमा के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें। इस दिन यथासंभव उपवास करें। उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करें संभव न हो तो एक समय फलाहारी कर सकते हैं।

इसके बाद भगवान वामन की पूजा विधि-विधान से करें।(यदि आप पूजन करने में असमर्थ हों तो पूजन किसी योग्य ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं।) भगवान वामन को पंचामृत से स्नान कराएं। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़कें और उस चरणामृत को पीएं। इसके बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित करें।

विष्णु सहस्त्रनाम का जप एवं भगवान वामन की कथा सुनें। रात को भगवान वामन की मूर्ति के समीप हो सोएं और दूसरे दिन यानी द्वादशी के दिन वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करें। जो मनुष्य यत्न के साथ विधिपूर्वक इस व्रत को करते हुए रात्रि जागरण करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट होकर अंत में वे स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवणमात्र से वाजपेई यज्ञ का फल प्राप्त होता है।


Monday, September 24, 2012

प्यारा सा मुखड़ा, घुंगराले केश
कलयुग का राजा खाटू नरेश
हारे का सहारा है मेरा श्याम धणी
भक्तों का रखवाला है मेरा श्याम धणी
बन सवर के बैठा यह तो दरबार अपना लगा के
देख लो करिश्मा इसके चरणों में सर को झुका के
!! जय श्री श्याम !!! जय श्री श्याम !!
 


Sunday, September 23, 2012

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को श्रीराधाजन्माष्टमी का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इसी दिन श्रीकृष्णप्रिया श्रीराधिकाजी का जन्म वृषभानुपुरी नामक नगर में हुआ था। धर्म शास्त्रों के अनुसार वृषभानुपुरी के राजा वृषभानु शास्त्रों के ज्ञाता तथा श्रीकृष्ण के आराधक थे। उनकी पत्नी श्रीकीर्तिदा के गर्भ से भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मध्याह्न काल में श्रीराधिकाजी का जन्म हुआ था। इस बार यह पर्व 23 सितंबर, रविवार को है।

व्रत विधान

श्रीराधाजन्माष्टमी के दिन व्रत रखकर उनकी पूजा करें। श्रीराधाकृष्ण के मंदिर में ध्वजा, पुष्पमाला, वस्त्र, तोरण आदि अर्पित करें तथा श्रीराधाकृष्ण की प्रतिमा को सुगंधित पुष्प, धूप, गंध आदि से सुसज्जित करें। मंदिर के बीच में पांच रंगों से मंडप बनाकर उसके अंदर सोलह दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं। उस कमलयंत्र के बीच में श्रीराधाकृष्ण की युगल मूर्ति पश्चिम दिशा में मुख कर स्थापित करें तत्पश्चात अपनी शक्ति के अनुसार पूजा की सामग्री से उनकी पूजा अर्चना कर नैवेद्य चढ़ाएं। दिन में इस प्रकार पूजा करने के पश्चात रात में जागरण करें। जागरण के दौरान भक्तिपूर्वक श्रीकृष्ण व राधा के भजनों को सुनें।

शास्त्रों के अनुसार जो मनुष्य इस प्रकार श्रीराधाष्टमी का व्रत करता है उसके घर सदा लक्ष्मी निवास करती है। यह व्रत सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला है। जो भक्त इस व्रत को करते हैं उसे विष्णुलोक में स्थान मिलता है।

राधा न होती तो कुंज गली भी
ऐसी निराली न होती
राधा के नैना न रोते तो
जमुना ऐसी काली न होती
सावन तो होता जुले न होते

राधा के संग नटवर जुले ना होते
सारा जीवन लूटन के वोह भीखारन
धनिकों की राजधानी हो गयी
राधा ऐसी भाई श्याम की…

भाद्र मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को कृष्ण प्रिया राधाजी का जन्म हुआ था,अत: यह दिन राधाष्टमी के रूप में मनाया जाता है।

बरसाना को राधा जी की जन्मस्थली माना जाता है।

बरसाना मथुरा से 50 कि.मी. दूर उत्तर-पश्चिम में और गोवर्धन से 21 कि.मी. दूर उत्तर में स्थित है। यह भगवान श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा जी की जन्म स्थली है। यह पर्वत के ढ़लाऊ हिस्से में बसा हुआ है। इस पर्वत को ब्रह्मा पर्वत के नाम से जाना जाता है।

बरसाना में राधा-कृष्ण भक्तों का सालों भर तांता लगा रहता है। श्रद्धालु इस दिन बरसाना की ऊँची पहाड़ी पर स्थित गहवर वन की परिक्रमा करते हैं तथा लाडली जी राधारानी के मंदिर में दर्शन कर खुशी मनाते हैं।

दिन के अलावा पूरी रात बरसाना में गहमागहमी रहती है। विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन किए जाते हैं।
ब्रज भूमि पर ही भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था और यहीं पर उन्होंने अपना यौवन बिताया।

जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो ! मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो !!

तन्हाई की कब्रों में अब,दफ़्न हुए सारे अरमां !
दम निकले उसकी चरणों में,घर में जिसके राधा पूजा हो !

जीवन के धुंधले दर्पण में ,पास न कोई दूजा हो !
मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो !!

पंकज पथिक प्रेम का मारा,अथाह नीर में कुम्हलाया !
नैवेद्य- पात्र में उसे सजा लो,जब भी कोई राधा पूजा हो !

जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !
मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो !!

