Wednesday, December 4, 2013

महाभारत हिंदू संस्कृति की एक अमूल्य धरोहर है। शास्त्रों में इसे पांचवा वेद भी कहा गया है। इसके रचयिता महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास हैं। महर्षि वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में स्वयं कहा है- यन्नेहास्ति न कुत्रचित्। अर्थात जिस विषय की चर्चा इस ग्रंथ में नहीं की गई है, उसकी चर्चा अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है। श्रीमद्भागवतगीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी महासागर की देन है। इस ग्रंथ में कुल मिलाकर एक लाख श्लोक है, इसलिए इसे शतसाहस्त्री संहिता भी कहा जाता है


1- महाभारत ग्रंथ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी लेकिन इसका लेखन भगवान श्रीगणेश ने किया था। भगवान श्रीगणेश ने इस शर्त पर महाभारत का लेखन किया था कि महर्षि वेदव्यास बिना रुके ही लगातार इस ग्रंथ के श्लोक बोलते रहे। तब महर्षि वेदव्यास ने भी एक शर्त रखी कि मैं भले ही बिना सोचे-समझे बोलूं लेकिन आप किसी भी श्लोक को बिना समझे लिखे नहीं। बीच-बीच में महर्षि वेदव्यास ने कुछ ऐसे ग्रंथ बोले जिन्हें समझने में श्रीगणेश को थोड़ा समय लगा और इस दौरान महर्षि वेदव्यास अन्य श्लोकों की रचना कर लेते थे।

2- महाभारत ग्रंथ का वाचन सबसे पहले महर्षि वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने राजा जनमेजय की सभा में किया था। राजा जनमेजय अभिमन्यु के पौत्र तथा परीक्षित के पुत्र थे। इन्होंने ने ही अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्पयज्ञ करवाया था।
3- भीष्म पितामह के पिता का नाम शांतनु था, उनका पहला विवाह गंगा से हुआ था। पूर्वजन्म में शांतनु राजा महाभिष थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ करके स्वर्ग प्राप्त किया। एक दिन बहुत से देवता और राजर्षि, जिनमें महाभिष भी थे, ब्रह्माजी की सेवा में उपस्थित थे। उसी समय वहां देवी गंगा का आना हुआ। गंगा को देखकर राजा महाभिष मोहित हो गए और एकटक उन्हें देखने लगे। तब ब्रह्माजी ने कहा- महाभिष तुम मृत्युलोग जाओ, जिस गंगा को तुम देख रहे हो, वह तुम्हारा अप्रिय करेगी और तुम जब उस पर क्रोध करोगे तब इस शाप से मुक्त हो जाओगे
4- ब्रह्माजी के श्राप के कारण अगले जन्म में महाभिष, राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु बने। इनका विवाह देवी गंगा से हुआ। विवाह से पहले गंगा ने शांतनु से यह प्रतिज्ञा करवाई थी कि वे कभी कोई प्रश्न नहीं पूछेंगे। शांतनु ने उनकी यह बात मान ली। राजा शांतनु और गंगा की आठ संतान हुई। पहली सातों संतानों को गंगा ने जन्म लेते ही नदी में प्रवाहित कर दिया। वचनबद्ध होने के कारण राजा शांतनु गंगा से कुछ नहीं पूछ पाए।
5- जब गंगा सांतवी आठवे संतान को नदी में प्रवाहित करने जा रही थी तब राजा शांतनु ने क्रोध में आकर उससे इसका कारण पूछा। तब देवी गंगा ने उन्हें पिछले जन्म की पूरी बात बताई और वह शांतनु की आठवी संतान को लेकर अन्यत्र चली गई।
6- धर्म ग्रंथों के अनुसार तैंतीस देवता प्रमुख माने गए हैं। इनमें अष्ट वसु भी हैं। ये ही अष्ट वसु शांतनु व गंगा के पुत्र के रूप में अवतरित हुए क्योंकि इन्हें वशिष्ठ ऋषि ने मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दिया था। गंगा ने अपने सात पुत्रों को जन्म लेते ही नदी में बहा कर उन्हें मनुष्य योनि से मुक्त कर दिया था। राजा शांतनु व गंगा का आठवां पुत्र भीष्म के रूप में प्रसिद्ध हुआ
7- राजा शांतनु का दूसरा विवाह निषाद कन्या सत्यवती से हुआ। शांतनु और सत्यवती के दो पुत्र हुए- चित्रांगद और वित्रिचवीर्य। चित्रांगद बहुत ही वीर और पराक्रमी था। एक युद्ध में उसी के नाम के गंर्धवराज चित्रांगद ने उसका वध कर दिया। चित्रांगद के बाद विचित्रवीर्य को राजा बनाया गया। इनका विवाह काशी की राजकुमारी अंबिका और अंबालिका से हुआ। लेकिन कुछ समय बाद ही वित्रिचवीर्य की मृत्यु हो गई।
8- महाभारत में विदुर यमराज के अवतार थे। यमराज को ऋषि माण्डव्य के श्राप के कारण मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ा। विदुर धर्म शास्त्र और अर्थशास्त्र में बड़े निपुण थे। उन्होंने जीवनभर कुरुवंश के हित के लिए कार्य किया।
9- यदुवंशी राजा शूरसेन की पृथा नामक कन्या व वसुदेव नामक पुत्र था। इस कन्या को राजा शूरसेन अपनी बुआ के संतानहीन लड़के  कुंतीभोज को गोद दे दिया था। कुंतीभोज ने इस कन्या का नाम कुंती रखा। कुंती का विवाह राजा पाण्डु से हुआ था।
10- जब कुंती बाल्यावस्था में थी, उस समय उसने ऋषि दुर्वासा की सेवा की थी। सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि दुर्वासा ने कुंती को एक मंत्र दिया जिससे वह किसी भी देवता का आह्वान कर उससे पुत्र प्राप्त कर सकती थी। विवाह से पूर्व इस मंत्र की शक्ति देखने के लिए एक दिन कुंती ने सूर्यदेव का आह्वान किया जिसके फलस्वरूप कर्ण का जन्म हुआ।
11- महाराज पाण्डु का दूसरा विवाह मद्रदेश की राजकुमारी माद्री से हुआ। एक बार राजा पाण्डु शिकार खेल रहे थे। उस समय किंदम नामक ऋषि अपनी पत्नी के साथ हिरन के रूप में सहवास कर रहे थे। उसी अवस्था में राजा पाण्डु ने उन पर बाण चला दिए। मरने से पहले ऋषि किंदम ने राजा पाण्डु को श्राप दिया कि जब भी वे अपनी पत्नी के साथ सहवास करेंगे तो उसी अवस्था में उनकी मृत्यु हो जाएगी।

12- ऋषि किंदम के श्राप से दु:खी होकर राजा पाण्डु ने राज-पाट का त्याग कर दिया और वनवासी हो गए। कुंती और माद्री भी अपने पति के साथ ही वन में रहने लगीं। जब पाण्डु को ऋषि दुर्वासा द्वारा कुंती को दिए गए मंत्र के बारे में पता चला तो उन्होंने कुंती से धर्मराज का आवाह्न करने के लिए कहा जिसके फलस्वरूप धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म हुआ।
इसी प्रकार वायुदेव के अंश से भीम और देवराज इंद्र के अंश से अर्जुन का जन्म हुआ। कुंती ने यह मंत्र माद्री को बताया। तब माद्री ने अश्विनकुमारों का आवाह्न किया, जिसके फलस्वरूप नकुल व सहदेव का जन्म हुआ।



13- धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी को महर्षि वेदव्यास ने सौ पुत्रों की माता होने का वरदान दिया था। समय आने पर गांधारी को गर्भ ठहरा लेकिन वह दो वर्ष तक पेट में रुका रहा। घबराकर गांधारी ने गर्भ गिरा दिया। उसके पेट से लोहे के गोले के समान एक मांस पिंड निकला। तब महर्षि वेदव्यास वहां पहुंचे और उन्होंने कहा कि तुम सौ कुण्ड बनवाकर उन्हें घी से भर दो और उनकी रक्षा के लिए प्रबंध करो। इसके बाद महर्षि वेदव्यास ने गांधारी को उस मांस पिण्ड पर ठंडा जल छिड़कने के लिए कहा। जल छिड़कते ही उस मांस पिण्ड के 101 टुकड़े हो गए।



14- महर्षि की आज्ञानुसार गांधारी ने उन सभी मांस पिंडों को घी से भरे कुंडों में रख दिया। फिर महर्षि ने कहा कि इन कुण्डों को दो साल के बाद खोलना। समय आने पर उन कुण्डों से पहले दुर्योधन का जन्म हुआ और उसके बाद अन्य गांधारी पुत्रों का। जिस दिन दुर्योधन का जन्म हुआ था उसी दिन भीम का भी जन्म हुआ था।

15- जन्म लेते ही दुर्योधन गधे की तरह रेंकने लगा। उसका शब्द सुनकर गधे, गीदड़, गिद्ध और कौए भी चिल्लाने लगे, आंधी चलने लगी, कई स्थानों पर आग लग गई। यह देखकर विदुर ने राजा धृतराष्ट्र से कहा कि आपका यह पुत्र निश्चित ही कुल का नाश करने वाला होगा अत: आप इस पुत्र का त्याग कर दीजिए लेकिन पुत्र स्नेह के कारण धृतराष्ट्र ऐसा नहीं कर पाए।


16- गांधारी का सबसे बड़ा पुत्र था - दुर्योधन। उसके बाद दु:शासन, दुस्सह, दुश्शल, जलसंध, सम, सह, विंद, अनुविंद, दुद्र्धर्ष, सुबाहु, दुष्प्रधर्षण, दुर्मुर्षण, दुर्मुख, दुष्कर्ण, कर्ण, विविंशति, विकर्ण, शल, सत्व,



17- सुलोचन, चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चारुचित्र, शरासन, दुर्मुद, दुर्विगाह, विवित्सु, विकटानन, ऊर्णनाभ, सुनाभ,  नंद, उपनंद, चित्रबाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, आयोबाहु, महाबाहु

18- चित्रांग, चित्रकुंडल, भीमवेग, भीमबल, बलाकी, बलवद्र्धन, उग्रायुध, सुषेण, कुण्डधार, महोदर, चित्रायुध, निषंगी, पाशी, वृंदारक, दृढ़वर्मा, दृढ़क्षत्र, सोमकीर्ति, अनूदर, दृढ़संध, जरासंध
19- सत्यसंध, सद:सुवाक, उग्रश्रवा, उग्रसेन, सेनानी, दुष्पराजय, अपराजित, कुण्डशायी, विशालाक्ष, दुराधर, दृढ़हस्त, सुहस्त, बातवेग, सुवर्चा, आदित्यकेतु, बह्वाशी, नागदत्त, अग्रयायी, कवची, क्रथन

20- कुण्डी, उग्र, भीमरथ, वीरबाहु, अलोलुप, अभय, रौद्रकर्मा, दृढऱथाश्रय, अनाधृष्य, कुण्डभेदी, विरावी, प्रमथ,  प्रमाथी, दीर्घरोमा, दीर्घबाहु, महाबाहु, व्यूढोरस्क, कनकध्वज, कुण्डाशी, और विरजा। 100 पुत्रों के अलावा गांधारी की एक पुत्री भी थी जिसका नाम दुुश्शला था, इसका विवाह राजा जयद्रथ के साथ हुआ था।


21- कौरवों के अतिरिक्त धृतराष्ट्र का एक पुत्र और था, उसका नाम युयुत्सु था। जिस समय गांधारी गर्भवती थी और धृतराष्ट्र की सेवा करने में असमर्थ थी। उन दिनों एक वैश्य कन्या ने धृतराष्ट्र की सेवा की, उसके गर्भ से उसी साल  युयुस्तु नामक पुत्र हुआ था। वह बहुत ही यशस्वी और विचारशील था।
22- एक बार दुर्योधन ने धोखे से भीम को विष खिलाकर गंगा नदी में फेंक दिया। बेहोशी की अवस्था में भीम बहते हुए नागलोक पहुंच गए। वहां विषैले नागों ने भीम को खूब डंसा, जिससे भीम के शरीर का जहर कम हो गया और वे होश में आ गए और नागों को पटक-पटक कर मारने लगे। यह सुनकर नागराज वासुकि स्वयं भीम के पास आए। उनके साथी आर्यक नाग में भीमसेन को पहचान लिया। आर्यक नाग भीमसेन के नाना का नाना था। आर्यक नाग ने प्रसन्न होकर भीम को हजारों हाथियों का बल प्रदान करने वाले कुंडों का रस पिलाया, जिससे भीमसेन और भी शक्तिशाली हो गए।़
23- पांडवों के कुलगुरु कृपाचार्य थे। इनके पिता का नाम शरद्वान था, वे महर्षि गौतम के पुत्र थे। महर्षि शरद्वान ने घोर तपस्या कर दिव्य अस्त्र प्राप्त किए और धनुर्वेद में निपुणता प्राप्त की। यह देखकर देवराज इंद्र भी घबरा गए और उन्होंने शरद्वान की तपस्या तोडऩे के लिए जानपदी नाम की अप्सरा भेजी। इस सुंदरी को देखकर महर्षि शरद्वान का वीर्यपात हो गया। उनका वीर्य सरकंड़ों पर गिरा वह दो भागों में बंट गया। उससे एक कन्या और एक बालक उत्पन्न हुआ। वही बालक कृपाचार्य बना और कन्या कृपी के नाम से प्रसिद्ध हुई।
24- गुरु द्रोणाचार्य महर्षि भरद्वाज के पुत्र थे। एक बार वे सुबह गंगा स्नान करने गए, वहां उन्होंने घृताची नामक अप्सरा को जल से निकलते देखा। यह देखकर उनके मन में विकार आ गया और उनका वीर्य स्खलित होने लगा। यह देखकर उन्होंने अपने वीर्य को द्रोण नामक एक बर्तन में संग्रहित कर लिया। उसी में से द्रोणाचार्य का नाम हुआ।
25- गुरु द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी से हुआ। कृपी के गर्भ से अश्वत्थामा का जन्म हुआ। उसने जन्म लेते ही अच्चै:श्रवा अश्व के समान शब्द किया, इसी कारण उसका नाम अश्वत्थामा हुआ। वह महादेव, यम, काल और क्रोध के सम्मिलित अंश से उत्पन्न हुआ था।
26- जब द्रोणाचार्य शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब उन्हें पता चला कि भगवान परशुराम ब्राह्मणों को अपना सर्वस्व दान कर रहे हैं। द्रोणाचार्य भी उनके पास गए और अपना परिचय दिया। द्रोणाचार्य ने भगवान परशुराम से उनके सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्र मांग लिए और उनका प्रयोग, रहस्य व उपसंहार की विधि भी सीख ली।
27- द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा को अधिक प्रेम करते थे। उन्होंने शिष्यों को पानी लाने के लिए जो बर्तन दिए थे, उनमें औरों के तो देर से भरते लेकिन अश्वत्थामा का बर्तन सबसे पहले भर जाता, जिससे वह अपने पिता के पास पहले पहुंचकर गुप्त रहस्य सीख लेता। यह बात अर्जुन ने ताड़ ली। अब वह वारुणास्त्र से अपना बर्तन झटपट भरकर द्रोणाचार्य के पास पहुंच जाता। यही कारण था कि अर्जुन और अश्वत्थामा की शिक्षा एक समान हुई।
28- पांडव जब युवा हुए थे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। यह देखकर दुर्योधन ने उन्हें मारने की योजना बनाई और वारणावत नामक स्थान पर अपने मंत्री पुरोचन से एक महल बनवाया। वह महल सन, राल व लकड़ी से बना था जिससे की वह पलभर में जलकर राख हो जाए। दुर्योधन ने किसी तरह पांडवों को वहां जाने के लिए राजी कर लिया।
29- जब पाण्डव वारणावत जाने लगे तो विदुरजी ने युधिष्ठिर को सांकेतिक भाषा में उस महल का रहस्य युधिष्ठिर को बता दिया और उससे बचने के उपाय भी दिए। विदुरजी की सारी बात युधिष्ठिर ने अच्छी तरह से समझ ली। तब विदुरजी हस्तिनापुर लौट गए। यह घटना फाल्गुन शुक्ल अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र की है।
30- पांडव एक साल तक वारणावत नगर में रहे। एक दिन कुंती ने ब्राह्ण भोज कराया। जब सब लोग खा-पीकर चले गए तो वहां एक भील स्त्री अपने पांच पुत्रों के साथ भोजन मांगने आई और वे सब उस रात वहीं सो गए। उसी रात भीम ने स्वयं महल में आग लगा दी और गुप्त रास्ते से बाहर निकल गए। लोगों ने जब सुबह भील स्त्री और अन्य पांच शव देखे तो उन्हें लगा कि पांडव कुंती सहित जल कर मर गए हैं।

