Saturday, August 25, 2012

हिन्दू धर्मशास्त्रों के मुताबिक भगवान विष्णु जगत का पालन करने वाले देवता है। वैसे भगवान विष्णु का स्वरूप सात्विक यानी शांत, कोमल और आनंदमयी बताया गया है। वहीं उनके स्वरूप का दूसरा पहलू यह भी प्रकट होता है कि भगवान विष्णु भयानक और कालस्वरूप शेषनाग पर आनंद मुद्रा में शयन करते हैं। भगवान विष्णु के इसी स्वरूप की महिमा में शास्त्रों में लिखा गया है -

शान्ताकारं भुजगशयनं

यानी शांत स्वरूप और भुजंग यानी शेषनाग पर शयन करने वाले देवता भगवान विष्णु।

भगवान विष्णु के इस निराले स्वरूप पर गौर करें तो यह सवाल या तर्क भी मन में उठता है कि आखिर काल के साये में रहकर भी क्या कोई बिना किसी बेचैनी के शयन कर सकता हैं? किंतु भगवान विष्णु के इस रूप में मानव जीवन व व्यवहार से जुड़े कुछ रहस्य व छुपे संदेश हैं -

असल में, जिंदगी का हर पल कर्तव्य और जिम्मेदारियों से जुड़ा होता है। इनमें पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक दायित्व अहम होते हैं किंतु इन दायित्वों को पूरा करने के साथ ही अनेक परेशानियों का सिलसिला भी चलता है, जो कालरूपी नाग की तरह भय, बेचैनी और चिन्ताएं पैदा करता है। इनसे कईं मौकों पर व्यक्ति टूटकर बिखर भी जाता है।

भगवान विष्णु का शांत स्वरूप यही कहता है कि ऐसे बुरे वक्त में संयम, धीरज के साथ मजबूत दिल और ठंडा दिमाग रखकर जिंदगी की तमाम मुश्किलों पर काबू पाया जा सकता है। तभी विपरीत समय भी आपके अनुकूल हो जाएगा। ऐसा व्यक्ति सही मायनों में पुरूषार्थी कहलाएगा।

इस तरह विपरीत हालातों में भी शांत, स्थिर, निर्भय व निश्चित मन और मस्तिष्क के साथ अपने धर्म का पालन यानी जिम्मेदारियों को पूरा करना ही विष्णु के भुजंग या शेषनाग पर शयन का प्रतीक है।

jai shree bankey bihari ji: हिन्दू धर्म मान्यताओं में भगवान विष्णु जगतपालक मान...

jai shree bankey bihari ji: हिन्दू धर्म मान्यताओं में भगवान विष्णु जगतपालक मान...: हिन्दू धर्म मान्यताओं में भगवान विष्णु जगतपालक माने जाते हैं। हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भागवतपुराण के मुताबिक धर्म की रक्षा के लिए सतयुग से ...


हिन्दू धर्म मान्यताओं में भगवान विष्णु जगतपालक माने जाते हैं। हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भागवतपुराण के मुताबिक धर्म की रक्षा के लिए सतयुग से लेकर कलियुग तक भगवान विष्णु ने कई अवतार लिए, जिनमें से दस प्रमुख अवतार 'दशावतार' के रूप में प्रसिद्ध हैं।

18 अगस्त से शुरू भगवान विष्णु की ही भक्ति के विशेष काल अधिकमास में इन विष्णु अवतारों का स्मरण भी सारे सांसारिक दुःख व कलह को दूर करने वाला माना गया है

वराह अवतार - वराह यानी सुअर का रूप लेकर भगवान ने समुद्र में जाकर हिरण्याक्ष राक्षस को मार पृथ्वी की रक्षा की।

 नरसिंह अवतार - भगवान विष्णु ने आधे शेर और आधे इंसान के रूप में धर्म विरोधी बने हिरण्यकशिपु को मार भक्त प्रहलाद को बचाया।

वामन अवतार - बौने ब्राह्मण के रूप में भगवान विष्णु ने दानव राज व दानवीर राजा बलि से देवताओं की रक्षा के लिए दान में तीन पग में भूमि़, आकाश व स्वयं राजा बलि को भी समर्पित होने को विवश कर दिया।

परशुराम अवतार - ब्राह्मण योद्धा के रूप में भगवान विष्णु ने अहंकारी व अत्याचारी हुए क्षत्रियों का नाश कर धर्म की रक्षा की।

