Saturday, March 16, 2013

हिन्दू धर्म में तुलसी का पौधा बहुत पवित्र माना जाता है। हिन्दू धर्मग्रंथ भगवान विष्णु और वृंदा यानी तुलसी के विवाह के प्रसंग उजागर करते हैं। यही वजह है कि तुलसी को विष्णुप्रिया भी कहा गया है। इसी आस्था से घर के आंगन में लगा तुलसी का पौधा कलह और दरिद्रता दूर करने वाला माना जाता है।

वैज्ञानिक परीक्षणों ने भी साफ किया है कि तुलसी का पौधा औषधीय गुणों वाला होता है। इसकी गंध रोगाणुनाशक होती है। इसका रस शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाला होता है। यहां तक कि तुलसी के पौधे में मौजूद विद्युत ऊर्जा कई तरह के दुष्प्रभावों से बचाती है।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि धर्म ही नहीं विज्ञान भी मानता है कि धर्मशास्त्रों में बताई तुलसी पूजा, दर्शन और परिक्रमा की परंपरा सभी दु:खों व विपत्तियों से बचाती है। धार्मिक महत्व के नजरिए से इनसे पापों का नाश होता है और सुख की सभी कामनाएं पूरी होती है।


सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहन तुलसी के पौधे पर गंध, पुष्प, छोटा वस्त्र, कलेवा, अक्षत चढ़ाकर यथाशक्ति प्रसाद का भोग लगाएं। इसके बाद 108 बार, संभव न हो तो 11 या 1 बार ही तुलसी का स्मरण इस मंत्र के साथ करते हुए परिक्रमा लगाएं -

महाप्रसाद जननी सर्वसौभाग्यवर्द्धिनी।
आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते।।

- तुलसी की ऐसी पूजा, दर्शन और स्मरण घर-परिवार की संकट से रक्षा कर सुख-सौभाग्य बढ़ाने वाली मानी गई है।

Tuesday, March 12, 2013

"मन के हारे हार है, मन के जीते जीत" यह बात साफ करती है कि मनोदशा भी अच्छे या बुरे नतीजे तय करती है। क्योंकि मन का स्वभाव चंचल माना गया है। शास्त्रों में भी यह बताया गया है कि जहां मन की एक स्थिति मोह में बांध दुःख की वजह सकती है, तो वही यही मन सुख व मोक्ष की राह पर भी ले जाता है। यानी मन अगर साफ और स्थिर हो तो इंसान सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंच जाता है, वहीं बुरे भाव से भरी, चंचल या अस्थिर मनोदशा व्यक्ति का पतन कर देती है।
व्यावहारिक जीवन में मन की अच्छी या बुरी स्थिति सुख-दु:ख का कारण बनती है। चूंकि हर इंसान सदा सुखी रहना चाहता है, किंतु भटकता मन इस कामना में बाधा बनता है। इसलिए सुख में बाधा बने मन को अगर चंचलता से बचाना है तो हिन्दू धर्मग्रंथ गीता में बताए सूत्र कारगर हो सकते है।

लिखा है कि -
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।
सार है कि चंचल मन को रोकना कठिन है। किंतु अभ्यास और वैराग्य भाव से इस पर काबू पाया जा सकता है।
व्यावहारिक रूप से संकेत है कि अगर मन को स्थिर और शुद्ध बनाना है तो एक लक्ष्य साधें। अच्छे विचारों के साथ उस मकसद को पाने के लिए ध्यान लगाया जाए। इस दौरान विपरीत या नकारात्मक विचारों से मन कितना भी भटके सही सोच के साथ लक्ष्य पर ही ध्यान साधें रखें। बाकी सभी बुरी भावनाओं पर ध्यान ही न दिया जाए यानी वैराग्य भाव बना लें।
इस तरह एक स्थिति में मन की स्थिर हो जाएगा। मन को पवित्र बनाने के लिये बहुत जरूरी है कि लगातार अच्छे विचारों का मनन और चिंतन किया जाए। जिससे मन से बुरे विचार और भाव अपने आप ही निकल जाएंगे।

Tuesday, March 5, 2013

10 मार्च, रविवार को महाशिवरात्रि का पर्व है। इस दिन भगवान महादेव की विशेष पूजा की जाती है। धर्म ग्रंथों में भगवान शंकर के अनेक अवतारों का वर्णन मिलता है। उनमें से एक अवतार ऐसा भी है जो आज भी अपनी मुक्ति के लिए भटक रहा है। ये अवतार है द्रोणाचार्य के पुत्र महाक्रोधी अश्वत्थामा का।
महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक अश्वत्थामा थे। ये कौरवों व पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र थे। महाभारत के अनुसार अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के सम्मिलित अंशावतार थे। अश्वत्थामा अत्यंत शुरवीर, प्रचंडक्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। महाभारत संग्राम में अश्वत्थामा ने कौरवों की सहायता की थी।

- हनुमानजी आदि आठ अमर लोगों में अश्वत्थामा का नाम भी आता है। इस विषय में एक श्लोक प्रचलित है-
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
अर्थात अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय ये आठों अमर हैं।
शिवमहापुराण(शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं किंतु उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है।

आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर की तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर यह वरदान प्राप्त किया कि वे उनके पुत्र के रूप मे अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। द्रोणाचार्य और उनकी पत्नी कृपी के एकमात्र पुत्र अश्वत्थामा थे। धर्म ग्रंथों के अनुसार द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा इसलिए कहलाए क्योंकि जन्म के समय अश्वत्थामा उच्चै:श्रवा घोड़े के समान इतनी जोर से चिल्लाए थे कि तीनों लोक कांप गए थे। अत: आकाशवाणी ने इसका नाम अश्वत्थामा रखा। शास्त्रों में इसका उल्लेख है-
अलभद् गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमेव च।
स जातमात्रौ व्यनदद् यथैवोच्चै:श्रवाहय:॥            
- महाभारत आदिपर्व 129/47
अर्थ- गौतमी कृपी (शरद्वान की पुत्री) ने द्रोण से अश्वत्थामा नामक पुत्र प्राप्त किया। उस बालक ने जन्म लेते ही उच्चै:श्रवा घोड़े के समान शब्द किया।

- महाभारत के युद्ध समाप्ति के बाद अश्वत्थामा ने ही पांडवों के पुत्रों का छल से वध किया था। पुत्रशोक में जब पांडवों ने श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा किया तो वे भाग गए। फिर भी जब अर्जुन ने उनका पीछा न छोड़ा तब अश्वत्थामा ने अर्जुन के ऊपर ब्रह्मास्त्र फेंका। उत्तर में अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। तब महर्षि वेदव्यास के कहने पर अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस लौटा लिया लेकिन अश्वत्थामा को ब्रह्मास्त्र लौटाने का ज्ञान नहीं था तब उसने अपने अस्त्र की दिशा बदल कर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी। क्रोधित होकर भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा के माथे पर लगी मणी निकाल ली और कलयुग के अंत तक उसे पृथ्वी पर भटकने का श्राप दिया।

भगवान शंकर का यह अवतार हमें संदेश देता है कि हमें सदैव अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए क्योंकि क्रोध ही सभी दु:खों का कारण है। यह गुण अश्वत्थामा में नहीं था। साथ ही एक और बात जो हमें अश्वत्थामा से सीखनी चाहिए वह यह कि जो भी ज्ञान प्राप्त करें उसे पूर्ण रूप से प्राप्त करें, अधूरा ज्ञान सदैव हानिकारक रहता है। अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र चलाना तो जानते थे लेकिन उसका उपसंहार करना नहीं। फिर भी उन्होंने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जिसके कारण संपूर्ण सृष्टि के नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो गया था। इस तथ्य से हमें यह शिक्षा मिलती है कि क्रोध तथा अपूर्ण ज्ञान से कभी सफलता नहीं मिलती।

Monday, March 4, 2013

गुलाब मुहब्बत का पैगाम नहीं होता
चाँद चांदनी का प्यार सरे आम नहीं होता
प्यार होता है मन कि निर्मल भावनाओं से
वर्ना यूँ ही राधा-कृष्ण का नाम नहीं होता
 