Friday, November 22, 2013

शास्त्रों के मुताबिक कर्मयोगी श्रीकृष्ण के ही परम भक्त हैं शनिदेव। शनि की कृष्ण भक्ति से जुड़ी पौराणिक कथा भी उजागर करती है कि शनि ने कृष्ण दर्शन के लिए घोर तप किया। तब कृष्ण ने मथुरा के पास कोकिला वन में प्रकट होकर आशीर्वाद दिया कि शनि भक्ति करने वाला हर व्यक्ति दरिद्रता, पीड़ा व संकटमुक्त रहेगा।
असल में, शनि भक्ति भी श्रीकृष्ण की भांति सार्थक कर्म, बोल व विचारों को अपनाने का संदेश देती है। क्योंकि माना जाता है कि अच्छे-बुरे कर्म व विचार पर ही शनि दण्ड नियत करते हैं। यही वजह है कि शनि की प्रसन्नता के लिए शनि दशाओं व शनिवार को श्रीकृष्ण भक्ति व स्मरण बहुत ही फलदायी होते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण के किसी भी मंत्र का स्मरण शनि कृपा से सफलता व सुख के लिए की गई हर कोशिशों की बाधाओं को दूर करता है।

सुबह जल में काले तिल डालकर स्नान के बाद यथासंभव पीले वस्त्र पहनें।
- यथासंभव देवालय में श्रीकृष्ण की काले पाषाण की प्रतिमा को दूध मिले जल से स्नान कराएं। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान के बाद श्रीकृष्ण को केसर मिले या पीले चंदन, पीले फूल, तुलसी दल चढ़ाने के साथ माखन-मिश्री का भोग लगाएं।

- चंदन धूप व गाय के घी का दीप जलाकर नीचे लिखे विष्णु अवतार श्रीकृष्ण के इस मंत्र का ध्यान करें या तुलसी के दानों की माला से कम से कम 108 बार जप कर श्रीकृष्ण की आरती करें -
ऊँ श्रीं (श्री:) श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय नम:
- पूजा, जप व आरती के बाद श्रीकृष्ण से कर्मदोषों की क्षमा मांग शनि दोष से रक्षा की भी प्रार्थना कर प्रसाद ग्रहण करें।

Sunday, November 17, 2013

धर्मग्रंथों में कार्तिक पूर्णिमा को बड़ा ही परम पुण्यदायी तिथि बताया है। इस बार यह तिथि 17 नवंबर, रविवार को है। पुराणों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने मत्स्यावतार लिया था। इसकी कथा इस प्रकार है-
कृतयुग के आदि में राजा सत्यव्रत हुए। राजा सत्यव्रत एक दिन नदी में स्नान कर जलांजलि दे रहे थे। अचानक उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आई। उन्होंने देखा तो सोचा वापस सागर में डाल दूं लेकिन उस मछली ने बोला-आप मुझे सागर में मत डालिए अन्यथा बड़ी मछलियां मुझे खा जाएंगी।

तब राजा सत्यव्रत ने मछली को अपने कमंडल में रख लिया। मछली और बड़ी हो गई तो  राजा ने उसे अपने सरोवर में रखा, तब देखते ही देखते मछली और बड़ी हो गई। राजा को समझ आ गया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। राजा ने मछली से वास्तविक स्वरूप में आने की प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना सुन साक्षात चारभुजाधारी भगवान विष्णु प्रकट हो गए और उन्होंने कहा कि ये मेरा मत्स्यावतार है।

भगवान ने सत्यव्रत से कहा-सुनो राजा सत्यव्रत! आज से सात दिन बाद प्रलय होगी। तब मेरी प्रेरणा से एक विशाल नाव तुम्हारे पास आएगी। तुम सप्त ऋषियों, औषधियों, बीजों व प्राणियों के सुक्ष्म शरीर को लेकर उसमें बैठ जाना, जब तुम्हारी नाव डगमगाने लगेगी तब मैं मत्स्य के रूप में तुम्हारे पास आऊंगा। उस समय तुम वासुकि नाग के द्वारा उस नाव को मेरे सींग से बांध देना।

उस समय प्रश्न पुछने पर मैं तुम्हें उत्तर दूंगा, जिससे मेरी महिमा जो परब्रह्म नाम से विख्यात है तुम्हारे ह्रदय में प्रकट हो जाएगी। तब समय आने पर मत्स्यरूपधारी भगवान विष्णु ने राजा सत्यव्रत को तत्वज्ञान का उपदेश दिया, जो मत्स्यपुराण नाम से प्रसिद्ध है।