श्रीराम अवतार - मानवीय रूप में भगवान राम ने मर्यादा को स्थापित करते हुए अधर्मी रावण का अंत कर दिया। इसी वजह से वे मर्यादा पुरुषोत्तम पुकारे गए।

श्रीकृष्ण अवतार - भगवान विष्णु का यह अवतार 16 कलाओं से पूर्ण माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अधर्मी कंस का वध करने के साथ कर्मयोग का महान सूत्र जगत को सिखाया।

बुद्ध अवतार - क्षमा, शील और शांति स्वरूप इस अवतार के जरिए भगवान विष्णु ने धर्म व समाज को नुकसान पहुंचा रही बुराईयों का अंत किया।

कल्कि अवतार ( यह अवतार कलयुग के अंत में होना माना गया है)। माना जाता है कि इस अवतार के जरिए धर्मभ्रष्ट हुए हर जन का संहार होगा व सृष्टि की नई शुरुआत होगी

मत्स्य अवतारः सतयुग में भगवान विष्णु ने मछली का रूप लेकर धर्म व वेद की रक्षा करते हुए मनु महाराज की नाव को प्रलय से बचाया व सृष्टि को आगे बढ़ाने का ज्ञान व प्रेरणा दी।

कूर्म अवतार - भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के दौरान कछुए के रूप में मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर मथनी की तरह रखा व वासुकी नाग को रस्सी की तरह उपयोग कर देव-दानवों ने सागर को मथा, जिससे जगत कल्याण करने वाली मां लक्ष्मी व अमृत कलश सहित 14 अनमोल रत्न मिले।


ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है
यहां सर दे के होते हैं सौदे, आशिकी इतनी सस्ती नहीं है

प्रेम वालों ने कब वक्त पूछा
उनकी पूजा में, सुन ले ऐ उद्धव
यहां दम दम में होती है पूजा
सर झुकाने की फुर्सत नहीं है
ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है
जो असल में हैं मस्ती में डूबे
उन्हें क्या परवाह ज़िंदगी की
जो उतरती है, चढ़ती है मस्ती
वो हकीकत में मस्ती नहीं है
ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है
जिसकी नज़रों में हैं श्याम प्यारे
वो तो रहते हैं जग से न्यारे
जिसकी नज़रों में मोहन समाये
वो नज़र फिर तरसती नहीं है
ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है
यहां सर दे के होते हैं सौदे, आशिकी इतनी सस्ती नहीं है —

श्री राधा को जिसने भुलाय़ा , उसने

अपना जनम गंवाय़ा !!
धन्य हुई वो वाणी जिसने ,
राधाश्य़ाम है गाया !!
उनका सुमिरन करे बिना , कब
मिलता है विश्राम !!
बोलो राधे-राधे राधे-जय श्री राधे श्याम !!

वो काला एक बासुँरी वाला, वो काला इक बासुँरी वाला
सुध बिसरा गया मोरि रे,
माखनचोर जो नंदकिशोर वो, कर गयों ओ रे मन की चोरी रे
कर गयों ओ रे मन की चोरी रे सुध बिसरा गया मोरि ....
कर गयों ओ रे मन की चोरी रे सुध बिसरा गया मोरि ....
वो काला इक बासुँरी वाला, सुध बिसरा गया मोरि रे.
पनघट पे मोरि बइयाँ मरोडी ....३
मैं बोली तो मेरी मटकी फोडी.
पइयाँ परु करु विनती मैं पर ..२
माने न इक वो मोरि
सुध बिसरा गया मोरि रे.... ,
वो काला इक बासुँरी वाला, वो काला इक बासुँरी वाला...
वो काला इक बासुँरी वाला, सुध बिसरा गया मोरि रे....
छुप गयो फिर इक तान सुना के ...३
कहा गयो एक बाण चला के,
गोकुल ढूंढ़ा, मैनें मथुरा ढूंढ़ी ..२
कोइ नगरियाँ ना छोडी रे, सुध बिसरा गया मोरि रे.... ,
सुध बिसरा गया मोरि रे.... , वो काला इक बासुँरी वाला,
वो काला इक बासुँरी वाला सुध बिसरा गया मोरि रे.... ,
वो काला इक बासुँरी वाला, सुध बिसरा गया मोरि रे.... ,
वो काला इक बासुँरी वाला ,
वो काला इक बासुँरी वाला... माख्ननचोर जो,
नंदकिशोर वो, कर गयों औरे मन की चोरी रे