अस्तित्व हीन पंकज पूजा बिन,पंकज बिन सूनी पूजा !
खो जाओ एक दूजे में तुम,जहाँ भी पावन राधा पूजा हो !

जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !
मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो !!

कीचड़ का मै रहने वाला,तूं है प्रमाणशासनेश्वरी !
एक राह के दोनों राही,तुम ही तो मेरी पूजा हो !

जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !
मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो !!

प्रेम राग हर दिशि में गूंजे,हो जाये जग मतवाला !
“राह” की बस अर्ज़ यही है,घर-घर प्रेम की पूजा हो !

जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !
मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो_______

Friday, September 21, 2012

"ये जीवन समर्पित,चरण में तुम्हारे"|
"हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणों में"
..
अपने चरणों की रज , सावरे दीजिये ,,,
जिंदगी ये हमारी ,सवर जायेगी ...

लाख अवगुण भरे है ,गिनाये तो क्या ..
शर्म खुद पर बहुत है , बताये तो क्या ...
माफ़ गर ना करोगे ,दयालु हमे ..
जिंदगी ये हमारी , बिखर जायेगी ..
अपने चरणों ....

आप दाता दयावान दानी बड़े ...
कितने पापी चरण राज को पाकर तरे ...
महिमा चरणों की , भगवन है मालुम हमें ..
राह सत्संग की , हमको भी मिल जायेगी ..
अपने चरणों ...

अब निभालो निभालो , कन्हैया हमे ...
अपने चरणों से ,अब तो लगालो हमे ...
'नन्दू' वादा करे सावरे हम खड़े ..
उम्र दर पे तुम्हारे गुजर जायेगी ...
अपने चरणों .

Monday, September 17, 2012

श्री राधे तेरी चोखट पे आ के
हम सारा जमाना भूल गए !
इस दिल को सुकून कुछ ऐसा मिला
हम सर को झुकाना भूल गए !
आये हे दर तेरे राधे ,दीदार की हसरत को लेकर
जब देखा मोहनी मुकुट को ,हम होश में आना भूल गए
जय श्री राधे कृष्ण


श्याम ही पूजा मेरी, श्याम ही प्रार्थना,
श्याम ही बंधन मेरा, श्याम ही आराधना,
मेरी आँखो में तू है, मेरी सांसो में तू है
और कुछ ना बोलूं, बस इतना ही बोलूं,
दिलमे तू बसता है, बाबा मै क्या करू ,
अपना तू लगता है, बाबा मै क्या करू
जय श्री श्याम.....


Saturday, September 15, 2012

शास्त्रों के अनुसार तुलसी का पौधा पवित्र और पूजनीय माना गया है। जिन लोगों के घर में तुलसी का पौधा होता है उन्हें कई प्रकार के चमत्कारी फायदें प्राप्त होते हैं।

 तुलसी को संजीवनी बूटी भी कहा जाता है। इसका उपयोग कई प्रकार की औषधियों में किया जाता है।


तुलसी के पत्ते भोजन को शुद्ध और पवित्र करते हैं। इसीलिए सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण के समय भोजन में तुलसी के पत्ते डालें जाते हैं।

शास्त्रों के अनुसार इंसान की मृत्यु के बाद शव के मुख में तुलसी के पत्ते डाले जाते हैं। इस संबंध में ऐसा माना जाता है कि इससे मृत व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है।

तुलसी घर-आंगन में होने से वातावरण शुद्ध और पवित्र बना रहता है। इस पौधे से कई प्रकार के वास्तु दोष भी समाप्त हो जाते हैं।



जिस घर में तुलसी का पौधा होता है वहां सभी देवी-देवताओं की कृपा बरसती है। घर-परिवार के सदस्यों की नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा होती है।



लसी के पौधे में प्रतिदिन पानी देने और उसकी कांट-छांट करने, उसका ध्यान रखने से त्वचा संबंधी कई बीमारियां में लाभ होता है।



तुलसी के पत्तों को दांतों से चबाकर नहीं खाना चाहिए, बल्कि उसे निगल लेना चाहिए। तुलसी के पत्तों में एक विशेष प्रकार का अम्ल होता है जो कि हमारे दांतों के लिए अच्छा नहीं होता।



पानी में तुलसी के पत्ते डालकर पीने से पानी एक टॉनिक का काम करता है। इससे कई प्रकार के रोगों में राहत मिलती है।


बिना उपयोग तुलसी के पत्ते कभी नहीं तोडऩा चाहिए। ऐसा करने पर व्यक्ति को दोष लगता है। अनावश्यक रूप से तुलसी के पत्ते तोडऩा तुलसी को नष्ट करने के समान माना गया है।

Friday, September 14, 2012

नादान हैं ,अनजान हैं,श्याम तू ही मेरा भगवन हे
तुझे चाहूँ ,तुझे पाऊ ,मेरे दिल का यही अरमान हे
पढ़ ले श्याम -दिल की पढ़ ले,पढले सब लिखा हे इन आँखों में
मुझे आस हे ,विश्वास हे ,श्याम भर देगा दामन तू मेरा
झूमे रे श्याम 'निक्स ' झूमे ,झूमे ,झूमे तेरी बाँहों में

जय श्री श्याम

बंसी की धुन पे नाची रे राधा हो के दीवानी,
काहना के रंग रच गयी राधा रानी।
किसना के तन मन बस गयी रे राधा हो के दीवानी॥