भगवान श्रीकृष्ण की हर लीला किसी इंसान को उसकी गुण और शक्तियों को पहचान उनके जरिए सफलता पाने की प्रेरणा व संदेश देती हैं। शास्त्रों में भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति आनंद, सुख और सौभाग्य देने वाली ही मानी गई है। श्रीकृष्ण द्वारा बताया गया कर्मयोग भी कलह और दु:खों से बचने का सबसे बेहतर और बेजोड़ सूत्र है। 

भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या उनके अवतारों की भक्ति से ही हर कलह दूर करने और सरस, सहज, सौभाग्यशाली और सफल जीवन के लिए पूर्णिमा तिथि का भी खास महत्व है।

 सुबह भगवान श्रीकृष्ण को गंगाजल और पंचामृत स्नान कराएं।

- स्नान के बाद गंध, सुगंधित फूल, अक्षत, पीले वस्त्र चढ़ाएं।

- श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएं।

सुगंधित धूप और दीप प्रज्जवलित कर नीचे लिखे कृष्ण मंत्रों का आस्था से  सौभाग्य व कलहनाश की कामना से स्मरण या जप करें -

ॐ नमो भगवते गोविन्दाय

ॐ  नमो भगवते नन्दपुत्राय

ॐ कृष्णाय गोविन्दाय नमो नम:

- मंत्र ध्यान के बाद भगवान कृष्ण या विष्णु की आरती करें। प्रसाद बांटे और ग्रहण करें। पूजा, आरती में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थना करें।


Tuesday, November 12, 2013

 हिन्दू धर्म में तुलसी का पौधा महालक्ष्मी का स्वरूप माना गया है व देवी लक्ष्मी जगतपालक भगवान विष्णु की पत्नी मानी गईं है। वे विष्णुप्रिया भी पुकारी गईं हैं। इस तरह तुलसी भी पवित्र और पापनाशिनी मानी गई है। यही वजह है कि धार्मिक दृष्टि से घर में तुलसी के पौधे की पूजा और उपासना हर तरह की दरिद्रता का नाश कर सुख-समृद्ध करने वाली होती है।

यही नहीं, शास्त्रों में तुलसी को वेदमाता गायत्री का स्वरूप भी पुकारा गया है। इसलिए खासतौर पर हिन्दू माह कार्तिक माह की देवउठनी एकादशी (13 नवंबर) पर भगवान विष्णु का ध्यान कर गायत्री व लक्ष्मी स्वरूप तुलसी पूजा मन, घर-परिवार व कारोबार से कलह व दु:खों का अंत कर खुशहाली लाने वाली मानी गई है। इसके लिए तुलसी गायत्री मंत्र का पाठ मनोरथ व कार्य सिद्धि में चमत्कारी भी माना गया है।

देवउठनी एकादशी की सुबह स्नान के बाद घर के आंगन या देवालय में लगे तुलसी के पौधे की गंध, फूल, लाल वस्त्र अर्पित कर पूजा करें। फल का भोग लगाएं।

धूप व दीप जलाकर उसके नजदीक बैठकर तुलसी की ही माला से तुलसी गायत्री मंत्र का श्रद्धा व सुख-समृद्धि की कामना से कम से कम 108 बार स्मरण करें व अंत में  तुलसी की आरती करें-

तुलसी गायत्री मंत्र -

 

ॐ श्री तुलस्यै विद्महे।

विष्णु प्रियायै धीमहि।

तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्।।

 

- पूजा व मंत्र जप में हुई त्रुटि की प्रार्थना आरती के बाद कर फल का प्रसाद ग्रहण करें।


Sunday, November 10, 2013

हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विराट स्वरूप का वर्णन है। महाप्रतापी अर्जुन को इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कराकर कर्मयोगी भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के महामंत्र द्वारा अर्जुन के साथ संसार के लिए भी सफल जीवन का रहस्य उजागर किया।

भगवान का विराट स्वरूप ज्ञान शक्ति और ईश्वर की प्रकृति के कण-कण में बसे ईश्वर की महिमा ही बताता है। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन, नर-नारायण के अवतार थे और महायोगी, साधक या भक्त ही इस दिव्य स्वरूप के दर्शन पा सकता है। किंतु गीता में लिखी एक बात यह भी संकेत करती है सांसारिक जीवन में साधारण इंसान के लिए ऐसा तप करना कठिन हो तो उसे हर रोज पवित्र गीता से जुड़ा क्या उपाय करना चाहिए, जिसके शुभ प्रभाव जीवन में भलाई हो।

श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय में ही देवी लक्ष्मी द्वारा भगवान विष्णु के सामने यह संदेह किया जाता है कि आपका स्वरूप मन-वाणी की पहुंच से दूर है तो गीता कैसे आपके दर्शन कराती है? तब जगत पालक श्री हरि विष्णु गीता में अपने स्वरूप को उजागर करते हैं, जिसके मुताबिक -

पहले पांच अध्याय मेरे पांच मुख, उसके बाद दस अध्याय दस भुजाएं, अगला एक अध्याय पेट और अंतिम दो अध्याय श्रीहरि के चरणकमल हैं।

धार्मिक नजरिए से गीता के अट्ठारह अध्याय भगवान की ही ज्ञानस्वरूप मूर्ति है, जो पढ़, समझ और अपनाने से पापों का नाश कर देती है। इस संबंध में लिखा भी गया है कि कोई इंसान अगर हर रोज गीता के अध्याय या श्लोक  के एक, आधे या चौथे हिस्से का भी पाठ करता है, तो उसके सभी अभाव, दोष व पापों का अंत हो जाता है।

Friday, November 8, 2013

हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवतगीता में श्रीकृष्ण के भक्तों पर स्नेह लुटाने वाले देव स्वरूप यानी भक्त वत्सलता की महिमा बताई गई है, जो यह साबित करती है कि भगवान श्रीकृष्ण भक्ति भाव के भूखे हैं, न कि बिना भक्ति भाव के दिखावे के  लिए चढ़ाए तरह-तरह की सुंदर और महंगी चीजों के। गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि -

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भक्त्या प्रयच्छति।

तदहं भक्त्युपह्रतमश्रामि प्रयतात्मन:।।

जिसका सरल शब्दों में मतलब है मेरे लिए निस्वार्थ और प्रेम भाव से चढ़ाए गए फूल, फल और जल आदि को मैं बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लेता हूं।

ऐसे ही भक्तप्रेमी भगवान के स्मरण के लिए शास्त्रों में एक ऐसा मंत्र बताया गया है, जिसका स्मरण भगवान विष्णु व कृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन कराने वाला माना गया हैं। कार्तिक माह की देवउठनी एकादशी (13 नवंबर) पर भगवान विष्णु व श्रीकृष्ण भक्ति की शुभ घड़ी में तो यह मंत्र हर तरह से मंगलकारी व कामनाओं को पूरा करने वाला माना गया है।

इस मंत्र के स्मरण से पहले स्नान से पवित्र होकर भगवान श्रीकृष्ण को मात्र गंध, फूल चढ़ाकर माखन का भोग लगाएं

एकादशी पर इस मंत्र जप से कृष्ण पूजा और आरती अपार सुख-संपत्ति, ऐश्वर्य और वैभव देने वाली होती है। जानिए कौन सा है यह मंत्र -

ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।

शास्त्रों के मुताबिक इस मंत्र के पहले पद क्लीं से पृथ्वी, दूसरे पद कृष्णाय से जल, तीसरे पद गोविन्दाय से अग्रि, चौथे पद गोपीजनवल्लभाय से वायु और पांचवे पद स्वाहा से आकाश की रचना हुई। इस तरह यह श्रीकृष्ण के विराटस्वरूप का मंत्र रूप में स्मरण है।


Friday, November 1, 2013

दीपावली के एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन मुख्य रूप से मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है। इस बार यह पर्व 2 नवंबर, शनिवार को है। नरक चतुर्दशी का पर्व मनाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। उन्हीं में से एक कथा नरकासुर वध की भी है जो इस प्रकार है-  

प्रागज्योतिषपुर नगर का राजा नरकासुर नामक दैत्य था। उसने अपनी शक्ति से इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु आदि सभी देवताओं को परेशान कर दिया। वह संतों को भी त्रास देने लगा। महिलाओं पर अत्याचार करने लगा। उसने संतों आदि की 16 हजार स्त्रियों को भी बंदी बना लिया। जब उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवताओं व ऋषिमुनि भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए। 

भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें नराकासुर से मुक्ति दिलाने का आश्वसान दिया लेकिन नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया तथा उन्हीं की सहायता से नरकासुर का वध कर दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। 

 

Wednesday, October 30, 2013

हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवतगीता में श्रीकृष्ण के भक्तों पर स्नेह लुटाने वाले देव स्वरूप यानी भक्त वत्सलता की महिमा बताई गई है, जो यह साबित करती है कि भगवान श्रीकृष्ण भक्ति भाव के भूखे हैं, न कि बिना भक्ति भाव के दिखावे के  लिए चढ़ाए तरह-तरह की सुंदर और महंगी चीजों के। गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि -

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भक्त्या प्रयच्छति।

तदहं भक्त्युपह्रतमश्रामि प्रयतात्मन:।।

जिसका सरल शब्दों में मतलब है मेरे लिए निस्वार्थ और प्रेम भाव से चढ़ाए गए फूल, फल और जल आदि को मैं बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लेता हूं।

ऐसे ही भक्तप्रेमी भगवान के स्मरण के लिए शास्त्रों में एक ऐसा मंत्र बताया गया है, जिसका स्मरण भगवान विष्णु व कृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन कराने वाला माना गया हैं।

इस मंत्र के स्मरण से पहले स्नान से पवित्र होकर श्रीकृष्ण को मात्र गंध, फूल चढ़ाकर माखन का भोग लगाएं और नीचे लिखा मंत्र जप कर धूप, दीप से आरती करें। एकादशी पर इस मंत्र जप से कृष्ण पूजा और आरती अपार सुख-संपत्ति, ऐश्वर्य और वैभव देने वाली होती है। जानिए यह मंत्र -

ऊँ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।

शास्त्रों के मुताबिक इस मंत्र के पहले पद क्लीं से पृथ्वी, दूसरे पद कृष्णाय से जल, तीसरे पद गोविन्दाय से अग्रि, चौथे पद गोपीजनवल्लभाय से वायु और पांचवे पद स्वाहा से आकाश की रचना हुई। इस तरह यह श्रीकृष्ण के विराटस्वरूप का मंत्र रूप में स्मरण है।   

Friday, July 19, 2013

हिंदू धर्म में चातुर्मास (देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक का समय) का विशेष महत्व है। चातुर्मास में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते और धार्मिक कार्यों पर  अधिक ध्यान दिया जाता है। चातुर्मास के अंतर्गत सावन, भादौ, अश्विन व कार्तिक मास आता है। इस बार चातुर्मास का प्रारंभ 19 जुलाई, शुक्रवार से हो रहा है।
 ऐसा माना जाता है कि इस दौरान भगवान विष्णु विश्राम करते हैं। हमारे धर्म ग्रंथों में चातुर्मास के दौरान कई नियमों का पालन करना जरुरी बताया गया है तथा उन नियमों का पालन करने से मिलने वाले फलों का भी वर्णन किया गया है।

चातुर्मास में ये करें-
- शारीरिक शुद्धि या सुंदरता के लिए परिमित प्रमाण (संतुलित मात्रा) के पंचगव्य (गाय का दूध, दही, घी, गोमूत्र, गोबर) का सेवन करें।
- वंश वृद्धि के लिए नियमित रूप से दूध पीएं।
- पापों के नाश व पुण्य प्राप्ति के लिए एकभुक्त (एक समय भोजन), अयाचित (बिना मांगा) भोजन या सर्वथा उपवास करने का व्रत ग्रहण करें।

चातुर्मास में ये न करें-
- मधुर स्वर के लिए गुड़ का त्याग करें।
- दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का सेवन न करें।
- सौभाग्य के लिए मीठे तेल का सेवन न करें।
- प्रभु शयन(चातुर्मास) के दिनों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य जहां तक हो सके न करें। पलंग पर सोना, पत्नी का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया दही-भात आदि का भोजन करना, हरी सब्जी, मूली एवं बैंगन भी नहीं खाना चाहिए।

देवशयनी एकादशी शुक्रवार से अगले 117 दिन तक देव सोएंगे। देवताओं के शयन काल में मुहूर्त नहीं निकलने से शादी-ब्याह या कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होंगे। चातुर्मास में लोग मंदिरों-आश्रमों में कथा श्रवण एवं भगवान के भजन-कीर्तन करेंगे।

साधु-संत भी विहार बंद कर प्रवचनों की रसवर्षा करेंगे।

लग्न व मांगलिक कार्य हेतु शुभ मुहूर्त के लिए लोगों को देव उठनी एकादशी 13 नवंबर को देवताओं के जागने तक चार महीने लंबा इंतजार करना पड़ेगा।

इसलिए शादी नहीं

चातुर्मास के चार मास में कर्क, सिंह, कन्या और तुला संक्रांति काल में मुहूर्त नहीं निकलते हैं, इसलिए विवाह आदि वर्जित है।

चातुर्मास में ये करें

चिंतन-मनन, भजन-कीर्तन, निष्काम हवन-पूजन, दान-पुण्य, व्रत, कथा श्रवण।

ये बिल्कुल न करें

विवाह, शुभ कार्य, उपनयन संस्कार, सकाम पूजा-अनुष्ठान, उत्तर दिशा में यात्रा।

जानें क्या है चातुर्मास

इसे चातुर्य मास भी कहते हैं अर्थात चतुराई से व्यवहार करने के मास।

आरंभ गुरु पूर्णिमा (इस बार 22 जुलाई) पर गुरु के सान्निध्य से।

प्रथम श्रावण

श्रावण यानि श्रवण (सुनने) का समय, प्रभु के भजन-कीर्तन कर कथा श्रवण करें।

द्वितीय भाद्र

भाद्र यानि श्रेष्ठ और पद यानि पैर। श्रेष्ठ कार्य के लिए कदम बढ़ाएं।

तृतीय आश्विन

ये संयम का मास है। पितृ-देवी अर्चन कर संयमित जीवन का संकल्प लें।

चौथा कार्तिक

कार्तिक में क क्रिया को दर्शाता है। इसमें क्रिया को प्रसारित कर आगे बढ़ें, तभी लक्ष्मी प्राप्ति संभव है।