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मुझे रास आ गया है तेरे दर पे सर
झुकाना
तेरी संवरी सी सूरत मेरे मन में बस
गई है...........
ऐ संवरे सलोने अब और न सताना....मुझे
रास आ गया है तेरे दर पे सर झुकाना..
बे जर.. बे दर ...बे घर ...हूँ तेरे दर पे आ
पड़ी हूँ ....
तेरे दर ही बन गया है अब
मेरा आशियाना.......मुझे रास आ
गया है तेरे दर पे सर झुकाना..
मुझे कौन जानता था तेरी बंदगी से
पहले....मुझे कौन
जानता था तेरी बंदगी से पहले....
तेरी याद ने
बना दी मेरी जिंदगी फसाना..........मुझे
रास आ गया है तेरे दर पे सर झुकाना..
मुझे इसका गम नही है कि बदल
गया जमाना.......मुझे इसका गम
नही है कि बदल गया जमाना.......
मेरी जिंदगी के मालिक कंही तुम बदल
न जाना..मुझे रास आ गया है तेरे दर पे
सर झुकाना..
ये सर वो सर नही है जिसे रखु फिर
उठा लू....ये सर वो सर नही है जिसे
रखु फिर उठा लू....
जब चढ़ गया चरण
में ..आता नही उठाना..... मुझे रास आ
गया है तेरे दर पे सर झुकाना..
मेरी आरजू यही दम निकले तेरे दर
पे......मेरी आरजू यही दम निकले तेरे
दर पे......
अभी साँस चल रही है कंही तुम चले न
जाना ....... मुझे रास आ गया है तेरे
दर पे सर झुकाना..
मुझे रास आ गया है तेरे दर पे सर
झुकाना
तुझे मिल गई पुजारिन............... मुझे
मिल गया ठिकाना
मुझे रास आ गया है तेरे दर पे सर
झुकाना
 —

कुछ ऐसे छूया है तेरे प्यार ने
कि संभाले न संभालती हूँ
गली-गली, शहर-शहर
तेरी मीरा बनी फिरती हूँ
तलाश नहीं किसी जश्न की
बारिश कि ताल पर थिरकती हूँ
हर मौसम में हर मिजाज़ में
तेरी मीरा बनी फिरती हूँ
न पूछ मेरी दीवानगी का सबब
तू वो खुदा है जिसपर मरती हूँ
सोते-जागते, उठते-बैठते
तेरी मीरा बनी फिरती हूँ
तो क्या गर पायी न तुझे
तेरी याद में रोज़ संवरती हूँ
हँसती -खेलती, नाचती-गाती
तेरी मीरा बनी फिरती हूँ
तेरा साथ न मिल पाया तो क्या
तेरे हिज्र से गुज़र करती हूं
तेरे ख्यालों की चादर पहनकर
तेरी मीरा बनी फिरती हूं
फर्क मिट गए हैं मुझमें और तुझमें
ज़माने से अब न डरती हूं
गुजारिशों-तलब को पीछे छोड़
तेरी मीरा बनी फिरती ह
 —

कृपा सरोवर, कमल मनोहर,
कृष्ण चरण गहिए, श्री कृष्ण शरण गहिए

लीला पुरुषोतम राधावर,
राधा माधव भाव भाधा हर।
शरणागत रहिए, श्री कृष्ण शरण गहिए

आकर्षण के केंद्र कृष्ण है,
सुन्दर तम रसिकेन्द्र कृष्ण हैं।
कृष्ण कृष्ण कहिए,श्री कृष्ण शरण गहिए

सदा सर्वमय, हैं सर्वोत्तम,
क्यों ना ध्याये उनको सदा हम
सकल लाभ लहिए, श्री कृष्ण शरण गहिए...

यदि गोरे होते तो क्या करते मनमोहन,
तेरी काली सूरत पर दुनिंया मर जाती है।
हे श्याम तेरी मुरली पागल कर जाती है,
मुस्कान तेरी मीठी घायल कर जाती है। ♥

तुम सीधे होते तो न जाने क्या होता,
तेरी टेड़ी चालों पर दुनिया मर जाती है।
हे श्याम तेरी मुरली पागल कर जाती है,
मुस्कान तेरी मीठी घायल कर जाती है।


देख छवि तेरी लुट गयी मैं बनवारी

तेरे रूप ने ऐसा मुझको मोहा

मोहन ही मोहन मैं गाने लगी

मोहन से लग गयी मेरी यारी

मोहन से ही हो बात हमारी

यही अर्ज हर दम मोहन से चाहने लगी

मैं मोहन संग जब भी करू कोई बात

मोहन भी मुझे देता हैं जवाब

मगर मोहन तुम क्यों सामने आते नही

आत्मा की आवाज बन

अन्तर मन में समाए जाते हो

मगर इन आँखों का पर्दा काहे न हटाते हो

क्यों श्याम दरस न दिखाते हो
 —

Sunday, March 3, 2013


अक्सर यह देखा जाता है कि इंसान जब दु:खी हो तो उसके बोल, स्वभाव, व्यवहार में कोमलता आ जाती है। किंतु दु:ख से बाहर निकलने या फिर सुखों को पाते ही किसी न किसी रूप में अहं मन-मस्तिष्क पर हावी होने लगता है। इसके चलते बोल व बर्ताव में पैदा दोष के कारण दूसरों की उपेक्षा व अपमान भी उसे तब तक गलत नहीं लगता, जब तक कि बुरे नतीजे भुगतना न पड़े।
हिन्दू शास्त्रों में आया एक प्रसंग जीवन में ऐसे ही दु:खों से बचने के लिए खासतौर पर तीन चरित्रों का हमेशा सम्मान करने की सीख देता है। जानिए, उस प्रसंग के साथ वे तीन चरित्र, जिनका धार्मिक ही नहीं व्यावहारिक नजरिए से भी उपेक्षा जीवन के लिये घातक हो सकती है -
पौराणिक प्रसंग है कि भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारकापुरी में आए रुद्र अवतार दुर्वासा मुनि के रूप व दुबले-पतले शरीर को देख उनकी नकल करने लगा। अपमानित दुर्वासा मुनि ने साम्ब को ऐसे कृत्य के लिए कुष्ठ रोगी होने का शाप दिया। फिर भी साम्ब नहीं माना और वही कृत्य दोहराया। तब दुर्वास मुनि के एक ओर शाप से साम्ब से लोहे का एक मूसल पैदा हुआ, जो आखिरकार यदुवंश की बर्बादी की वजह बना। दरअसल, इस प्रसंग में व्यावहारिक तौर पर नीचे बताए तीन चरित्रों के सामने अहं से बचने व उनके लिए सम्मान, निष्ठा, श्रद्धा व समर्पण रखने के साथ वाणी में भी विनम्रता व मिठास को अपनाने का सबक है। साम्ब द्वारा अहंकार व दुर्भाव के वशीभूत होने से ही एक साथ 3 गलतियां करना यदुवंश को ले डूबीं। जानिए शांत व सफल जीवन के लिए किन 3 चरित्रों के साथ गलत भावनाओं को मन में स्थान न दें -
गुरु - गुरु को भगवान का ही साक्षात् रूप माना गया है। क्योंकि वह ईश्वर के समान ही ज्ञान के जरिए चरित्र को बेहतर बनाकर इंसान को नया जन्म देता है। व्यावहारिक नजरिए से भी जिस इंसान से शिक्षा, गुण, कला, कौशल प्राप्त हो,  वह गुरु पद का भागी है। धर्म और व्यवहारिक दृष्टि से ऐसे गुरु का अपमान चरित्र और व्यक्तित्व में दोष पैदा कर जीवन में तमाम सुखों से वंचित कर देता है। देवता - शास्त्रों के नजरिए से ईश्वर का स्मरण व विश्वास जीवन में संकल्प और कर्म शक्ति को हर स्थिति में मजबूत बनाए रखता है। किंतु ईश या धर्म निंदा पाप का भागी ही नहीं बनाती, बल्कि धर्म आस्था व श्रद्धा को चोट पहुंचाने से अपयश,  कलह लाकर जीवन को भी खतरे में डाल सकती है।
ब्राह्मण - ब्राह्मण को ब्रह्म का अंश माना गया है। धार्मिक परंपराओं में ब्राह्मणों से भगवान की पूजा-अर्चना, ब्राह्मण-पूजा व ब्रह्मदान जीवन में आ रहे सारे कष्ट, बाधाओं से मुक्ति का श्रेष्ठ उपाय माना गया है। व्यावहारिक तौर पर ब्रह्मपूजा या दान के मूल में पावनता और परोपकार के भावों से जुडऩा है। इससे दूरी पाप कर्म से जोड़ती है। इसलिए ब्राह्मण का अपमान धर्म और ईश्वर के प्रति दोष से जीवन के लिये घातक भी माना गया है। वहीं इस बात से जुड़ा एक दर्शन यह भी है कि सृजन करने की क्षमता रखने से हर प्राणी भी ब्रह्म या ईश्वर का ही अंश या रूप है। इसलिए बोल, सोच व व्यवहार में मानवीय भावनाओं को सबसे ऊपर रख जीवन जीना ही शांति और सफलता पाने का सबसे बेहतर तरीका है।