मोहन के नैनो में भरी मधुशाला।
दो घुट आँखो से पी गयी रे, राधा हो के दीवानी॥

गिरधर मुरारी का चंदा सा मुखड़ा।
देखा तो सुध बुध खो गयी रे, राधा हो के दीवानी॥

मोर मुकुट धर सांवर सांवरिया।
बांकी सी चित हर गयी रे, राधा हो के दीवानी॥

माधव के माथे पे लत घुंघराली।
घुंघराली लत में सिमट गयी रे राधा हो गयी दीवानी

Wednesday, September 12, 2012

पुराने समय से ही हिन्दू धर्म में तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना जाता है। घर के आंगन में तुलसी का पौधा हो तो घर का कलह और अशांति दूर होती है। इसके साथ ही तुलसी का पौधा होने पर घर-परिवार में महालक्ष्मी की विशेष कृपा भी रहती है। शास्त्रों में भगवान विष्णु और तुलसी के विवाह का वर्णन मिलता है। इस कारण तुलसी को विष्णुप्रिया भी कहा जाता है।'


तुलसी का पौधा पूज्य और पवित्र तो है साथ ही इसमें कई आयुर्वेदिक गुण भी हैं। तुलसी के औषधीय गुणों से कफ आदि रोगों में बचाव हो जाता है।


शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसलिए तुलसी के पत्तों का सेवन प्रतिदिन करना चाहिए। तुलसी के पत्तों का सेवन करने का भी एक खास तरीका है। इस तरीके से ही तुलसी का सेवन करना चाहिए अन्यथा इसके बुरे प्रभाव का सामना करना पड़ सकता है।


शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसलिए तुलसी के पत्तों का सेवन प्रतिदिन करना चाहिए। तुलसी के पत्तों का सेवन करने का भी एक खास तरीका है। इस तरीके से ही तुलसी का सेवन करना चाहिए अन्यथा इसके बुरे प्रभाव का सामना करना पड़ सकता है।


तुलसी के पत्तों में पारा धातु भी विद्यमान होती है जो कि पत्तों को चबाने से दांतों पर लगती है। यह हमारे दांतों के लिए फायदेमंद नहीं है। इससे दांत और मुंह से संबंधित रोग का खतरा बना रहता है। अत: तुलसी के पत्तों को बिना चबाए निगलना चाहिए।

Tuesday, September 11, 2012

त्रेतायुग में मयार्दापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने बतौर राजा जिस तरह शासन व्यवस्था स्थापित की, वह आज भी रामराज्य नाम से भगवान राम की तरह ही आदर्श व लोकप्रिय है। यह शासन व्यवस्था खुशहाल जीवन का भी आदर्श बन गई। यही वजह है कि व्यावहारिक तौर पर परिवार, समाज या राज्य में सुख और सुविधाओं से भरी व्यवस्था के लिए आज भी इसी रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है।

अक्सर जिस रामराज्य को केवल सुख-सुविधाओं का पर्याय माना जाता है। असल में, वह केवल सुविधाओं के नजरिए से ही नहीं बल्कि उसमें रहने वाले नागरिकों के साफ-सुथरे आचरण, व्यवहार, सोच और मर्यादाओं के पालन की वजह से भी श्रेष्ठ शासन व्यवस्था थी।





शास्त्रों के मुताबिक रामराज्य से जुड़ी कुछ खास बातें, जो धर्म के पैमाने पर आदर्श और हर काल में अपनाने के लिए बेहतर हैं, किंतु कलियुग में हावी अधर्म से या यूं कहें कि आज के भागदौड़ भरे जीवन में धर्म से बनी दूरी से हैरान करने वाली भी लगती हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने स्वयं रामचरित मानस में कहा है - दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहहिं काहुहि ब्यापा।। इस चौपाई के मुताबिक राम राज्य में शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक तीनों ही दु:ख नहीं थे।


(1)मान्यता यह भी है कि पर्वतों ने अपनी सभी संपत्ति, मणि आदि और सागर ने रत्न, मोती रामराज्य के लिए दे दिए। इसलिए वहां के नागरिक शौक-मौज के जीवन की लालसा नहीं रखते थे बल्कि कर्तव्य परायण और संतोषी थे। (2)रामराज्य में कोई भी गरीब नहीं था। रामराज्य में कोई मुद्रा भी नहीं थी। माना जाता है कि सभी जरूरत की चीजों का बिना कीमत के लेन-देन होता था। अपनी जरूरत के मुताबिक कोई भी किसी भी वस्तु को ले सकता था। इसलिए बंटोरने की लालसा रामराज्य के लोगों में नहीं थी। (3) राम राज्य में रहने वाला हर नागरिक उत्तम चरित्र का था। (4)सभी नागरिक आत्म अनुशासित थे, वे शास्त्रो व वेदों के नियमों का पालन करते थे,जिससे वह सेहतमंद व निडर रहने के तनाव, शोक व हर परेशानियों से दूर रहते थे। (5)सभी नागरिक बुरी आदतों और विकारों से यानी वह काम, क्रोध व मद से दूर थे। (6) नागरिकों का एक-दूसरे के लिए ईर्ष्या या शत्रु भाव नहीं था। इसलिए सभी को एक-दूसरे से अपार प्रेम भी था। (7) सभी नागरिक विद्वान, शिक्षित, कार्य कुशल, गुणी और बुद्धिमान थे। (8)सभी धर्म और धार्मिक कर्मों में लीन और निस्वार्थ भाव से भरे थे। (9)रामराज्य में सभी नागरिकों के परोपकारी होने से सभी मन और आत्मा के स्तर पर शांत ही नहीं बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी शांति और सुकून से रहते थे।