 9 का योग शुभता का सूचक

देव शयनी 19 जुलाई से देव उठनी एकादशी तक कुल 117 दिन देव सोकर जागेंगे। 117 का जोड़ 9 है। अंक ज्योतिष में 9 शुभता का सूचक है, जो 9 ग्रहों से मिलकर अच्छे योग बनाएगा।


Tuesday, July 9, 2013









हिन्दू धर्म में ईश्वर की निकटता और आध्यात्मिक आनंद पाने के लिए कई धार्मिक विधान और परंपराएं प्राचीन काल से चली आ रही है। इनके पालन से जीवन में अनुशासन, नियम और संयम बना रहता है और साथ ही धार्मिक गतिविधियों के द्वारा आपसी मेल-मिलाप बढ़ता है। मानव की एक-दूसरे के प्रति भावनाओं और संवेदनाओं को बल मिलता है, साथ-साथ इंसान धर्म और मानवीय भावों से भी जुड़ा रहता है।

हिन्दू धर्म के चार प्रमुख धामों में एक पुरी स्थित जगन्नाथ धाम की वार्षिक रथयात्रा ऐसी ही धार्मिक परंपराओं में शामिल है। इस रथयात्रा में हर साल तीन विशाल और सुंदर रथों पर भगवान जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा नगर यात्रा पर निकलते हैं।

रथयात्रा में शामिल काष्ठ यानी लकड़ी से बने तीन रथों की विशालता, ऊंचाई, सजावट और सुंदरता के साथ भक्ति संगीत में डूबे देश-विदेश से आए भक्तों को देखकर हर धर्मावलंबी अध्यात्म की गहराई में डूब जाता है। संभवत: कई श्रद्धालु इस रोचक बात को नहीं जानते हैं कि यह तीन रथ हर साल नए बनाए जाते हैं और रथयात्रा के बाद रथों को विधि-विधान से तोड़ दिया जाता है। किंतु इन रथों को बनाने और तोड़ने की भी विधिवत और मर्यादित पंरपरा है। स्लाइड्स के जरिए जानिए हैं इन विशाल रथों को बनाने के तरीकों से जुड़ी दिलचस्प बातें व रथयात्रा के बाद रथों से जुड़ीं परंपरा क्या है, जो कई लोग नहीं जानते -


भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के लिए प्रतिवर्ष वैशाख मास की शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया या आखा तीज के पुण्य दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों का निर्माण शुरु होता है, जो लगभग दो माह में बनकर तैयार हो जाते हैं।  हर रथ निर्धारित आकार का बनाया जाता है। इनको बनाने में मंदिर की प्राचीन परंपराओं में नियत निर्देशों का कठोरता से पालन किया जाता है। इन रथों के निर्माण करने वाले बढ़ई यानि कारपेंटर अनुवांशिक अधिकार से यह कार्य करते आ रहें हैं। इन रथों के निर्माण से जुड़ी ओर भी रोचक बाते हैं -

इन रथों को बनाने वाले काष्ठ शिल्पी और कारीगर रथों के निर्माण के समय लकड़ी के टुकड़ों को नापने के लिए किसी इंच टेप या स्केल का उपयोग न कर हाथ और अंगुलियों से नापकर ही विशाल रथ बना देते हैं। यह सुंदर देशी काष्ठ शिल्प और नक्काशी का अद्भुत नमूना होता है।



रथ का निर्माण साल की लकड़ी से होता है। इसमें लगभग 2000 लकड़ी के टुकड़े उपयोग किए जाते हैं,जिन्हें समीप के दशपल्ला और रनापुर के वनों से लाया जाता है।




रथों को बनाने के इस पुण्य कार्य मे सवा सौ कारपेंटर लगते हैं। चूंकि इस कार्य में लकड़ी का उपयोग होता है, जो पेड़ों से ही मिलती है। इसलिए इस लकड़ी की जरूरत को पूरा करने के लिए हजारों की संख्या में नए पौधों को लगाया जाता है।


तीन रथों में हर रथ में 9 उपदेवता, दो द्वारपाल और एक सारथी भी विराजित होते हैं। इनका निर्माण भी लकड़ी से होता है। हर रथ में 18 खंबे और सीढ़ियां भी बनाई जाती है। इस रथ में लगने वाली लोहे की सामग्री का कार्य स्थानीय लुहारों द्वारा किया जाता है।

आषाढ़ शुक्ल दशमी को रथयात्रा संपन्न होने के बाद लकड़ी के इन तीन रथों को तोड़ दिया जाता है। इन तीन रथों को तोड़ने से निकली लकड़ियों को महाप्रसाद बनाने के लिए देवस्थान की रसोई में जलाने के लिए उपयोग किया जाता है या फिर भक्त इनको भगवान के आशीर्वाद के रूप में खरीद लेते हैं।

Saturday, July 6, 2013

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ज़िंदगी में कर्म यानी काम ही खुशियां और कामयाबी पाने का सबसे बेहतर उपाय है। किंतु ऐसा काम ही वास्तविक और लंबा सुख देता है, जो निस्वार्थ भावना से किया जाए, क्योंकि ऐसा करने से अपेक्षा और आसक्ति न होने से मन में कलह पैदा नहीं होता। 
सुख और सफल जीवन में कर्म की इसी अहमियत को भगवान श्रीकृष्ण ने पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवदगीता में कर्मयोग के सिद्धांत के जरिए उजागर किया। असल में, यह ऐसा महामंत्र है, जिससे हर इंसान दु:ख और परेशानियों से दूर रहकर जिंदगी को कामयाब बना सकता है।
अक्सर धर्म और अध्यात्म से दूर इंसान जीवन में कई मौकों पर सुख व आनंद पाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण की कई लीलाओं को सामने रख स्वार्थ पूरे करने से नहीं चूकता, किंतु सफलता के सूत्र कर्मयोग सिद्धांत की गहराई को समझने से दूर भागता है।

असल में, सांसारिक जीवन के नजरिए से युद्ध की तरह संघर्ष से भरे जीवन में हर इंसान के सामने ऐसी बुरी स्थितियां भी आती है, जब मानसिक दशा अर्जुन की तरह हो जाती है। इंसान कई मौकों पर हथियार डाल कर्म से परे भी हो जाता है।
ऐसी ही स्थिति में कर्मयोग औषधि का काम कर ऊर्जावान बनाता है। यह सिखाता है कि कर्म करो और फल की आसक्ति को छोड़ो। किंतु इस संबंध में तीन अलग-अलग स्वभाव के इंसान जिनको रज, तम और सत गुणी माना जाता है तीन तर्क देते हैं -

तमोगुणी का विचार होता है जब फल या नतीजे छोडऩा ही है तो कर्म क्यों करें?
- रजोगुणी सोचता है काम कर उससे मिलने वाले फल का लाभ व हक मेरा हो। 
- जबकि सतोगुणी सोचता है कि काम करें किंतु फल या नतीजों पर अपना अधिकार न समझें।
इन तीन विचारों में सत्वगुणी का नजरिया ही कर्म योग माना जाता है। क्योंकि ऐसे इंसान की सोच होती है कि वह ऐसा काम करें, जिसमें स्वार्थ पूर्ति या उनके नतीजों के लाभ पाने की आसक्ति या भाव न हो। यही नहीं इसी सोच में तमोगुणी के काम से बचने और रजोगुणी के फल पर अधिकार की सोच दूर रहती है। यही स्थिति निष्काम कर्म के लिये प्रेरित करती है, जिससे इंसान हर स्थिति में सुख और सफलता प्राप्त करता चला जाता है।