Thursday, February 28, 2013




अपने आरंभ के समय में भारत की सीमाएं कांधार तक फैली हुई थीं। इसका प्रमाण महाभारत में स्पष्ट रूप से मिलता है। भारत में पौराणिक काल से ही बाहुबली राजाओं और सम्राटों के मध्य अपने राज्य के प्रसार के लिए युद्ध होते रहे हैं।

कई बार ये अपनी भीषणता और बर्बरता की सीमाओं को भी पार कर देते थे। वर्तमान में हरियाणा राज्य के कुरूक्षेत्र में हुए महाभारत के युद्ध के बारे में सभी जानते हैं।

ये युद्ध इतना विध्वंसक था इसके पश्चात कई वर्षों तक धरती वीर क्षत्रिय़ों से विहीन रही थी। इसी युद्ध के फलस्वरूप भारत का एक वंश हमेशा-हमेशा के लिए विलुप्त हो गया था।

कुरुक्षेत्र हरियाणा राज्य का एक प्रमुख जिला है। यह हरियाणा राज्य के उत्तर में स्थित है तथा अम्बाला, यमुना नगर, करनाल और कैथल से घिरा हुआ है। माना जाता है कि इसी स्थान पर महाभारत का भीषण युद्ध हुआ था और भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश ज्योतीसर नामक स्थान पर दिया था।

यह जिला बासमती चावल के उत्पादन के लिए भी प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त अनेक पुराणों, स्मृतियों और महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है। विशेष तथ्य यह है कि कुरुक्षेत्र की पौराणिक सीमा 48 कोस की मानी गई है जिसमें कुरुक्षेत्र के अतिरिक्त कैथल, करनाल, पानीपत और जिंद का क्षेत्र सम्मिलित है।

कुरुक्षेत्र युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य कुरु साम्राज्य के सिंहासन की प्राप्ति के लिए लड़ा गया था। महाभारत के अनुसार इस युद्ध में भारत के लगभग सभी जनपदों ने भाग लिया था। महाभारत व अन्य वैदिक साहित्यों के अनुसार यह प्राचीन भारत में वैदिक काल के इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध था।


इस युद्ध में लाखों क्षत्रिय योद्धा मारे गए थे जिसके परिणामस्वरूप वैदिक संस्कृति तथा सभ्यता का पतन हो गया था। यह युद्ध प्राचीन भारत के इतिहास का सबसे विध्वंसक और विनाशकारी युद्ध सिद्ध हुआ था।

युद्ध के बाद भारतवर्ष की भूमि लम्बे समय तक वीर क्षत्रियों से विहीन रही थी। गांधारी के शापवश यादवों के वंश का भी विनाश हो गया। गांधारी ने अपने पुत्रों का अंत होते देख क्रोधित होकर एक ऐसा शाप दे दिया था जिसके फलस्वरूप सभी यदुवंशियों का समूल नाश हो गया था।

लगभग सभी यादव आपसी युद्ध में मारे गए थे। लगभग सभी यादव आपसी युद्ध में मारे गये, जिसके बाद श्रीकृष्ण ने भी इस धरती से प्रयाण कर लिय़ा था।

Monday, February 25, 2013


 कहते हैं जिसे आप ने नहीं देखा है, उसकी कल्पना करना सहज नहीं होता। है, यह हकीकत है। पर सच्चाई यह भी है कि जिसे आप तन मन और धन से ध्यान करते हैं वह एक दिन आपके समक्ष आ ही जाता है। वह चाहे ईश्वर हो या फिर जिसे आप सच्चे मन से चाहते हैं। शायद इसी को भक्ति या प्रेम कहते हैं। ईश्वर को किसी ने देखा नहीं। फिर भी हम कल्पना करते हैं कि वे हमारे साथ हैं और हर वक्त हमारी हर विपत्ति से निपटने के लिए हमारे समक्ष खड़े हैं। आइए एक ऐसी ही दास्तां से आपको वाकिफ करते हैं। जिन्होंने अपनी हठ से ठाकुरजी को भोजन करने पर मजबूर कर दिया।

राजस्थान के टोंक जिले में 15वीं शताब्दी धन्ना भगत का जन्म हुआ था। ऐसा माना जाता है कि गुरु नानक देव के जन्म से 53 वर्ष पूर्व इनका जन्म हुआ। ये जाट घराने से थे। किसान माता-पिता की संतान धन्ना भगत का बचपन काफी सघर्षपूर्ण और कष्टप्रद रहा। धन्ना प्रतिदिन पशु चराने के लिए अपने घर से निकलते तो थे लेकिन गांव के बाहर एक तालाब के किनारे जाकर घंटों बैठ जाते थे। यहां ठाकुरजी का मंदिर था।

धन्ना रोज आने-जाने वाले लोगों को पूजा करते देखते थे। लोगों को ऐसा करते देख धन्ना को काफी आश्चर्य होता था। धन्ना अपनी अल्पबुद्धि के कारण समझ नहीं पा रहे थे लोग इन्हें पूजा और भोग क्यूं लगा रहे हैं।



एक गांव में एक पंडित जी भागवत कथा सुनाने आए। पूरे सप्ताह कथा वाचन चला। पूर्णाहुति पर दान दक्षिणा की सामग्री इक्ट्ठा कर घोड़े पर बैठकर पंडितजी रवाना होने लगे। गांव के धन्ना जाट ने उनके पांव पकड़ लिए। वह बोला, पंडितजी महाराज! आपने कहा था कि जो ठाकुरजी की सेवा करता है उसका बेड़ा पार हो जाता है। आप तो जा रहे हैं। मेरे पास न तो ठाकुरजी हैं, न ही मैं उनकी सेवापूजा की विधि जानता हूं। इसलिए आप मुझे ठाकुरजी देकर पधारें।

 पंडित जी ने कहा, चौधरी, तुम्ही ले आना। धन्ना जाट ने कहा, मैंने तो कभी ठाकुर जी देखे नहीं, लाऊंगा कैसे ? पंडित जी को घर जाने की जल्दी थी। उन्होंने पिंड छुड़ाने को अपना भंग घोटने का सिलबट्टा उसे दिया और बोले, ये ठाकुरजी है। इनकी सेवापूजा करना। धन्ना जाट ने कहा, महाराज में सेवापूजा का तरीका भी नहीं जानता। आप ही बताएं। पंडित जी ने कहा, पहले खुद नहाना फिर ठाकुर जी को नहलाना। इन्हें भोग चढ़ाकर फिर खाना। इतना कहकर पंडित जी ने घोड़े के एड लगाई व चल दिए।


धन्ना सीधा एवं सरल आदमी था। पंडितजी के कहे अनुसार सिलबट्टे को बतौर ठाकुरजी अपने घर में स्थापित कर दिया। दूसरे दिन स्वयं स्नान कर सिलबट्टे रूप ठाकुरजी को नहलाया। विधवा मां का बेटा था। खेती भी ज्यादा नहीं थी। इसलिए भोग मैं अपने हिस्से का बाजरी का टिक्कड़ एवं मिर्च की चटनी रख दी। ठाकुरजी से धन्ना ने कहा, पहले आप भोग लगाओ फिर मैं खाऊंगा। जब ठाकुरजी ने भोग नहीं लगाया तो बोला, पंडित जी तो धनवान थे। खीर-पूडी एवं मोहन भोग लगाते थे। मैं तो जाट का बेटा हूं, इसलिए मेरी रोटी चटनी का भोग आप कैसे लगाएंगे ? पर साफ-साफ सुन लो मेरे पास तो यही भोग है। खीर पूड़ी मेरे बस की नहीं है। ठाकुरजी ने भोग नहीं लगाया तो धन्ना भी छह दिन भूखा रहा। इसी तरह वह रोज का एक बाजरे का ताजा टिक्कड़ एवं मिर्च की चटनी रख देता एवं भोग लगाने की अरजी करता।