Sunday, September 9, 2012

जब-जब धर्म की हानि होती है, भगवान अवतार लेकर अधर्म का अंत करते हैं। हिन्दू धर्मग्रंथों में इस संदेश के साथ अलग-अलग युगों में जगत का दु:ख और भय दूर करने वाले ईश्वर के अनेक अवतारों के पौराणिक प्रसंग हैं। दरअसल, इनमें सच्चाई और अच्छे कामों को अपनाने के भी कई सबक हैं। साथ ही इनके जरिए युग के बदलाव के साथ कर्म, विचार व व्यवहार में अधर्म और पाप के बढ़ने के भी संकेत दिए गए हैं।

इसी कड़ी में सतयुग, त्रेता, द्वापर के बाद कलियुग के लिए बताया गया है कि इसमें अधर्म का ज्यादा बोलबाला होगा, जिसके नाश के लिए भगवान विष्णु का कल्कि रूप में दसवां अवतार होगा। रामचरितमानस में भी कलियुग में फैलने वाले अधर्म का वर्णन मिलता है।

आज के दौर में भी व्यावहारिक जीवन में आचरण, विचार और वचनों में दिखाई दे रहे सत्य, संवेदना, दया या परोपकार जैसे भावों के अभाव से आहत मन अनेक अवसरों पर कलियुग के अंत और कल्कि अवतार से जुड़
ी जिज्ञासा को और बढ़ाता है।

हिन्दू धर्मग्रंथ भविष्य पुराण में अलग-अलग युगों की गणना व अवधि बताई गई है।




भविष्य पुराण के मुताबिक मानव का एक वर्ष देवताओं के एक अहोरात्र यानी दिन-रात के बराबर है। इसमें उत्तरायण दिन व दक्षिणायन रात मानी जाती है। दरअसल, एक सूर्य संक्रान्ति से दूसरी सूर्य संक्रान्ति की अवधि सौर मास कहलाती है। मानव गणना के ऐसे 12 सौर मासों का 1 सौर वर्ष ही देवताओं का एक अहोरात्र होता है। ऐसे ही 30 अहोरात्र, देवताओं के एक माह और 12 मास एक दिव्य वर्ष कहलाता है


सतयुग- 4800 (दिव्य वर्ष) 17,28,000 (सौर वर्ष)। त्रेतायुग- 3600 (दिव्य वर्ष) 12,96,100 (सौर वर्ष)। द्वापरयुग- 2400 (दिव्य वर्ष) 8,64,000 (सौर वर्ष)। कलियुग- 1200 (दिव्य वर्ष) 4,32,000 (सौर वर्ष)। इस तरह सभी दिव्य वर्ष मिलाकर 12000 दिव्य वर्ष देवताओं का एक युग या महायुग कहलाता है, जो चार युगों के सौर वर्षों के योग 43,200,000 वर्षों के बराबर होता है। खासतौर पर, कलियुग की बात करें तो पौराणिक व ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करने पर पता चलता है कि 4,32,000 साल लंबे कलियुग को शुरू हुए तकरीबन 6000 वर्ष ही गुजरे हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि अभी कलियुग और कितना बाकी है व कलियुग में बढ़े पापों का संहार करने भगवान विष्णु का कल्कि अवतार होने में कितना वक्त लगेगा। इनके अलावा निकट भविष्य में प्रलय होने की बातों के दावे भी इस गणना से परखें जा सकते हैं।

Thursday, September 6, 2012

आजा मेरे कन्हैया, आजा मेरे कन्हैया... बैठे है आप ऐसे, सुनता नहीं हो जैसे... नैया हमारी मोहन, उतरेगी पार कैसे... तुम्हेक्या पता नहीं है, मझदार में पड़ी है... आजा मेरे कन्हैया, आजा मेरे कन्हैया..


Wednesday, September 5, 2012

आज की व्यस्त जिंदगी में इंसान के पास काम, जिम्मेदारियों और जरूरतों को पूरा करने की उलझन में ईश्वर स्मरण के लिए वक्त निकालना मुश्किल है। हालांकि धर्मग्रंथों में लिखी बातें कर्म को पूजा का दर्जा देती हैं। किंतु कर्म के साथ-साथ ईश्वर भक्ति और कृपा को भी सफल जीवन का सूत्र भी माना गया है।

यही कारण है कि हम यहां बता रहे हैं धर्मग्रंथों का एक ऐसा सरल और असरदार मंत्र जो देव पूजा के अलावा कार्य और जिम्मेदारियों के दौरान किसी भी वक्त मन ही मन स्मरण करने पर सारे काम बिना बाधा और परेशानी के पूरे करने वाला माना गया है।

यह मंत्र भगवान विष्णु के साथ उनके अवतार श्रीकृष्ण का स्मरण है। वर्तमान में चल रहा अधिकमास भी इन दोनों देवताओं की उपासना का विशेष काल है। इसलिए इस मंत्र का स्मरण बहुत ही शुभ फल देने वाला होगा। जानिए हैं यह मंत्र -

- सुबह स्नान के बाद यथासंभव पीले वस्त्र पहनकर देवालय में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा गंध, अक्षत, पीले फूल व धूप, दीप से करें।