Thursday, August 23, 2012


शास्त्रों में लिखा है कि जहां भगवान विष्णु कृपा होती है, वहां मां लक्ष्मी भी वास करने लगती है। इसलिए खासतौर पर भगवान विष्णु स्वरूप श्रीशालिग्राम पूजा सुख-समृद्धि, शांति व लक्ष्मी कृपा देने वाली होती है। इस धार्मिक दर्शन व उपाय में एक जीवन सूत्र यह भी मिलता है कि घर में शांति कायम रखने और कलह न करने से भरपूर सुख-वैभव मिलता है।

घर-परिवार में ऐसी ही खुशहाली के लिए वर्तमान में जारी अधिकमास (18 अगस्त से शुरू) के शुक्रवार के दिन खासतौर पर धन कामना पूरी करने के लिए शाम के वक्त भगवान विष्णु का रूप शालिग्राम शिला की पूजा का विशेष उपाय अपनाएं व विष्णु मंत्र का ध्यान करेंशाम को स्नान कर विष्णु रूप शालिग्राम शिला को पहले पंचामृत यानी दूध, दही, शहद, घी और शक्कर के मिश्रण से स्नान कराकर विशेष रूप से केसर मिले चन्दन जल से स्नान कराएं। स्नान के बाद भगवान शालिग्राम की गंध, सफेद तिल, फूल, वस्त्र, तुलसी के पत्ते, दूर्वा, इत्र आदि लगाकर पूजा करें। अगली तस्वीर के साथ बताया भगवान विष्णु का मंत्र बोलें। बाद भगवान शालिग्राम की आरती धूप और घी के दीप जलाकर करें। अंत में शालिग्राम को स्नान कराएं चरणामृत का सेवन जरूर करें। इससे न केवल तीर्थजल के समान पुण्य मिलता है बल्कि सुख-समृद्धि भी आती है। अगली तस्वीर पर क्लिक कर जानिए शालग्राम स्मरण का विशेष मंत्र- प्रणवेन च लक्ष्यो वै गायत्री च गदाधर:। शालग्रामनिवासी च शालग्रामस्तथैव च।। जलशायी योगशायी शेषशायी कुशेशय:। महीभर्ता च कार्यं च कारणं पृथिवीधर:।।

हिन्दू धर्मग्रंथ भगवान विष्णु की बेजोड़ शक्तियों व स्वरूपों की महिमा उजागर करते हैं। जहां विष्णु का विराट स्वरूप कर्म व धर्म की राह बताता है तो उनके सारे चमत्कारी अवतार नैतिक मूल्यों और बेहतर आचरण के सबक के जरिए सही तरीके से जीना सिखाते हैं।

यही वजह है कि विष्णु उपासना की विशेष तिथियों व घड़ियों में भगवान विष्णु का स्मरण मात्र ही मनोरथ सिद्धि करने वाला माना गया है। 18 अगस्त से 16 सितंबर तक चलने वाला अधिकमास भी ऐसा ही पुण्यकाल है। इसमें खासतौर पर शास्त्रों में बताई एक विष्णु मंत्र स्तुति के शक्तिशाली मंत्रों को हर सुबह बोलना किसी भी तरह की परेशानी या संकट से बचने में बहुत ही चमत्कारी माना गया है। यही नहीं ये मंत्र केवल धूप, दीप लगाकर बोलने मात्र से ही मनचाही मुरादें पूरी कर देते है। यह मंत्र स्तुति विष्णु पञ्जर स्तोत्र के नाम से भी प्रसिद्ध है।

धर्म मान्यता है कि इसके प्रभाव से ही जगतजन
नी मां कात्त्यायनी ने भी रक्तबीज, महिषासुर जैसे राक्षसों को मार गिराया।