ठाकुरजी तो पसीज ही नहीं रहे थे। छठे दिन बोला-ठाकुरजी, चटनी रोटी खाते क्यों शर्माते हो ? आप कहो तो मैं आंखें मूंद लू फिर खा लो। ठाकुरजी ने फिर भी भोग नहीं लगाया तो नहीं लगाया। धन्ना भी भूखा प्यासा था। सातवें दिन धन्ना जट बुद्धि पर उतर आया। फूट-फूट कर रोने लगा एवं कहने लगा कि सुना था आप दीन-दयालु हो, पर आप भी गरीब की कहां सुनते हो, मेरा रखा यह टिक्कड़ एवं चटनी आकर नहीं खाते हो तो मत खाओ। अब मुझे भी नहीं जीना है, इतना कह उसने सिलबट्टा उठाया और सिर फोडऩे को तैयार हुआ, अचानक सिलबट्टे से एक प्रकाश पुंज प्रकट हुआ एवं धन्ना का हाथ पकड़ कहा, देख धन्ना मैं तेरा चटनी टिकड़ा खा रहा हूं। ठाकुरजी बाजरे का टिक्कड़ एवं मिर्च की चटनी मजे से खा रहे थे। जब आधा टिक्कड़ खा लिया तो धन्ना बोला, क्या ठाकुरजी मेरा पूरा टिक्कड़ खा जाओगे? मैं भी छह दिन से भूखा प्यासा हूं। आधा टिक्कड़ तो मेरे लिए भी रखो। ठाकुरजी ने कहा, तुम्हारी चटनी रोटी बड़ी मीठी लग रही है तू दूसरी खा लेना। धन्ना ने कहा, प्रभु! मां मुझे एक ही रोटी देती है। यदि मैं दूसरी लूंगा तो मां भूखी रह जाएगी। प्रभु ने कहा, फिर ज्यादा क्यों नहीं बनाता। धन्ना ने कहा, खेत छोटा सा है और मैं अकेला। ठाकुरजी ने कहा, नौकर रख ले। धन्ना बोला-प्रभु, मेरे पास बैल थोड़े ही हैं मैं तो खुद जोतता  हूं। ठाकुरजी ने कहा, और खेत जोत ले। धन्ना ने कहा-प्रभु, आप तो मेरी मजाक उड़ा रहे हो। नौकर रखने की हैसियत हो तो दो वक्त रोटी ही न खा लें मां-बेटे। इस पर ठाकुरजी ने कहा, चिंता मत कर मैं तेरी मदद करूंगा। कहते हैं तबसे ठाकुरजी ने धन्ना का साथी बनकर उसकी मदद करनी शुरू की। धन्ना के साथ खेत में कामकाज कर उसे अच्छी जमीन एवं बैलों की जोड़ी दिलवा दी।


कुछ अर्से बाद घर में भैंस भी आ गई। मकान भी पक्का बन गया। सवारी के लिए घोड़ा आ गया। धन्ना एक अच्छा खासा जमींदार बन गया। कई साल बाद पंडितजी पुन: धन्ना के गांव भागवत कथा करने आए। धन्ना भी उनके दर्शन को गया। प्रणाम कर बोला, पंडितजी, आप जो ठाकुरजी देकर गए थे वे छह दिन तो भूखे प्यासे रहे एवं मुझे भी भूखा प्यासा रखा। सातवें दिन उन्होंने भूख के मारे परेशान होकर मुझ गरीब की रोटी खा ही ली। उनकी इतनी कृपा है कि खेत में मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर काम में मदद करते है। अब तो घर में भैंस भी है। आप सात दिन का घी-दूध का 'सीधा यानी बंदी का घी-दूध मैं ही भेजूंगा। पंडितजी ने सोचा मूर्ख आदमी है। मैं तो भांग घोटने का सिलबट्टा देकर गया था। गांव में पूछने पर लोगों ने बताया कि चमत्कार तो हुआ है। धन्ना अब वह गरीब नहीं रहा। जमींदार बन गया है। दूसरे दिन पंडितजी ने कहा, कल कथा में तेरे खेत में काम वाले साथी को साथ लाना। घर आकर प्रभु से निवेदन किया कि कथा में चलो तो प्रभु ने कहा, मैं नहीं चलता तुम जाओ। धन्ना बोला, तब क्या उन पंडितजी को आपसे मिलाने घर ले आऊं। प्रभु ने कहा, हर्गिज नहीं। मैं झूठी कथा कहने वालों से नहीं मिलता। जो अपना काम मेरी पूजा समझ करता है मैं उसी के साथ रहता हूं।

Thursday, February 21, 2013



शास्त्रों की सीख है कि अच्छे काम और सोच जीवन के रहते सुख-सुकून व मृत्यु के बाद दुर्गति से बचने के लिए बहुत जरूरी हैं। व्यावहारिक रूप से भी किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए सही विचार होने और उसके मुताबिक काम को अंजाम देने पर ही मनचाहे नतीजे संभव है। अन्यथा सोच और चेष्टा में तालमेल का अभाव या दोष बुरे नतीजों के रूप में सामने आते हैं।
मृत्यु के संदर्भ में यही बात सामने रख शास्त्रों की बात पर गौर करें तो बताया गया है कि कर्म ही नहीं विचारों में गुण-दोष के मुताबिक भी मृत्यु के बाद आत्मा अलग-अलग योनि प्राप्त करती है। जिनमें भूत-प्रेत योनि भी एक है। हालांकि विज्ञान भूत-प्रेत से जुड़े विषयों को वहम या अंधविश्वास मानता है। लेकिन यहां बताई जा रही मृत्य के बाद भूत-प्रेत बनने से जुड़ी बातें मनोविज्ञान व व्यावहारिक पैमाने पर प्रामाणिक होने के साथ ही सुखी व शांति से भरे जीवन के एक अहम सूत्र भी उजागर करती हैं। जानिए, किस कारण मृत्यु के बाद मिलती है भूत-प्रेत योनि और क्या है इनमें छिपा जीवन सूत्र? 
हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवदगीता में लिखी ये बातें मृत्यु के बाद भूत-प्रेत बनने का कारण उजागर करती है -
भूतानि यान्ति भूतेज्या:
यानी भूत-प्रेतो की पूजा करने वाले भूत-प्रेत योनि को ही प्राप्त करते हैं। इस बात को एक और श्लोक अधिक स्पष्ट करता है-
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:।।
यानी मृत्यु के वक्त प्राणी मन में जिस भाव, विचार या विषय का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है, वही उसी भाव या विषय के अनुसार योनि को प्राप्त हो जाता है। 
भूत-प्रेत होने के अंधविश्वासों से परे इन बातों में छिपे संदेश पर गौर करें तो संकेत यही है कि अगर व्यक्ति ताउम्र बुरे काम व उसका चिंतन करता रहे, तो वह बुराई के रूप में मन में स्थान बना लेते हैं और अन्तकाल में भी वही बातें मन-मस्तिष्क में घूमती हैं। ऐसे बुरे भावों के मुताबिक वह व्यक्ति भूत-प्रेत की नीच योनि को ही प्राप्त हो जाता है।
दरअसल, भूत-प्रेत भी मलीनता या बुराई के प्रतीक भी हैं। इसलिए यहां भूत-प्रेत उपासना का मतलब बुराई का संग भी है। इसलिए सीख यही है कि जीवन में बुरे कर्मों से दूरी बनाए रखे, ताकि जीवन रहते भी व जीवन के अंतिम समय में मन के अच्छे भावों के कारण मृत्यु के बाद भी दुर्गति से बचें।

Wednesday, February 20, 2013

माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में इसे अजा व भीष्म एकादशी भी कहा गया है। इस दिन भगवान विष्णु के निमित्त व्रत किया जाता है। इस बार यह एकादशी 21 फरवरी, गुरुवार को है।
जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। जया एकादशी के विषय में जो कथा प्रचलित है उसके अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से निवेदन कर जया एकादशी का महात्म्य, कथा तथा व्रत विधि के बारे में पूछा था। तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि जया एकादशी बहुत ही पुण्यदायी है। इस एकादशी का व्रत विधि-विधान करने से तथा ब्राह्मण को भोजन कराने से व्यक्ति नीच योनि जैसे भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है।

जया एकादशी की व्रत विधि इस प्रकार है-
जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। जो श्रद्धालु भक्त इस एकादशी का व्रत रखते हैं उन्हें दशमी तिथि को एक समय आहार करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि आहार सात्विक हो।
एकादशी के दिन भगवान श्रीविष्णु का ध्यान करके संकल्प करें और फिर धूप, दीप, चंदन, फल, तिल, एवं पंचामृत से उनकी पूजा करें। पूरे दिन व्रत रखें संभव हो तो रात्रि में भी व्रत रखकर जागरण करें। अगर रात्रि में व्रत संभव न हो तो फलाहार कर सकते हैं। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाकर उन्हें जनेऊ व सुपारी देकर विदा करें फिर भोजन करें। इस प्रकार नियमपूर्वक जया एकादशी का व्रत करने से महान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार जो जया एकादशी का व्रत करते हैं उन्हें पिशाच योनि में जन्म नहीं लेना पड़ता।

jai shree bankey bihari ji: हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विर...

jai shree bankey bihari ji: हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विर...: हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विराट स्वरूप का वर्णन है। द्वापर युग में महाप्रतापी अर्जुन को इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कर...