- पूजा के बाद इस मंत्र का यथाशक्ति जप करें। यही मंत्र दिन में किसी भी वक्त काम के दौरान ध्यान भी कर सकते हैं -

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव। 

कर्म की अहमियत बताने वाले भगवान श्रीकृष्ण और शांतिस्वरूप भगवान विष्णु के ध्यान से आपका हर काम न केवल बिना रुकावट के पूरा होगा, बल्कि शांति और सुकून भी लाएगा।

Tuesday, September 4, 2012

hare krishna hare ram

भगवान राम और श्याम यानी श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के ऐसे अवतार हैं, जिनका जीवन चरित्र पावनता, प्रेम, स्नेह, कर्म, मर्यादा, शक्ति, बुद्धि, ज्ञान, विवेक, समर्पण, त्याग जैसे अनगिनत खूबियों व शक्तियों से भरा है। ये इंसानी जीवन को सुख, शांति व सफल जीवन की राह बताते हैं। इसलिए भगवान राम और कृष्ण का नाम स्मरण ही विचार व व्यवहार में पावनता लाकर गुण, शक्ति व धन संपन्न बनाने वाला माना गया है।

हर इंसान धन के साथ मन की शांति भी चाहता है। सुख-सुकून पाने के लिए ही खासतौर पर भगवान श्रीराम और कृष्ण का सामूहिक स्मरण करने के लिए धर्म परंपराओं में एक बेहद आसान मंत्र प्रभावी माना गया है। इसे 16 नाम मंत्र या राम नाम या कृष्ण नाम महामंत्र के नाम से भी जाना जाता है।

धार्मिक महत्व के नजरिए से राम-कृष्ण के ये 16 नाम कलियुग में पापनाशक है। इस महामंत्र को बोलने से बेहतर उपाय वेदों में भी नहीं मिलता। इसक स्मरण की कोई विधि नहीं है। बस, बोलने मात्र से सारे दोषों से छुटकारा मिलता है। व्यक्ति पितृ, देव, मनुष्य दोष या हर पाप का अंत होकर सुखी-संपन्न बनता है।

यही वजह है कि अधिकमास के बाकी दिनों में यह राम नाम मंत्र दिन हो या रात कभी भी बोल हर इंसान सुखी और धनी बनने की हर कामना पूरी कर सकता है।

इस मंत्र स्मरण के पहले भगवान विष्णु, श्रीराम व श्रीकृष्ण की सफेद चंदन, सुगंधित फूल व माला चढ़ाकर मिठाई का भोग लगाएं व धूप व दीप जलाकर सुख की कामना से अगली तस्वीरे का साथ लिखे मंत्र का स्मरण भक्ति भाव में डूबकर करें। मंत्र स्मरण के बाद राम-कृष्ण या विष्णु की आरती करें और क्षमाप्रार्थना करें।

 हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।


Monday, September 3, 2012

राधा को चुन लिया ,कृषण ने बंसी की धुन में क्या
बुन लिया प्रीत के धागों में अपने साथ राधे
बेक़रार रहने लगा राधिका का मन यादो में
जन्मो का ये सिलसिला खो गया हे वो ख्वाबो में
कैसा हाल हे न ख्याल हे बन गया दीवाना हे
नंदगाँव का ब्रिज के प्यार का बन गया हे अफसाना ये

 

gau mata ki jai ho

शास्त्रों में गाय को माता कहा गया है। गाय एक बहुपयोगी पशु है जो कि हमारे लिए कई प्रकार से फायदेमंद भी है। पुराने समय में सभी के घरों में गाय अनिवार्य रूप से रहती थी। आज भी गांव में रहने वाले या ग्रामीण परिवेश से संबंधित लोगों के यहां गाय रहती है।

गाय बहुत ही पवित्र और पूजनीय मानी गई है। ऐसा माना जाता है कि गाय की पूजा करने से सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त हो जाती है। इसी वजह से आज भी गाय को पूजा जाता है

गाय जहां रहती है वहां किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय नहीं हो पाती और वातावरण सकारात्मक बना रहता है।

गाय से निकलने वाली गंध से वातावरण में मौजूद कई हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। - गाय का दूध भी कई बीमारियों में औषधि का ही काम करता है।


- गौमूत्र से कैंसर का इलाज हो जाता है। गाय के प्रभाव में रहने वाले व्यक्ति को कभी ऐसी कोई भी बीमारी नहीं होती।

गाय का गोबर भी कई कामों में उपयोग किया जाता है। इनके अतिरिक्त कई फायदे हैं गाय को घर पर रखने के। इन्हीं सब की वजह से गाय को अपने घरों पर रखा जाता था।

Wednesday, August 29, 2012

VAMAN DEV



केरल में हर साल ओणम का त्योहार मनाया जाता है। इस बार यह त्योहार 29 अगस्त, बुधवार को है। ओणम मनाने के पीछे एक कथा भी प्रचलित है, जो इस प्रकार है-

पुरातन समय में पृथ्वी के दक्षिण क्षेत्र में बलि नामक राजा राज्य करता था। वह भगवान विष्णु के परमभक्त प्रह्लाद का पौत्र था। वह राक्षसों का राजा होने के कारण देवताओं से बैर रखता था। स्वर्ग पर अधिकार करने के उद्देश्य से एक बार बलि यज्ञ कर रहा था तब देवताओं की सहयाता करने के लिए भगवान वामन बलि की यज्ञशाला में गए और राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांगी।

राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान की लीला समझ गए और उन्होंने बलि को दान देने से मना कर दिया लेकिन बलि ने फिर भी भगवान वामन को तीन पग धरती दान देने का संकल्प ले लिया। भगवान वामन ने विशाल रूप धारण कर एक पग में धरती और दूसरे पग में स्वर्ग लोक नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि ने भगवान वामन को अपने सिर पर पग रखने को कहा।

बलि के सिर पर पग रखने से वह सुतललोक पहुंच गया। बलि की दानवीरता देखकर भगवान ने उसे सुतललोक का स्वामी भी बना दिया। साथ ही भगवान ने उसे यह भी वरदान दिया कि वह अपनी प्रजा को वर्ष में एक बार अवश्य मिल सकेगा। राजा बलि के पृथ्वी पर आने की खुशी में ही ओणम का त्योहार मनाया जाता है।

SARVAN KUMAR TUMARI JAI HO

ये भी अपने माता पिता की ही औलाद थी जिसने अपने माता पिता के सुख के लिए अपनी पत्नी को छोड़ दिया था सिर्फ इतनी सी बात के लिए की उसकी पत्नी ने श्रवण कुमार के माता पिता को बुरा भला कहा था ध्न्ने है ऐसी औलाद जिसने अपने माता पिता के लिए अपनी पत्नी को छोड़ दिया बरना आजकल तो पत्नी के पीछे माता पिता को छोड़ दिया जाता है ,,इन्होने सिर्फ ये सोचा था की जिन माँ बाप ने अपने बेटे की परवरिश के लिए लाखों दुःख सहे ये उनका साथ कैसे छोड़ दे और इन्होने अपने माता पिता को अपने कन्धों पर उठाकर अपने माता पिता को यात्रा करवाने के लिए निकले थे इसलिए चार दिन की चांदनी के लिए अपने उस माता पिता को कभी मत छोड़ो जिनमें प्रभु के दर्शन होते हैं ,,अपने मात पिता को दुःख देकर चाहे आप चारो धाम की यात्रा करलो लेकिन आपको कभी भी पुण्य का फल नहीं लगेगा इसलिए माता पिता को अपना सहारा दो ना की उनके बुढापे का सहारा छीनो


jai jai jai vishnu devae namha

हिन्दू धर्मशास्त्रों में धार्मिक परंपराओं के जरिए उजागर जीने के सलीके मन की सारी बेचैनी, भय और चिंता को दूर कर सुकूनभरे जीवन की राह आसान बनाते हैं। सुख और शांति से ही जीना हो तो चैन से सोना भी जरूरी है। लेकिन यह तभी संभव है, जब कलह और अशांति से दूर हो। 

व्यावहारिक रूप से इसके लिए छल, कपट व बुरे बर्ताव से दूरी जरूरी है, लेकिन धार्मिक उपायों में एक आसान तरीका है - रात में सोते वक्त देव स्मरण। इसके लिए मंत्र विशेष स्मरण का बड़ा महत्व बताया है। 

खासतौर पर अधिकमास में (18 अगस्त से जारी) शांत, सौम्य और आनंद स्वरूप भगवान विष्णु का रात में विशेष मंत्र से स्मरण कर सोना दिन भर के शारीरिक और मानसिक तनावों को दूर कर मन को शांति देता है। यह उपाय चैन की नींद सोने के लिए हर रोज करना भी शुभ माना गया है। जानिए, यह विशेष विष्णु शयन मंत्र - 

अच्युतं केशवं विष्णुं हरिं सोमं जनार्दनम्।

हसं नारायणं कृष्णं जपते दु:स्वप्रशान्तये।।

Tuesday, August 28, 2012

तुम्हारा नाम लिख लिख कर मोहन
मिटाना भूल जाता हूँ ....
तुम्हें जब याद करता हूँ
भुलाना भूल जाता हूँ ....
बहुत सी ऐसी बातें हैं जो मेरे दिल में रहती है
मगर जब तुमसे मिलता हूँ
सुनाना भूल जाता हूँ ....
तुम्हारे बाद अब हर पल
बड़ी मुश्किल से कटता है
में अक्सर तुमको ख्वाबों में बताना भूल जाता हूँ ...
में हर शाम कहता हूँ
की तुमको भूल जाऊँगा
मगर जब सुबह होती हैं
भुलाना तुमको भूल जाता हूँ ...!!

!!~~**जय जय श्री राधे**~~!!

 

mere ghanshyam

घनश्याम तुम्हे ढूँढने जाए कहाँ कहाँ !
अपने विरह की आग बुझाए कहाँ कहाँ !!

तेरी नजर में जुल्फों में मुस्कान में !
उलझा है दिल तो छुडाये कहाँ कहाँ !!
घनश्याम तुम्हे ढूँढने...................

चरणों की खाकसारी में खुद ख़ाक बन गये !
अब ख़ाक पे ख़ाक रमाये कहाँ कहाँ !!
घनश्याम तुम्हे ढूँढने...................

जिनकी नजर देखकर खुद बन गये मरीज !
ऐसे मरीज मर्ज दिखाए कहाँ कहाँ !!
घनश्याम तुम्हे ढूँढने...................

दिन रात अश्रु बिंदु बरसते तो है मगर !
सब तन में लगी जो आग बुझाए कहाँ कहाँ !!