प्रवक्ष्याम्यधुना ह्येतद्वैष्णवं पञ्जरं शुभम्। नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्।। प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गत:। गदां कौमोदकीं गृह्य पद्मनाभ नमोस्तु ते।। याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गत:। हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम।। प्रतीच्यां रक्ष मां विष्णो त्वामहं शरणं गत:। मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्।। उत्तरस्यां जगन्ननाथ भवन्तं शरणं गत:। खड्गमादाय चर्माथ अस्त्रशस्त्रादिकं हरे।। नमस्ते रक्ष रक्षोघ्र ऐशान्यां शरणं गत:। पाञ्चजन्यं महाशङ्खमनुघोष्यं च पङ्कजम्।। प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्रेय्यां यज्ञशूकर। चन्द्रसूर्य समागृह्य खड्गं चान्द्रमसं तथा।। नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्ते नृकेसरिन्। वैजयन्ती सम्प्रगृह्य श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्।। वायव्यां रक्ष मां देव हयग्रीव नमोस्तुते। वैनतेयं समरुह्य त्वन्तरिक्षे जनार्दन।। मां रक्षस्वाजित सद नमस्तेस्त्वपराजित। विशालाक्षं समारुह्य रक्ष मां तवं रसातले।। अकूपार नमस्तुभ्यं महामीन नमोस्तु ते। करशीर्षाद्यङ्गलीषु सत्य त्वं बाहुपञ्जरम्।। कृत्वा रक्षस्व मां विष्णो नमस्ते पुरुषोत्तम। एतदुक्तं शङ्काराय वैष्णवं पञ्जरं महत्।। पुरा रक्षार्थमीशान्यां: कात्यायन्या वृषध्वज। नाशयामास सा येन चामरं महिषासुरम्।। दानव रक्तबीजं च अन्यांश्च सुरकण्टकान्। एतज्जपन्नरो भक्तया शत्रून् विजयते सदा।।

Wednesday, August 22, 2012

धर्म के नजरिए से पुरुषार्थ या कर्म या मेहनत ही वह राह है, जिस पर आगे चलकर जीवन के सारे सुख और आनंद पाना संभव हो पाता है। वहीं कर्म के लिए ऐसा संकल्प भाव जगाना ज्ञान के बूते ही संभव हो पाता है। पौराणिक मान्यताओं में जगतपालक भगवान विष्णु व उसने सारे अवतार जिनमें खासतौर पर भगवान कृष्ण ने कर्म और ज्ञान के ऐसे सबक सिखाए जो ज़िंदगी की हर मुश्किलों को आसान बना देते हैं।


18 से शुरू हुआ अधिकमास खासतौर पर इन दोनों देवताओं की भक्ति की शुभ घड़ी है। किंतु अधिकमास में गुरुवार को ही जगतगुरु साईं बाबा की उपासना का दुर्लभ संयोग बना है। साईं बाबा ने भी ज्ञान, कर्म व भक्ति रूपी संकल्प को जीवन के हर पहलू से जोड़कर सुख-सफलता के ऐसे ही अहम सूत्र सिखाए, जिनमें सभी की भलाई का भाव छिपा है।


धर्म आस्था से साईं बाबा भगवान दत्तात्रेय के अवतार माने जाते हैं और भगवान दत्तात्रेय त्रिगुण शक्तियों यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश का स्वरूप। इसलिए खासतौर पर धर्म परंपराओं में अधिकमास में भगवान विष्णु और साईं बाबा के जगतपालक स्वरूप का ध्यान एक ही विशेष मंत्रों से करने का महत्व बताय गया है। इनके शुभ प्रभाव से शांति-सुख की इच्छा पूरी होती है और हर परेशानी दूर हो जाती है। जानिए अधिकमास-गुरुवार के दुर्लभ संयोग में भगवान विष्णु और साईं बाबा को याद करने के मंत्र विशेष व तरीका -


- गुरुवार को भगवान विष्णु और साईं बाबा के चरणों में दूध-जल, पीला या केसरिया चंदन, पीले फूल चढ़ाएं। यथाशक्ति प्रसाद चढ़ाकर अगली मनमोहक तस्वीर के साथ बताए साईं मंत्रों को भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए बोलें।ॐ श्री साईं जगत: पित्रे नम: (जगत पालन करने वाले साईं बाबा को नमन) ॐ श्री साईं योगक्षेमवहाय नम: (हर सुख देने के साथ उसकी रक्षा भी करने वाले साईंबाबा) ॐ श्री साईं प्रीतिवर्द्धनाय नम: (प्रेम भाव बढाने वाले साईंबाबा को नमन) ॐ श्री साईं भक्ताभय प्रदाय नम: (अभय दान देने वाले हैं साईं बाबा को नमन)