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हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विराट स्वरूप का वर्णन है। द्वापर युग में महाप्रतापी अर्जुन को इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कराकर कर्मयोगी भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के महामंत्र द्वारा अर्जुन के साथ संसार के लिए भी सफल जीवन का रहस्य उजागर किया।

भगवान का विराट स्वरूप ज्ञान शक्ति और ईश्वर की प्रकृति के कण-कण में बसे ईश्वर की महिमा ही बताता है। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन, नर-नारायण के अवतार थे और महायोगी, साधक या भक्त ही इस दिव्य स्वरूप के दर्शन पा सकता है। किंतु गीता में लिखी एक बात यह भी संकेत करती है सांसारिक जीवन में साधारण इंसान के लिए ऐसा तप करना कठिन हो तो उसे हर रोज पवित्र गीता से जुड़ा क्या उपाय करना चाहिए, जिसका शुभ प्रभाव ज़िंदगी के लिए फायदेमंद हो। दूसरे शब्दों में गीता में ही लिखी एक विशेष बात कलियुग में भगवान जगदीश की विराटता देखने का तरीका भी उजागर करती है।



श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय में ही देवी लक्ष्मी द्वारा भगवान विष्णु के सामने यह संदेह किया जाता है कि आपका स्वरूप मन-वाणी की पहुंच से दूर है तो गीता कैसे आपके दर्शन कराती है? तब जगत पालक श्रीहरि विष्णु गीता में अपने स्वरूप को उजागर करते हैं, जिसके मुताबिक -

पहले पांच अध्याय मेरे पांच मुख, उसके बाद दस अध्याय दस भुजाएं, अगला एक अध्याय पेट और अंतिम दो अध्याय श्रीहरि के चरणकमल हैं।

इस तरह गीता के अट्ठारह अध्याय भगवान की ही ज्ञानस्वरूप मूर्ति है, जो पढ़, समझ और अपनाने से पापों का नाश कर देती है। इस संबंध में लिखा भी गया है कि कोई इंसान अगर हर रोज गीता के अध्याय या श्लोक  के एक, आधे या चौथे हिस्से का भी पाठ करता है, तो उसके सभी पापों का नाश हो जाता है।

Saturday, February 16, 2013

एक ही ईश्वर के अलग-अलग धर्मों में कई नाम है। सनातन धर्म में भी ईश्वर के गुण, स्वरूप और दिव्य शक्तियों के आधार पर तीन रूप माने गए हैं। यह तीन रूप त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहलाते हैं।
इनमें भगवान विष्णु को जगत का पालन माना गया है। श्रीविष्णु को आनंद स्वरूप यानी सुख देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है। आपने भगवान विष्णु का 'हरि' नाम भी कई बार जाने-अनजाने बोला और सुना होगा

शास्त्रों के मुताबिक भगवान विष्णु के 'हरि' नाम का शाब्दिक मतलब हरण करने या चुरा लेने वाला होता है। कहा गया है कि 'हरि: हरति पापानि' जिससे यह साफ है कि हरि पाप या दु:ख हरने वाले देवता है। सरल शब्दों में 'हरि' अज्ञान और उससे पैदा होने वाले कलह को हरते या दूर कर देते हैं।
'हरि' नाम को लेकर एक रोचक बात भी बताई गई है, जिसके मुताबिक हरि को ऐश्वर्य और भोग हरने वाला भी माना है। चूंकि भौतिक सुख, वैभव और वासनाएं व्यक्ति को भगवान और भक्ति से दूर करती है। ऐसे में हरि नाम स्मरण से भक्त इन सुखों से दूर हो प्रेम, भक्ति और अंत में भगवान से जुड़ जाता है।
यही वजह है कि 'हरि' नाम को धार्मिक और व्यावहारिक रूप से सुख और शांति का महामंत्र माना गया है।

Tuesday, February 12, 2013


धर्म के नजरिए से प्रेम अहम जीवन मूल्य है। व्यावहारिक तौर पर भी प्रेम मानवीय ज़िंदगी में अलग-अलग रूप और रिश्तों में उजागर होता है। यहां तक कि प्रेम को ईश्वर से साक्षात्कार के लिए भी अहम माना गया है।  इसलिए जिंदगी में वास्तविक सुखों को पाने के लिए प्रेम का भाव बहुत जरूरी है।  हिन्दू धर्मग्रंथों के प्रसंगों पर गौर करें तो लीलाधर श्रीकृष्ण के चरित्र में प्रेम कई पहलू नजर आते हैं। माता, पिता, भाई, बहन, मित्र, पत्नी, पुत्र, सेवक, भक्त, देश या समाज के लिए प्रेम की अहमियत  भगवान कृष्ण ने जगत को बताई। उनके गोपियों संग रासलीला से भी आदर्श प्रेम के रहस्य जुड़े हैं।  जगतपालक भगवान विष्णु का अवतार होने से भी भगवान श्रीकृष्ण प्रेम, आनंद और सुख देने वाले देवता के रूप में पूजनीय हैं। इसलिए भगवान कृष्ण की उपासना जीवन से जुड़ी सुख, ऐश्वर्य, धन, प्रेम, सौभाग्य, सम्मान, सुखद दाम्पत्य, प्रतिष्ठा और मोक्ष की सारी इच्छाएं पूरी करने वाली मानी गई है।  यहां बताया जा रहा है भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का ऐसा आसान मंत्र जिसका हर रोज जप या ध्यान करने पर जीवन में मनचाहे सुखों या जीवसाथी पानें में आ रही सारी बाधाओं से भी छुटकारा मिलता है। कृष्ण का यह मूल मंत्र व्यक्ति की हर इच्छा पूरी करता है और मनचाही खुशियां दे देता है -  'कृं कृष्णाय नम:' सभी सुख देने वाले कृष्ण के इस मूलमंत्र का जप सुबह नहाने के बाद एक सौ आठ बार करें। इस छोटे से मंत्र के प्रभाव से जीवन में बड़े और सुखद बदलाव आएंगे।

Friday, February 8, 2013

भक्ति, प्रेम, समर्पण और त्याग का ही रूप है। धार्मिक आस्था है कि जब ऐसी भक्ति से ईश्वर को याद किया जाता है, तो ईश्वर भी उस प्रेम के वशीभूत हो किसी न किसी रूप से भक्त पर कृपा बरसते हैं।
भक्ति की बात हो तो भगवान शिव की भक्ति सबसे आसान और जल्द मुरादें पूरी करने वाली मानी जाती है। पौराणिक प्रसंग बताते हैं कि शिव भक्ति से दानव, मानव ही नहीं बल्कि देवताओं ने भी अपने मनोरथ पूरे किए।
इसी कड़ी में महाभारत के मुताबिक भगवान शिव ने स्वयं कहा है  - श्रीकृष्ण मेरी भक्ति करते हैं, इसलिए मुझे श्रीकृष्ण सबसे प्रिय है। भगवान श्रीकृष्ण ने शिव की उपासना शिव के हजार नामों के उच्चारण और बिल्वपत्रों को चढ़ाकर सात माह तक कठोर तप के साथ की। महाभारत के अनुशासन पर्व में बताया गया है कि श्रीकृष्ण ने शिव की भक्ति से 16 कामनाओं को पूरा किया।