Sunday, June 23, 2013



शास्त्रों में कृष्ण भक्ति आनंद, सुख और सौभाग्य लाने वाली मानी गई है। श्रीकृष्ण की हर लीला भी कलह नाशक ही नहीं, बल्कि हर इंसान को अपनी गुण और शक्तियों को पहचान उनसे सफलता पाने का संदेश देती हैं। श्रीकृष्ण द्वारा बताया गया कर्मयोग भी कलह और दु:खों से मुक्त रहने का सबसे श्रेष्ठ और बेजोड़ सूत्र है। 

 

इस तरह श्रीकृष्ण चरित्र कर्म से सफलता की प्रेरणा देता है। यही नहीं, श्रीमद्भगदगीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा है कि स्वाभाविक कर्तव्यों को पूरा करते चले जाना भी देव पूजा  की तरह है।

 

श्रीकृष्ण को इष्ट मानने वाले उन कामकाजी लोगों के लिए ही, जो विशेष त्योहार व उत्सवों पर घर से दूर होते हैं या इष्ट की पूजा का बेहद कम वक्त निकाल पाते हैं,  यहां बताए जा रहे हैं भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण पूजा के सरल उपाय, खासतौर पर विष्णु भक्ति की शुभ घड़ी पूर्णिमा  या हर रोज भी भक्ति और आस्था से अपनाएं तो हर परेशानी से छुटकारा मिलता है, साथ ही तरक्की भी।

सुबह पूजा के पहले स्नान करें।  भगवान श्रीकृष्ण बालकृष्ण की मृर्ति को गंगाजल और पंचामृत (गाय का दूध, दही, घी, शहद व शक्कर) स्नान कराएं।  

स्नान सामग्री जुटाना संभव न हो तो या तस्वीर पर ही कुंकुम, सुगंधित फूल या हार चढ़ाएं, अक्षत, पीले वस्त्र चढ़ाएं।

तुलसी के पत्ते यह मंत्र बोलते हुए चढ़ाएं-

तुलसी हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम्।

भवमोक्षप्रदातुभ्यं गृहाण परमेश्वर।।

श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएं।  फल चढ़ाएं। मिठाई (शक्कर भी) नैवेद्य के रूप में चढ़ा सकते हैं।

सुगंधित धूप और दीप प्रज्जवलित कर नीचे लिखे कृष्ण मंत्रों का आस्था से कलहनाश की कामना से स्मरण करें -

 

- ऊँ नमो भगवते गोविन्दाय

- ऊँ नमो भगवते नन्दपुत्राय

- ऊँ कृष्णाय गोविन्दाय नमो नम:

 

मंत्र ध्यान के बाद भगवान कृष्ण या विष्णु की आरती करें। प्रसाद बांटे और ग्रहण करें। पूजा, आरती में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थना करें।


Sunday, June 2, 2013

हो तो तुम पास ही मेरे
ओह मेरे श्याम

पर नजाने क्यों दर्शन ना देते हो श्याम
तेरी ही मूरत मन में बसी हैं घनशयाम
बसी हैं बन्सीवाले की बाँकी अदा
जिसने सारे जग को दीवाना हैं किया

मोर मुकुट
लगाये घूमते हो हिये में हमारे

बंसी बजाके हिये को चुरा के
अब चित चोर तुम जाते हो कहा
आँखों का पर्दा तो हटा दो...

कोई चाँद से मुहब्बत करता है ......
कोई सूरज से मुहब्बत करता है .........
कोई धन दौलत से मुहब्बत करता है ........
कोई खुद से मुहब्बत करता है ........
लेकिन हम तो वोह दीवाने है जो उसको मुहब्बत करते हैं .......
जो मेरे श्री श्याम से मुहब्बत करता है ......

एक बार राधा कहे प्राणी पावन होत
हरी पधारे तासु मन और जगे प्रेम की ज्योत
जगे प्रेम की ज्योत सांवरो हिये बिराजे
मोर मुकुट और बांसुरी पीताम्बर साजे
श्री वृन्दावन वास मिले हो प्रेम अगाधा

... तेरो हो जीवन कल्याण कहे इक बार जो राधा
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा
श्री राधा जय राधा राधा राधा राधा राधा राधा

Thursday, May 30, 2013

हो तो तुम पास ही मेरे ओह मेरे श्याम
पर नजाने क्यों दर्शन ना देते हो श्याम
तेरी ही मूरत मन में बसी हैं घनशयाम
बसी हैं बन्सीवाले की बाँकी अदा
जिसने सारे जग को दीवाना हैं किया
मोर मुकुट लगाये घूमते हो हिये में हमारे
बंसी बजाके हिये को चुरा के
अब चित चोर तुम जाते हो कहा
आँखों का पर्दा तो हटा दो... HARE KRISHNA...

Wednesday, May 22, 2013


वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नृसिंह जयंती का पर्व मनाया जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस बार यह पर्व कल यानी 23 मई, गुरुवार को है। इस दिन भगवान नृसिंह के निमित्त व्रत रखा जाता है। इस  व्रत की विधि इस प्रकार है-
नृसिंह जयंती के दिन सुबह जल्दी नित्य कर्मों से निवृत्त होकर व्रत के लिए संकल्प करें।  इसके बाद दोपहर में नदी, तालाब या घर पर ही वैदिक मंत्रों के साथ मिट्टी, गोबर, आंवले का फल और तिल लेकर उनसे सब पापों की शांति के लिए विधिपूर्वक स्नान करें। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर संध्या तर्पण करें। अब पूजा स्थल को गाय के गोबर से लीपकर उसमें अष्टदल कमल बनाएं। 
कमल के ऊपर पंचरत्न सहित तांबे का कलश स्थापित करें। कलश के ऊपर चावलों से भरा हुआ बर्तन रखें और बर्तन में अपनी शक्ति के अनुसार सोने की लक्ष्मीसहित भगवान नृसिंह की प्रतिमा रखें। इसके बाद दोनों मुर्तियों को पंचामृत से स्नान करवाएं। योग्य विद्वान ब्राह्मण (आचार्य) को बुलाकर उनसे भगवान की पूजा करवाएं। फिर उस ब्राह्मण के हाथों फूल व षोडशोपचार सामग्रियों से विधिपूर्वक भगवान नृसिंह का पूजन करवाएं। 
भगवान नृसिंह को चंदन, कपूर, रोली व तुलसीदल भेंट करें तथा धूप-दीप दिखाएं। इसके बाद घंटी बजाकर आरती उतारें और नीचे लिखे मंत्र के साथ भोग लगाएं-
नैवेद्यं शर्करां चापि भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्।
ददामि ते रमाकांत सर्वपापक्षयं कुरु।।
(पद्मपुराण, उत्तरखंड 170/62)
अब भगवान नृसिंह से सुख की कामना करें। रात में जागरण करें तथा भगवान नृसिंह की कथा सुनें। 
दूसरे दिन यानी पूर्णिमा के दिन स्नान करने के बाद फिर से भगवान नृसिंह की पूजा करें। ब्राह्मणों को दान दें उन्हें भोजन करवाएं व दक्षिणा भी दें। इसके बाद पुन: भगवान नृसिंह से मोक्ष की प्रार्थना करें। अंत में आचार्य (पूजन करने वाला ब्राह्मण) को दक्षिणा से संतुष्ट करके विदा करें तत्पश्चात स्वयं भोजन करें।
धर्म ग्रंथों के अनुसार जो इस प्रकार नृसिंह चतुर्दशी के पर्व पर भगवान नृसिंह की पूजा करता है उसके मन की हर कामना पूरी हो जाती है। उसे मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।