Tuesday, August 21, 2012

किसी भी काम में संकल्प के बिना कामयाबी मुश्किल हो जाती है। संकल्प के साथ ही योग्यता और कुशलता भी जरूरी है। मजबूत, दक्ष और समर्पित व्यक्ति ही संकल्प को पूरा कर सकता है और सफलता का अधिकारी होता है।

धार्मिक नजरिए से व्रत भी संकल्प का पर्याय है। व्रत पूरा करने और मनचाहे नतीजे पाने के लिए भी संकल्प, समर्पण और योग्यता जरूरी है। हर धर्म का व्यक्ति व्रतों का पालन करता है। इनके द्वारा वह इच्छाओं को पूरा करना व परेशानियों से निजात पाना चाहता है। हालांकि वक्त बदलने के साथ धार्मिक व्रतों में समय और सुविधाओं के मुताबिक बदलाव देखा गया है। किंतु हिन्दू धर्म शास्त्रों में धार्मिक व्रतों को किसे रखना चाहिए, इस संबंध में भी साफ तौर पर बताया गया है। ऐसे लोग भगवान की भक्ति से मनचाहा सुख-सौभाग्य पाते हैं।

व्रत-उपवास के यही शास्त्रोक्त बातें वर्तमान में जारी अधिकमास के लिए भी लागू होते हैं। जानिए इस विशेष घड़ी में व्रत-उपवास से किन-किन लोगों के लिए भाग्यशाली साबित होते हैं -

- वह व्यक्ति जो अपने वर्णाश्रम के आचार-विचार में रहते हों। यानी व्यक्ति का आचरण वर्णाश्रम के मुताबिक नियत उम्र, धर्म और संस्कारों के अनुरुप हो। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास आदि अवस्थाओं के लिए नियत पवित्र आचरणों का पालन करने वाला। इस अवधि का वर्तमान संदर्भ में विचार करें।

- जो व्यक्ति झूठ-कपट या छल से दूर रहता हो।

- जो व्यक्ति लालच न रखता हो।

- ऐसा व्यक्ति जो मन, बोल और काम में सत्य को अपनाता हो।

- जो व्यक्ति पूरे जगत के लिए परोपकार और हित की भावना रखता हो।

- वेदों को मानने और सम्मान करने वाला।

- बुद्धिमान और संकल्पवान व्यक्ति जो पूरी तरह से विधि-विधान से धर्म-कर्म को करने वाला हो।

इस तरह के गुण रखने वाले कोई भी स्त्री या पुरुष, चाहे वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र ही क्यों न हों, व्रत के अधिकारी हैं।

इनके अलावा शास्त्रों में विवाहित स्त्रियों के व्रत रखने के संबंध में बहुत अच्छी बात बताई गई है, जिसके मुताबिक सौभाग्यवती स्त्री के लिए पतिव्रत ही सर्वश्रेष्ठ और कल्याण करने वाला कहा गया है। पति की सेवा ही किसी भी यज्ञ, व्रत और उपासना से श्रेष्ठ है। इससे वह स्त्री स्वर्ग और देवलोक को पा सकती है। फिर भी अगर कोई महिला व्रत करने की इच्छुक हो तो वह पति की आज्ञा से व्रत पालन कर सकती है।

आधुनिक संदर्भों में भी यहीं बातें बहुत प्रासंगिक सिद्ध होती है। इनको धार्मिक और व्यावहारिक जीवन में अपनाकर चरित्र और जीवन में आए दोष और बुराइयों को दूर कर सकते हैं। धर्म विरोधी विचारों वाले लोग इन बातों का दोष दर्शन और छिद्रान्वेषण द्वारा उपहास कर सकते हैं। लेकिन धर्म पालन करने वाले व्यक्तियों के लिए इन बातों का पालन उतना ही आसान है।

OM GOVINDAE VIDHMAE

OM GOVINDAE VIDHMAE

Gopi Vallabhaya Dheemahe Thanno Krishna Prachodayath.

Monday, August 20, 2012

KRISHNA GYATRI MANTAR

JAI SHREE KRISHNA

Om Dhamodharaya Vidhmahe Rukmani Vallabhay Dheemahe Thanno Krishna Prachodayath.