- धर्म में मेरी दृढ़ता रहे यानी सत्य, प्रेम परोपकार जैसा धर्म पालन।
- युद्ध में शत्रुघात यानी विरोधियों और जीवन के संघर्ष में विपरीत हालात पर काबू पा लेना।
- जगत में उत्तम यश मिले यानी प्रसिद्धि, सम्मान।
- परम बल यानी हर तरह से शक्ति संपन्न।
- योग बल यानी संयम और संतोष।
- सर्व प्रियता यानी सबसे मधुर संबंध और व्यवहार।
- शिव का सानिध्य यानि भगवान, धर्म और कर्म से जुड़े रहना।
- दस हजार पुत्र यानी संतान और कुटुंब सुख।
- ब्राह्मणों में कोपाभाव यानी पवित्रता और शुचिता प्राप्त हो।
- पिता की प्रसन्नता यानी पिता का प्रेम और आशीर्वाद।
- सैकड़ों पुत्र यानी दाम्पत्य सुख।
- उत्कृष्ट वैभव योग यानी सुख-समृद्धि।
- कुल में प्रीति यानी परिवार और संबंधियों में मेलजोल।
- माता का प्रसाद या अनुग्रह यानी माता से प्रेम और आशीर्वाद।
- शम प्राप्ति यानी हर तरह से शांति मिलना।
- दक्षता यानी कार्य कुशलता या हुनरमंद होना

Tuesday, February 5, 2013

भगवान विष्णु के सभी अवतार युगों बाद भी व्यक्ति, समाज और कुदरत को गतिवान और ऊर्जावान रखने का सबक देते हैं। यही वजह है कि जीवनशैली में संयम और अनुशासन लाने के लिए विष्णु पूजा, भक्ति और उपासना की अहमियत बताई गई है। खासतौर पर इनसे जुड़ी दान-धर्म की परंपराएं मन, बुद्धि और सोज को सकारात्मक भावनाओं से भर देती है।

शास्त्रों के मुताबिक खासतौप पर एकादशी तिथि (6 फरवरी) पर किया दान तो विष्णु भक्ति की दूसरी सभी शुभ तिथियों और अवसरों पर किए गए दान से भी अधिक पुण्य देता है। इनमें दान के लिए कुछ ऐसी चीजें भी शामिल हैं, जो सस्ती व आसानी से मिल जाती हैं, किंतु इनका दान बड़ा ही शुभ माना गया है।

एकादशी तिथि या द्वादशी तिथि पर सुबह इन चीजों का दान भगवान विष्णु का विधिवत व्रत व पूजा उपासना के साथ किसी ब्राह्मण को करें -
- खारक
- मौसमी फल- जल पात्र व वस्त्र
- गुड़ और अरहर यानी तुवर की दाल
- चने या चने की दाल
- केशर
- अष्टगंध
- लाल चंदन
- गोरोचन या गौलोचन
- शंख
- चाँदी के बर्तन में घी
- घंटी या घंटाल
- मोती या मोती की माला
- काँसे के बर्तन में सोना
- माणिक रत्न
- तिल

Friday, January 25, 2013

स्वस्थ तन, साफ मन और मीठी बोली किसे सुख-सुकून नहीं देती? दरअसल, तीनों ही बातों में एक समानता है और वह है - पवित्रता। जी हां, किसी भी तरह से साफ-सफाई मन को ऊर्जा व ताजगी देती है। बस, यही ऊर्जा कई तरह की खूबियों व शक्तियों में तब्दील हो सुख-संपन्न बनाने में मदद करती है। इसे ही धार्मिक आस्था से देवी लक्ष्मी की कृपा भी कहा जाता है।

जाहिर है कि जहां तन, मन, विचार व वातावरण में पवित्रता हो वहां लक्ष्मी बसती है। सांसारिक जीवन में ऐसी ही पवित्रता का प्रतीक व लक्ष्मी का साक्षात् स्वरूप माना जाता है - तुलसी का पौधा।

शास्त्रों में तुलसी का पौधा घर में लगाने का शुभ फल लक्ष्मी की असीम कृपा देने वाला यानी सुख-समृद्ध करने वाला माना गया है।

पौराणिक मान्यताओं में इसे तुलसी व वृंदा के नाम से विष्णु प्रिया या लक्ष्मी का ही रूप बताया गया है। इसीलिए शालिग्राम-तुलसी विवाह की परंपरा व पूजा भी सुख-समृद्ध करने वाली मानी गई है। माना जाता है कि हरि व हर यानी शिव-विष्णु की कृपा से ही तुलसी को देववृक्ष का स्वरूप मिला। व्यावहारिक तौर से भी घर में तुलसी पूजा से मन में शुद्ध भाव पैदा होते हैं तो खाने से तन भी निरोगी रहता है।
अगर आप भी आर्थिक परेशानियों से दूर खुशहाल जीवन चाहते हैं तो शास्त्रों में बताए कुछ विशेष मंत्रों घर में तुलसी का पौधा लगाकर देवी लक्ष्मी को बुलावा दें और स्थायी वास की कामना करें।
जानिए ये मंत्र और तुलसी पौधा लगाने का सरल तरीका -
- तुलसी पौधा लगाने के लिए वैसे तो शास्त्रों में आषाढ़ व ज्येष्ठ माह का महत्व बताया गया है। किंतु अन्य दिनों में किसी भी पवित्र तिथि पर, खासतौर पर एकादशी तिथि या पूर्णिमा तिथि को स्नान के बाद किसी भी देव मंदिर या जिस घर मे नित्य तुलसी पूजा होती हो, से तुलसी का छोटा-सा पौधा लेकर आएं।
- घर के आंगन या किसी पवित्र जगह को गंगाजल से पवित्र कर तीर्थ की पवित्र मिट्टी से भरे गमले में उस पौधे को रोपें।


तुलसी के पौधे को जल, गंध, इत्र, फूल, दूर्वा, फल अर्पित करते हुए पीली मौली या वस्त्र अर्पित करें। मिठाई का भोग लगाएं।
- बाद किसी सुहागिन स्त्री से ही तुलसी के चारों ओर दूध व जल की धारा अर्पित करवाकर नीचे लिखे मंत्रों का ध्यान करें -
विष्णु का ध्यान कर तुलसी मंत्र बोलें -
नमस्तुलसि कल्याणि नमो विष्णुप्रिये शुभे।
नमो मोक्षप्रदे देवि नम: सम्पत्प्रदायिके।।
लक्ष्मी का ध्यान कर यह मंत्र बोलें -
श्रीश्चते लक्ष्मीश्चपत्न्यावहोरात्रे पारश्वे नक्षत्राणिरूप मश्विनौव्यात्तम्।
इष्णनिषाणामुम्म इषाण सर्वलोकम्म इषाण।
- मंत्र स्मरण के बाद तुलसी की धूप, दीप व कर्पूर आरती करें व प्रसाद ग्रहण करें।

Tuesday, January 22, 2013

जहां जगतपालक भगवान विष्णु का सत्व गुणी यानी सत्य, धर्म, शांति, सुख और पावनता के भावों से सराबोर चरित्र जीने की प्रेरणा व जज्बा देता है तो वहीं उनका विराट स्वरूप कर्म व धर्म की राह बताने वाला है। इसी तरह उनके सारे चमत्कारी अवतार नैतिक मूल्यों और सही आचरण का सबक देकर ज़िंदगी को सही तरीके से जीना सिखाते हैं।

खासतौर पर ज़िंदगी में दायित्वों को निभाते वक्त भी जगतपालक की तरह शांति और संयम की बड़ी अहमियत है ताकि बेहतर आजीविका के साथ बिन बाधा सफलता और तरक्की पाकर खुशहाल जीवन गुजार सकें।

शास्त्रों के मुताबिक एकादशी तिथि भगवान विष्णु की उपासना शुभ तिथि है। इस दिन भगवान विष्णु मंत्रों के ध्यान से लक्ष्मी की प्रसन्नता भी मिलती है, जो दौलत, यश, प्रतिष्ठा , तरक्की की ऐसी ही कामना जल्द पूरी करती है।

इस दिन सुबह व शाम के वक्त भगवान विष्णु को केसरिया चंदन मिले जल से स्नान कराएं। स्नान के बाद चंदन, पीले वस्त्र, पीले फूल चढ़ाकर व मिठाइयों का भोग लगाकर चंदन धूप व गोघृत दीप जलाएं।

पद्मनाभोरविन्दाक्ष: पद्मगर्भ: शरीरभूत्।
महद्र्धिर्ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वज:।।
अतुल: शरभो भीम: समयज्ञो हविर्हरि:।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जय:।।

Monday, January 14, 2013

मैं साहिल पे लिखी हुई इबादत नहीं
जो लहरों से मिट जाती है
मैं बारिश कि बरसती बूंद नहीं
जो बरस कर थम जाती है
मैं ख्वाब नहीं,
जिसे देखा और भुला दिया
मैं चांद भी नहीं,
जो रात के बाद ढल गया
मैं हवा का वो झोंका भी नहीं,
के आया और गुजर गया
मैं तो वो अहसास हूं ,
जो तुझमे लहू बनकर गरदिश करे
मैं वो रंग हू
जो तेरे दिल पर चढे
ओर कभी ना उतरे
मे वो गीत हूं ,
जो तेरे लबो से जुदा ना हो
ख्वाब, इबादत, हवा कि तरह ...
चांद, बुंद, शमा कि तरह
मेरे मिटने का सवाल नहीं..
क्यूंकि
मैं तो मोहब्बत हूँ .....
!!जय श्रीराधे...जय श्रीराधे...जय श्रीराधे...!!
!!जय श्रीराधे...जय श्रीराधे...जय श्रीराधे.!!