घनश्याम तुम्हे ढूँढने जाए कहाँ कहाँ !
अपने विरह की आग बुझाए कहाँ कहाँ !!

!!~~**जय जय श्री राधे**~~!!

 

jai shree bankey bihari ji

तेरी अंखिया हैं जादू भरी, बिहारी मैं तो कब से खड़ी ।

 
सुनलो मेरे श्याम सलोना, तुमने ही मुझ पर कर दिया टोना ।

 
मेरी अंखियां तुम्ही से लड़ी, बिहारी मैं तो कब से खड़ी ॥

 
तुम सा ठाकुर और ना पाया, तुमसे ही मैंने नेहा लगाया ।

 
मैं तो तेरे ही द्वार पे पड़ी, बिहारी मैं तो कब से खड़ी ॥

 
कृपा करो हरिदास के स्वामी,बांके बिहारी अन्तर्यामी ।


मेरी टूटे ना भजन की लड़ी, बिहारी मैं तो कब से खड़ी ॥

♥♥♥.....जय श्री कृष्णा......♥♥♥

Monday, August 27, 2012

आज (27 अगस्त, सोमवार) कमला एकादशी है। धर्म ग्रंथों में इस एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है क्योंकि यह पुरुषोत्तम मास में ही आती है। इस प्रकार ये व्रत 4 साल में ही आता है। इस व्रत से जुड़ी एक कथा भी है जो इस प्रकार है-

पुरातन समय में महिष्मती नगरी में कार्तवीर्य नामक राजा राज्य करता था। उस राजा की सौ पत्नियां थीं पर उनमें से किसी को भी राज्यभार सँभालने वाला योग्य पुत्र नहीं था। तब राजा ने आदरपूर्वक पण्डितों को बुलवाया और पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ किये, परन्तु सब असफल रहे। यह देखकर कार्तवीर्य तपस्या करने के लिए वन में चले गए। उनकी पत्नी (हरिशचंद्र की पुत्री प्रमदा) भी उनके साथ गन्धमादन पर्वत पर चली गई। वहां रहते हुए कार्तवीर्य ने दस हजार वर्ष तक तपस्या की परन्तु सिद्धि प्राप्त नहीं हुई। तब रानी प्रमदा ने माता अनुसूया से पुत्र प्राप्ति का मार्ग पूछा।

तब माता अनुसूया बोली कि अधिक मास की दोनों एकादशियों को विधिपूर्वक व्रत करने से तुम्हारी मनोकामना जरुर पूरी होगी। इसके बाद माता अनसूया ने व्रत की विधि बतलाई। रानी ने विधि के अनुसार व्रत किया। यह देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हो गए और प्रमदा के सामने प्रकट होकर वरदान मांगने के लिए कहा। तब प्रमदा ने कहा कि- हे भगवान। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे पति को उनका मनचाहा वरदान दीजिए। प्रमदा का वचन सुनकर भगवान विष्णु बोले- हे राजेन्द्र! तुम अपनी इच्छा के अनुसार वर माँगो क्योंकि तुम्हारी स्त्री ने मुझको प्रसन्न किया है।

यह सुनकर कार्तवीर्य ने कहा कि- हे भगवन्! आप मुझे सबसे श्रेष्ठ, सबके द्वारा पूजित तथा आपके अतिरिक्त देव दानव, मनुष्य आदि से अजेय उत्तम पुत्र दीजिये। भगवान तथास्तु कहकर अन्तर्धान हो गए। उसके बाद कार्तवीर्य व प्रमदा अपने राज्य को वापस आ गये। कुछ समय बाद कार्तवीर्य के यहां एक तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका नाम कार्तवीर्य अर्जुन रखा गया। वह भगवान के अतिरिक्त सबसे अजेय था। उसने अपने पराक्रम से रावण को भी जीत लिया था। यह सब कमला एकादशी व्रत का ही प्रभाव था।


radhey krishna hai ek naam

राधा और कृष्ण, ये वो दो नाम हैं जो दो हो कर भी एक हैं..और एक साथ ही पुकारे जाते हैं...ये वो हैं जिन्होंने दुनिया को सच्चे प्रेम का अर्थ समझाया... 

अपनी अलौकिक प्रेम कहानी से इन्होने ना सिर्फ प्रेम के निःस्वार्थ रूप को सार्थक किया बल्कि सारे जग को बता दिया कि प्यार कितना सरल, कितना निश्छल है..कितना पवित्र है...प्यार शारीरिक आकर्षण नहीं बल्कि आत्माओं का मिलन है.. 

भगवान् श्री कृष्ण और राधा का नाम हमेशा एक साथ पुकारा जाता है.. और इन सबका कारण है उनके बीच का अटूट प्रेम जो आज भी सच्चे प्यार का सबसे बड़ा उदाहरण है..वैसे तो इनकी प्रेम कहानी के अनेक रूप हैं जो अलग अलग लोगों द्वारा अलग अलग प्रकार से बताये जाते हैं.. मगर इन सबके बीच में एक चीज़ कभी नहीं बदलती और वो है इनका पवित्र प्रेम जो अतुलनीय और अमर है..कहीं इनके विवाह का ज़िक्र है तो कहीं बताया गया है कि इनका विवाह नहीं हुआ था...कुछ का मानना है कि राधा ने मुरली बन कर खुद को कृष्ण को समर्पित कर दिया...कहीं राधा को कृष्ण से उम्र में बड़ी कहा गया है, तो कहीं हमउम्र...मगर राधा और कृष्ण का प्रेम तो इन सब से परे था..इन सबसे ऊपर...इनका प्रेम किसी रिश्ते का मोहताज नहीं था..उनका समर्पण ही उनके प्यार की ताकत थी..