RADHEY RADHEY

[This year, in honor of Sri Radhastami, Srila Bhaktivedanta Narayana Gosvami Maharaja gave two discourses on the glories of Srimati Radhika; one on the eve of Radhastami and one on the following morning. Srila Maharaja spoke in his mother tongue, Hindi, and his words were simultaneously translated by Akhilesh dasa Adhikari into the headphones of the English speaking devotees in the audience. Today you will receive his discourse of Radhastami eve, and in a couple of days, the Radhastami morning discourse.]
Sri Krsna was present at Vamsivata, the place of the rasa dance, but He was not happy. He wanted to perform loving pastimes but He was all alone. Srimati Radharani then appeared from His left side, and Sankara (Siva), Sri Gopisvara, appeared from His right side as guru-tattva. Radha ran to Krsna with great pleasure. Ra is for anuragi, meaning ‘deep spiritual loving attachment,’ and dha is for dhavati, which means ‘to run very fast, with great eagerness.’ Krsna worshiped that very Radha, and therefore Her name became Radhika.
When Krsna first appeared in Gokula, Narada came for His darsana and thought, “Krsna never appears alone; His hladini-sakti must also have been born.”
In the meantime, Vrsabhanu Maharaja was staying in Raval, where he daily took bath in the river Yamuna. One day, fifteen days after the birth of Lord Krsna, just after taking his bath, Vrsabhanu Maharaja saw a thousand-petaled lotus flower in the Jamuna. In the middle of that lotus flower was a beautiful baby girl sucking Her thumb and moving Her hands and legs. Seeing Her, he immediately picked Her up, took Her in his arms, brought Her to his wife Kirtika, and placed Her on Kirtika’s lap. Not many people know Radhika as the daughter of Kirtika-devi; they mostly know Her as the dear daughter of Vrsabhanu Maharaja.
Just after the appearance of that baby girl, Narada went to Vrsabhanu Maharaja’s home and inquired from him, “Has there been any child born of you?”
Vrsabhanu Maharaja replied, “Yes, a son called Sridama.”
Narada then blessed Sridama and asked, “Has there been any child born more recently?”
Vrsabhanu Maharaja replied, “Yes, a few days ago a daughter was born; I was blessed with a daughter.”
Narada asked Vrsabhanu Maharaja, “May I see your daughter? I want to do Her chart and bless Her. I will describe Her future qualities. Please gather candana, Yamuna water, and other paraphernalia so that I can perform a ceremony to bless Her.”
Vrsabhanu Maharaja then went inside the house and Narada entered a trance of meditation. While he was meditating, that baby girl manifested an exquisite youthful form. Lalita and Visakha were also present, and Lalita told him, “Why are you continuing to meditate; stand up and offer your obeisances.”
Narada then received a one-moment darsana of Radhika, but because his thirst to see Her was not quenched, he went to Narada-kunda and performed austerities for thousands of years, without eating, and continually chanting Radha mantra-japa. At that time Radharani appeared to Him, gave him Her service, and he became Naradiya gopi. We know these details from sastra.
Srimad-Bhagavatam states, “Ete camsa-kalah pumsah krsnas tu bhagavan svayam – Krsna is the original Supreme Personality of Godhead.” Although Sri Krsna is the supreme worshipful Lord of all, He Himself worships Sri Radha. The aim of the author, Srila Vyasadeva, in manifesting Srimad-Bhagavatam was to describe Sri Krsna’s pastimes with Srimati Radhika and to establish Her glories. Srila Sanatana Gosvami and Srila Visvanatha Cakravarti Thakura say that rasa-lila, the most exalted pastime in Srimad-Bhagavatam, was performed for the sake of Srimati Radhika. Krsna personally told Her, “It is for You that I reside in Vraja.”
sata-koti gopi madhava-man
rakhite narilo kori jatan (verse 11 of Varaja-vipine)
[“Millions of cowherd damsels are unable to please the mind of Madhava although endeavoring to do so.”
“The flute song calls the name of Radhika – ‘Come here, come here, Radhe!’ Syama calls out in the night. (verse 12)
“When the sri-rasa-mandala comes to a halt in search of Beloved Radha He then goes. (verse 13)
“Please appear, O Radhe! Kindly save My life!” calling out while weeping Kan in the forest. (verse 14)
“In a secluded grove embracing Radhika regaining His life and soul, Hari is relieved. (verse 15)
“Saying, ‘Without You, where is the rasa dance? Only because of You do I live in Vraja.” (verse 16)
“At the lotus feet of such a Radhika this Bhaktivinoda says weeping, (verse 17)