मधुवन की लताओं में घनश्याम तुम्हें देखूं !

घनघोर घटाओं में घनश्याम तुम्हें देखूं !!

यमुना का किनारा हो , निर्मल जल धरा हो !

वहां झुला झुलाते हुए घनश्याम तुम्हें देखूं !!

जागृत की अवस्था में, तुम सामने हो मेरे !

सो जाऊ तो सपनों में घनश्याम तुम्हें देखूं !!

वृन्दावनकी गल्लियाँ हो, संग चंचल सखियाँ हो!

वहां रास रचाते हुए घनश्याम तुम्हें देखूं !!

टेढे हो खड़े मोहन, टेढा है मुकुट तेरा !

अधरों पे धरे मुर

ली घनश्याम तुम्हें देखूं !!

मधुवन की लताओं में घनश्याम तुम्हें देखूं !

घनघोर घटाओं में घनश्याम तुम्हें देखूं !!

तू सामने रहे मेरे, मै तेरा दीदार करू
सब कुछ भुला के,सिर्फ तुझे ही प्यार करू
तेरी जुल्फों के साये मे जिन्दगी मिली
तेरी आँखों मे डूब के,ख़ुशी मिली
तुझ से भी बढ़ कर तुझ पे ऐतबार करू
तुम न थे दिल मे,कोई अरमान न था
इस नाकाम जिन्दगी मे,कही मुकाम न था
सफ़र के हर मोड़ पे,तेरा इन्तेजार करू
वादा करो मुझ से,कभी दूर न जाओगे
मेरे दिल को ख़ुशी देकर फिर न रुलाओगे
मेरे सब कुछ तुम हो कान्हा,तुझ पे जान निसार करू

कोई श्याम सुन्दर से कहदो यह जाके,

भुला क्यों दिया हमें, अपना बना के |

अभी मैंने तुमको निहारा नहीं है,

तुम्हारे सिवा कोई हमारा नहीं है |

चले क्यों गए श्याम दीवाना बना के,

भुला क्यों दिया हमें, अपना बना के


Wednesday, January 9, 2013

हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विराट स्वरूप का वर्णन है। द्वापर युग में महाप्रतापी अर्जुन को इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कराकर कर्मयोगी भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के महामंत्र द्वारा अर्जुन के साथ संसार के लिए भी सफल जीवन का रहस्य उजागर किया।

भगवान का विराट स्वरूप ज्ञान शक्ति और ईश्वर की प्रकृति के कण-कण में बसे ईश्वर की महिमा ही बताता है। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन, नर-नारायण के अवतार थे और महायोगी, साधक या भक्त ही इस दिव्य स्वरूप के दर्शन पा सकता है। किंतु गीता में लिखी एक बात यह भी संकेत करती है सांसारिक जीवन में साधारण इंसान के लिए ऐसा तप करना कठिन हो तो उसे हर रोज पवित्र गीता से जुड़ा क्या उपाय करना चाहिए, जिसका शुभ प्रभाव ज़िंदगी के लिए फायदेमंद हो। दूसरे शब्दों में गीता में ही लिखी एक विशेष बात कलियुग में भगवान जगदीश की विराटता देखने का तरीका भी उजागर करती है।

श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय में ही देवी लक्ष्मी द्वारा भगवान विष्णु के सामने यह संदेह किया जाता है कि आपका स्वरूप मन-वाणी की पहुंच से दूर है तो गीता कैसे आपके दर्शन कराती है? तब जगत पालक श्री हरि विष्णु गीता में अपने स्वरूप को उजागर करते हैं, जिसके मुताबिक -

पहले पांच अध्याय मेरे पांच मुख, उसके बाद दस अध्याय दस भुजाएं, अगला एक अध्याय पेट और अंतिम दो अध्याय श्रीहरि के चरणकमल हैं।

इस तरह गीता के अट्ठारह अध्याय भगवान की ही ज्ञानस्वरूप मूर्ति है, जो पढ़, समझ और अपनाने से पापों का नाश कर देती है। इस संबंध में लिखा भी गया है कि कोई इंसान अगर हर रोज गीता के अध्याय या श्लोक  के एक, आधे या चौथे हिस्से का भी पाठ करता है, तो उसके सभी पापों का नाश हो जाता है।


Tuesday, January 8, 2013

हिन्दू धर्म पंचांग की एकादशी तिथि से जुड़ी भगवान विष्णु उपासना की धर्म परंपराओं के पीछे मूल भावना, सोच और आचरण की पवित्रता को अपनाने की है ताकि इंसान मन और विचार से मजबूत और एकाग्र रहकर हर मुश्किलों से पार पा सके।

इसी सिलसिले में संयम और शांति पाने का बेहतर उपाय संतुलित आहार से भी जुड़ा है। खासतौर पर व्रत-उपवास या इनके बिना भी खास चीजों को खाना जहां शरीर को सेहतमंद बनाने वाला बताया गया है, वहीं दूसरी ओर कुछ खास चीजों को खाना सेहत के लिए परेशानी की वजह बनने वाला भी माना गया है।


 शहद, चावल का माँड, उड़द, राई, मसूर-दाल, बकरी, भैंस और भेड़ का दूध, मांस, मादक पदार्थ और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।

- इसी तरह मूली, प्याज, कुम्हड़ा, लहसुन, गाजर, बैंगन भोजन में नहीं लेना चाहिए। तिल का तेल, बासी भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।

- ताँबे के बर्तन में दूध रखना, चमड़े के बर्तन में पानी और खुद के लिए बनाया भोजन अशुद्ध माना जाता है। ऐसा करने से बचना चाहिए।

Monday, January 7, 2013

पौष मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को सफला एकादशी कहते हैं। इस बार यह एकादशी 8 जनवरी, मंगलवार को है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस व्रत की विधि इस प्रकार है-
सफला एकादशी (8 जनवरी, मंगलवार) के दिन सुबह स्नान कर साफ वस्त्र पहन कर माथे पर चंदन लगाकर कमल अथवा वैजयन्ती फूल, फल, गंगा जल, पंचामृत, धूप, दीप, सहित लक्ष्मी नारायण की पूजा एवं आरती करें। भगवान श्रीहरि के विभिन्न नाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए फलों के द्वारा उनका पूजन करें। शाम को दीप दान के बाद फलाहार कर सकते हैं।
सफला एकादशी के दिन दीप-दान करने की परंपरा भी है। इस रात्रि को वैष्णव संप्रदाय के लोग भगवान श्रीहरि का नाम-संकीर्तन करते हुए जागते हैं। एकादशी का रात्रि में जागरण करने से जो फल प्राप्त होता है, वह हजारों वर्ष तक तपस्या करने पर भी नहीं मिलता, ऐसा धर्मग्रंथों में लिखा है। द्वादशी के दिन भगवान की पूजा के पश्चात कर्मकाण्डी ब्राह्मण को भोजन करवा कर जनेऊ एवं दक्षिणा देकर विदा करने के पश्चात भोजन करें।
इस प्रकार सफला एकादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