आज हमें अपने आस पास तमाम प्रेमी मिलेंगे..जो एक दूसरे से प्यार तो करते हैं, मगर किसी न किसी कारण से...उनके प्रेम के पीछे कोई न कोई स्वार्थ ज़रूर होता है. प्यार की वो निश्छलता और सादगी कहीं खो सी गयी है..बाजारीकरण के इस दौर में प्यार भी एक वस्तु मात्र बन कर रह गया है..लोग प्यार को लेकर एक दूसरे को धमकियाँ देते हैं.. मार-पीट करते हैं..एक दूसरे की जान लेते हैं.. मुक़दमे लड़ते हैं...प्यार के नाम पर लोग बदनाम हो रहे हैं..या यूं कहें कि "प्यार" बदनाम हो रहा है..

ऐसे में हम कैसे भूल सकते हैं उस प्यार को जो हमें अपने संस्कृति में अपने देवताओं ने सिखाया हो? राधा और कृष्ण का वो प्रेम का बंधन जिसमे ना कोई स्वार्थ था, न छल, न उम्मीदें, ना दिखावा, अगर कुछ था, तो सिर्फ और सिर्फ "समर्पण"...वो समर्पण जिसने प्यार को एक नयी परिभाषा दे दी..एक ऐसी परिभाषा जिसने प्यार को महज एक भावना तक सीमित न रख कर उसे जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग बना दिया..प्यार के बिना जीवन अधूरा है.. प्यार हमें जीना सिखाता है..हमारी खुशियों और कामयाबी की वजह बनता है..

आधुनिकीकरण की इस दौड़ में शामिल लोगों को यह याद रखना चाहिए की चाहे हम पाश्चात्य संस्कृति को अपनाये या भारतीय संस्कृति , हम हिन्दू धर्म को मानें या इस्लाम को, प्यार इन सबसे ऊपर है..प्यार की भावना हर किसी के लिए एक जैसी होनी चाहिए.. हम चाहे भारत में रहकर प्यार करें या अमेरिका जा कर लव करें, भावना वही है..शब्दों से, देश से, भाषा से प्यार को बांटा नहीं जा सकता.. 

राधा और कृष्ण का अमर और अलौकिक प्रेम हम सब के लिए एक प्रेरणा है.

Tumhari yaad mai ye dil tadpa jata hai,

Tumse milne ko ye dil machala jata hai,

Tumhara man nahi hai milne ka to na milo SHYAM,

Hume to tumhari yaad me rone me bhi maja aata hai....

 

Sunday, August 26, 2012

शास्त्रों के मुताबिक भगवान विष्णु को 'हरि' तो महादेव को 'हर' कहकर पुकारा जाता है। इन शब्दों में एक भाव समान रूप से जुड़ा है, जो भगवान विष्णु की जगतपालक व शिव की संहारक शक्ति उजागर करता है। साथ ही इस बात को बल देता है कि भगवान शिव व विष्णु में कोई भेद नहीं है। यह भाव है - 'हरना' यानी छिनना, ले लेना या दूर करना।

इसका मतलब यही है कि भगवान शिव व विष्णु की भक्ति सारे दु:ख, कलह व संताप को दूर कर सुख, सौभाग्य, शांति व समृद्धि देती है। कल अधिकमास (18 अगस्त से शुरू) में सोमवार को ऐसा ही शुभ संयोग बना है। सोमवार के साथ अधिकमास की एकादशी तिथि का अचूक योग बना है।

यहां बताया जा रहा है इस शुभ योग में भगवान विष्णु व शिव की पूजा का ऐसा उपाय जो आसान भी है और जल्द सौभाग्य देने वाला भी। यह उपाय है - भगवान शिव व विष्णु की विशेष मंत्र के साथ पंचामृत पूजा। पंचामृत पूजा में भगवान शिव व विष्णु को दूध, दही, शहद, घी व शक्कर चढ़ाना सेहत, संतान, आयु, श्री व वैभव के साथ सारी परेशानियों को दूर करने वाली मानी गई है। जानिए यह सरल उपाय -

- सोमवार व एकादशी संयोग में यथासंभव सुबह-शाम स्नान के बाद भगवान शिव व विष्णु को प्रिय विशेष सामग्रियों से पूजा करें। इनमें भगवान विष्णु को केसरिया चंदन, पीले वस्त्र, पीले फूल व पीले पकवान तो भगवान शिव को सफेद चंदन, सफेद वस्त्र, सफेद फूल, बिल्वपत्र के साथ सफेद मिठाई चढ़ाएं।

- इन सामग्रियों को चढ़ाने से पहले दोनों देवताओं का दूध, दही, शक्कर, शहद व घी मिलाकर बने पंचामृत से नीचे लिखा वेद मंत्र बोल स्नान कराएं-

ॐ पंचनद्यः सरस्वतीमपियन्तिसस्त्रोतसः ।

सरस्वतीतुपंचधासोदेशेभवत्सरित् ।

- पूजा व पंचामृत स्नान के बाद भगवान शिव व विष्णु से घर-परिवार की खुशहाली की कामना के साथ आरती व क्षमाप्रार्थना करें।