व्यक्ति या व्यवस्था में पैदा हुई दु:खदायी बुराइयों और दोषों का अंत करने के लिए निर्भय होकर ऐसी असाधारण कोशिशों और विचारों की जरूरत होती हैं, जो पवित्र और परोपकार की भावना से भरे हों, जिनको सही वक्त और मौके को चुनने और भुनाने से सफल व संभव बनाया जा सकता है। किंतु इस दौरान पैदा संघर्ष और कठिनाइयों से जूझने का मजबूत जज्बा भी सफलता के लिए सबसे अहम होता है। 
 
ऐसे ही जीवन सूत्रों से भरा है भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार का प्रसंग, जिसका शुभ काल वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को माना जाता है। पढ़ें और भगवान नृसिंह की उग्रता से सीख लें कि कैसे बुराई पर चढ़ाई कर जीवन में सुखद बदलाव लाएं- 
 
जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर राक्षस हिरण्याक्ष का संहार किया, तो उसका भाई हिरण्यकशिपु उनका शत्रु बन गया। उसने घोर तप से ब्रह्मदेव से अमर होने का यह वरदान पाया कि वह न दिन में, न रात में, न मनुष्य से, न पशु से, न शस्त्र से न अस्त्र से, न घर में न बाहर, न जमीन पर न आसमान में और न भगवान विष्णु के हाथों मृत्यु को प्राप्त होगा। 
 
अमरत्व के वरदान से अहंकार में चूर हिरण्यकशिपु ने इंद्र समेत सभी देवताओं पर हमला बोला। पूरी प्रजा को मात्र उसकी भक्ति और पूजा करने के लिए सताया। किंतु स्वयं हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रहलाद ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। 
 
हिरण्यकशिपु ने उसको भी विष्णु भक्ति से रोकने के लिए अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर जलाने, हाथी के पैर से कुचलने, पहाड़ से फेंककर मारने, तेल के कड़ाव में बैठाने जैसे यातनाएं दी। किंतु विष्णु भक्ति पर अडिग प्रहलाद विष्णु कृपा से बचा गया। 
 
विष्णु भक्ति का ऐसा असर देख हिरण्युकशिपु ने आपा खो दिया। तब अंत में जब उसने प्रहलाद को एक गर्म लोहे के खंबे पर बांधने का आदेश दिया। तब भगवान विष्णु ने भक्त प्रहलाद के प्राणों की रक्षा, भक्ति का मान रखने और हिरण्यकशिपु की यातना से जगत को छुटकारा देने के लिए वही खंबा फाड़कर आधे नर व आधे सिंह के उग्र रूप नृसिंह अवतार में प्रकट हो दुष्ट हिरण्यकशिपु का पेट अपने नाखूनों से चीरकर उसका अंत कर दिया। 
 
हिरण्यकशिपु के वध के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार के लिए ऐसा समय, रूप और तरीका चुना, जो हिरण्युकशिपु के वरदान की सारी बातों की काट करता हो। भगवान नृसिंह अवतार, जो आधा मानव और आधा सिंह का रूप था, लेकर गोधूलि बेला में प्रकट हुए। उन्होंने हिरण्यकशिपु को दरवाजे की दहलीज पर बैठकर उसे अपनी जंघा पर रखा और अपने नाखूनों से चीर संहार किया। 
 
इस प्रकार जब हिरण्यकशिपु का अंत हुआ तब वह घर में था, न घर के बाहर, न जमीन पर था, न आसमान पर, वह न अस्त्र से मरा न शस्त्र से, न दिन में मरा, न रात में। इन सबसें रोचक एक ओर बात है कि भगवान विष्णु ने हिरण्यकशिपु के लिए उस काल को चुना जो बारह मासों से अलग था, वह था भगवान विष्णु का प्रिय मास पुरुषोत्तम मास, जो हिरण्युकशिप जैसे दुष्ट के विचारों से भी बाहर था।
 
वहीं जगत को संदेश दिया कि अपनी या दूसरों की बुराइयों और दुर्गुणों का अंत करने के लिए नामुमकिन कोशिशें जरूरी है, चाहे परिस्थितियां कितनी ही विषम हो। साथ ही धर्म और सदाचरण के प्रतीक भक्त प्रहलाद की भक्ति यह संदेश देती है कि भक्ति को कर्म की तरह नहीं, बल्कि कर्म को भक्ति का रूप देकर उसमें लीन होने पर ही देव रूपी सफलता जरूर मिलती है।

Tuesday, May 21, 2013

हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवतगीता में श्रीकृष्ण के भक्तों पर स्नेह लुटाने वाले देव स्वरूप यानी भक्त वत्सलता की महिमा बताई गई है, जो यह साबित करती है कि भगवान श्रीकृष्ण भक्ति भाव के भूखे हैं, न कि बिना भक्ति भाव के दिखावे के  लिए चढ़ाए तरह-तरह की सुंदर और महंगी चीजों के। गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि -

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भक्त्या प्रयच्छति।

तदहं भक्त्युपह्रतमश्रामि प्रयतात्मन:।।

जिसका सरल शब्दों में मतलब है मेरे लिए निस्वार्थ और प्रेम भाव से चढ़ाए गए फूल, फल और जल आदि को मैं बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लेता हूं।

ऐसे ही भक्तप्रेमी भगवान के स्मरण के लिए शास्त्रों में एक ऐसा मंत्र बताया गया है, जिसका स्मरण भगवान विष्णु व कृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन कराने वाला माना गया हैं।

इस मंत्र के स्मरण से पहले स्नान से पवित्र होकर श्रीकृष्ण को मात्र गंध, फूल चढ़ाकर माखन का भोग लगाएं और नीचे लिखा मंत्र जप कर धूप, दीप से आरती करें। एकादशी पर इस मंत्र जप से कृष्ण पूजा और आरती अपार सुख-संपत्ति, ऐश्वर्य और वैभव देने वाली होती है। जानिए यह मंत्र -

ऊँ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।

शास्त्रों के मुताबिक इस मंत्र के पहले पद क्लीं से पृथ्वी, दूसरे पद कृष्णाय से जल, तीसरे पद गोविन्दाय से अग्रि, चौथे पद गोपीजनवल्लभाय से वायु और पांचवे पद स्वाहा से आकाश की रचना हुई। इस तरह यह श्रीकृष्ण के विराटस्वरूप का मंत्र रूप में स्मरण है।