Tuesday, January 1, 2013







धर्मग्रंथ कर्म को पूजा का दर्जा देते हैं। किंतु कर्म के साथ-साथ ईश्वर भक्ति और कृपा को भी सफल जीवन का सूत्र भी माना गया है। आज की व्यस्त जिंदगी में इंसान के पास काम व दायित्वों को पूरा करने की उलझन में ईश्वर स्मरण के लिए वक्त निकालना मुश्किल है।
यही वजह है कि साल 2013 के पहले दिन यहां बता रहे हैं धर्मग्रंथों का एक ऐसा सरल और असरदार मंत्र, जिसके लिए आस्था है कि देव पूजा के अलावा कार्य और जिम्मेदारियों के दौरान किसी भी वक्त मन ही मन स्मरण करें, तो सारे काम बिना बाधा और परेशानी के पूरे ही नहीं होंगे, बल्कि नाम व पैसा देने वाले भी साबित होंगे।
यह मंत्र भगवान विष्णु के साथ उनके अवतार श्रीकृष्ण का स्मरण है।  इसलिए इस मंत्र का स्मरण बहुत ही शुभ फल देने वाला होगा।

सुबह स्नान के बाद यथासंभव पीले वस्त्र पहनकर देवालय में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा गंध, अक्षत, पीले फूल व धूप, दीप से करें।
- पूजा के बाद इस मंत्र का यथाशक्ति जप करें। यही मंत्र दिन में किसी भी वक्त काम के दौरान ध्यान भी कर सकते हैं -
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
कर्म की अहमियत बताने वाले भगवान श्रीकृष्ण और शांतिस्वरूप भगवान विष्णु के ध्यान से आपका हर काम न केवल निर्विघ्र संपन्न होगा, बल्कि शांति और सुकून भी लाएगा।

Monday, December 24, 2012

विश्व के किसी भी धर्म या संप्रदाय के किसी भी ग्रंथ का जन्मदिन नहीं मनाया जाता। जयंती सिर्फ श्रीमद्भगवत गीता की मनाई जाती है क्योंकि अन्य ग्रंथ किसी मनुष्य द्वारा लिखे या संकलित किए गए हैं, जबकि गीता का जन्म भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से हुआ है।

या स्वयं पद्मनाभस्य मुख पद्माद्विनि: सृता।।

गीता का जन्म कुरुक्षेत्र में मार्गशीर्ष मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से हुआ। मोक्षदा एकादशी के नाम से विख्यात यह तिथि इस बार 23 दिसंबर को थी। गीता किसी देश, काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिए न होकर संपूर्ण मानव जाति के लिए है। इसे स्वयं श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निमित्त बनाकर कहा है। जिस प्रकार गाय के दूध को बछड़े के बाद सभी धर्म, संप्रदाय के लोग पान करते हैं। इसे दुहने वाले गोपाल श्रीकृष्ण हैं, अर्जुन रूपी बछड़े के पीने से निकलने वाला महान् अमृतसदृश दूध ही गीतामृत है।

गीता वेदों और उपनिषदों का सार है। लोक-परलोक में मंगलमय मार्ग दिखाने वाला, कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों मार्गों द्वारा मनुष्य को परम श्रेय के साधन का उपदेश देने वाला, ऊंचे ज्ञान, विमल भक्ति, उज्जवल कर्म, यम, नियम, त्रिविध तप, अहिंसा, सत्य और दया के उपदेश देने वाला ग्रंथ है। इसके छोटे-छोटे 18 अध्यायों में इतना ज्ञान, इतने ऊंचे गंभीर सात्विक उपदेश हैं, जो व्यक्ति को नीची दशा से उठाकर देवताओं के स्थान में बैठा देने की शक्ति रखते हैं। गीता का लक्ष्य मनुष्य को कर्तव्य का बोध कराना है।

दुनिया के किसी भी धर्म-दर्शन में पूर्वजन्म या पुनर्जन्म की स्पष्ट व्याख्या नहीं मिलती। सिर्फ हिंदू सनातन धर्म-दर्शन में ही पूर्व और पुनर्जन्म पर चर्चा की गई है। व्यावहारिक रूप में देखें तो सिर्फ हमारी व्यवस्था में ही हम एक ही जन्म में तीन जन्मों की चर्चा करते हैं। इसके पीछे हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित सत्कर्म की शिक्षा ही है। श्रीकृष्ण ने गीता में आत्मा के अजर-अमर होने और निष्काम फल की शिक्षा दी है।

 

फलित ज्योतिष में जातक की कुंडली के लग्न से वर्तमान जन्म, नवम् भाव से पिछले जन्म व पंचम् भाव से अगले जन्म का फलित जाना जाता है। कुंडली में ग्रहों की स्थितियां और दशाएं पिछले जन्म में संचित कर्मों के आधार पर प्रारब्ध के रूप में मिलती हैं। प्रारब्ध के आधार पर ही वर्तमान जन्म में उत्थान या पतन होता है। ईश्वर ने 84 लाख योनियों में सिर्फ  मनुष्य को ही यह विशेषाधिकार दिया है कि वह वर्तमान जन्म में सत्कर्म कर प्रारब्ध में मिले दुष्कर्मों के प्रभाव को कम करे व आने वाले जन्म को व्यवस्थित करे।

श्रीकृष्ण-अर्जुन के संवाद के 18 अध्याय अर्जुन विषाद योग, सांख्य योग, कर्म योग, ज्ञान-कर्म-संन्यास योग, कर्म-संन्यास योग, आत्म-संयम योग, ज्ञान-विज्ञान योग, अक्षर ब्रह्म योग, विद्याराजगुह्य योग, विभूति योग, विश्व रूप-दर्शन योग, भक्ति योग, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग, गुणत्रय विभाग योग, पुरुषोत्तम योग, देवासुर संपद्विभाग योग, श्रद्धात्रय विभाग योग और मोक्ष संन्यास योग में बांटे गए हैं।

 

इन अध्यायों के पढऩे या सुनने से ही पूर्वजन्मों के पापों से मुक्ति पाने के प्रसंग पद्मपुराण में वर्णित हैं। अत: मनुष्य को अंतिम समय में गीता सुनाई जाती है।

गीता हमें जीवन जीने की कला सिखाती है। इस श्लोक से ही इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। 'सुख-दु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।' भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- हे अर्जुन! जो भक्ति प्रेमपूर्वक, उत्साह सहित परम रहस्य युक्त गीता को निष्काम भाव से प्रेमपूर्वक मेरे भक्तों को पढ़ाएगा या इसका प्रचार करेगा, वह निश्चित ही मुझे ही प्राप्त करेगा। न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है और न उससे बढ़कर मेरा अत्यंत प्यारा पृथ्वी पर दूसरा कोई होगा। हे अर्जुन! जो पुरुष इस धर्ममय गीताशास्त्र को पढ़ेगा उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊंगा।

हम बड़े भाग्यवान हैं कि इस संसार के घोर अंधकार से भरे घने मार्ग में गीता के रूप में प्रकाश दिखाने वाला यह धर्मदीप प्राप्त हुआ है। अत: हमारा भी यह धर्म-कर्तव्य है कि हम इसके लाभ को मनुष्य मात्र तक पहुंचाने का सतत् प्रयास करें।

इसी वजह से गीता जयंती का महापर्व मनाया जाता है। गीता जयंती पर जनता-जनार्दन में गीता प्रचार के साथ ही श्रीगीता के अध्ययन, गीता की शिक्षा को जीवन में उतारने की स्थाई योजना बनानी चाहिए।

इसके लिए निम्न कार्य किए जाने चाहिए-

1. श्रीमद्भगवत गीता का पूजन।

2. गीता वक्ता भगवान् श्रीकृष्ण, उसके श्रोता नरस्वरूप भक्त प्रवर अर्जुन तथा उसे महाभारत में ग्रंथित करने वाले भगवान् वेदव्यास का पूजन।

3. गीता का यथा साध्य व्यक्तिगत और सामूहिक परायण।

4.  गीता तत्व को समझाने तथा उसके प्रचार-प्रसार के लिए सभाओं, प्रवचन और गोष्ठियों का आयोजन।

5. विद्यालयों और महाविद्यालयों में गीता पाठ, उस पर व्याख्यान का आयोजन।

6.  गीता ज्ञान संबंधी परीक्षा का आयोजन और उसमें उत्तीर्ण छात्र-छात्राओं को पुरस्कार वितरण।

7.  मंदिर, देवस्थान आदि में श्रीमद्गीता कथा का आयोजन।

8.  गीताजी की शोभायात्रा निकालना आदि।