“’Among Your personal associates please count me also; making me Your maidservant keep me as Your own.’” (verse 18)]
Even though millions of gopis were also present in the arena of rasa, they could not attract Krsna’s mind when Radhika disappeared from rasa-lila. Radharani first disappeared from the rasa-lila, in maan; Krsna did not disappear from there alone. He left the rasa dance to search for Her. Very worried and crying, “Radhe Radhe,” He finally found Her.
The other gopis, who had left the rasa dance to search for Krsna, now saw two sets of footprints. One set was Krsna’s footprints, and the other, smaller and more delicate set belonged to a lady.
Lalita and Visakha and the other gopis of Sri Radha’s party, who had been searching both Radha and Krsna, knew that this second set of footprints belonged to Srimati Radhika. Very pleased, they thought, “Oh, Krsna is not alone; He has taken our prana-priya (dearmost) sakhi with Him. At the same time, however, they were sad, thinking, “We can’t serve Her now, because we are not with Her.”
The other gopis, those who are not in Radha’s party, uttered this verse:
anayaradhito nunam
bhagavan harir isvarah
yan no vihaya govindah
prito yam anayad rahah
[“Certainly this particular gopi has perfectly worshiped the all-powerful Personality of Godhead, Govinda, since He was so pleased with Her that He abandoned the rest of us and brought Her to a secluded place.” (Srimad-Bhagavatam, 10.30.28)]
“Oh, this girl who is with Krsna is so fortunate. Krsna has taken Her and has thus broken our pride (saubhagya-mada).” They understood that this girl was superior to them: “She had surely served Narayana and pleased Him, and due to Narayana’s blessing upon Her, Krsna took Her alone.” Thus, Radhika is the topmost of all of Krsna’s beloveds, and rasa-lila was performed in order to establish Her superiority. It was performed for Her pleasure.
After all the gopis sang their song of separation, Krsna appeared to them and uttered this verse:
na paraye 'ham niravadya-samyujam
sva-sadhu-krtyam vibudhayusapi vah
ya mabhajan durjara-geha-srnkhalah
samvrscya tad vaù pratiyatu sadhuna
[“I am not able to repay My debt for your spotless service, even within a lifetime of Brahma. Your connection with Me is beyond reproach. You have worshiped Me, cutting off all domestic ties, which are difficult to break. Therefore, please let your own glorious deeds be your compensation. (Srimad-Bhagavatam, 10.32.22)]
“Oh gopis, for My sake you left your shyness, the instructions of your superiors, and your lives as householders, which were meant to keep you bound. By your saintly nature, may you free Me from My debt.”
One of the ways in which Radhika pleases Krsna is by entering into the loving stage called maan, Her sulky mood of affectionate jealous anger towards Him. Sometimes Her maan has no external cause, and sometimes it has a cause. The vipaksa (rival) gopis headed by Candravali criticize Radharani by saying, “She doesn’t feel ashamed or shy to do maan? I don’t want to see Her face.” On the other hand, Radhika criticizes Candravali, “Candravali knows nothing about pleasing a beloved. She doesn’t know how to do maan.” Candravali’s affection for Krsna is grta-sneha, very smooth. Radhika’s affection is madhu-sneha, like madhu, honey, which is smooth and also sweet. Candravali’s affection is compared with ghee, which needs sugar to become sweet, but madhu is sweet on its own.
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The stages of Radhika’s love are adiruddha, mohan and madan mahabhava. These stages of love are so elevated that Krsna Himself cannot experience them. Therefore, in order relish them, Krsna appears in Sri Navadvipa dhama, along with His associates, in the form of Sri Caitanya Mahaprabhu. For this same purpose, Mahaprabhu went to see Sri Raya Ramananda at Godavari and asked him many questions.
In Sri Krsna’s pastimes, Raya Ramananda is Visakha-devi, Radharani’s gopi friend, who understands all of Radharani’s moods. This very same Visakha, in the form of Raya Ramananda, trained Mahaprabhu in realizing these moods. After their meeting, Mahaprabhu told him, “I am so pleased; this is why I came. My desires are now fulfilled. Please come to Jagannatha Puri and help Me there.”
Tomorrow morning we will sing the glories of Radha and perform abhiseka (Her bathing ceremony). We will also offer puspanjali (the flowers of our hearts) by describing Her glories in detail. Then we will go out with nagara sankirtana to householder devotees’ homes to collect gifts for Srimati Radhika, as we do every year. Then we will return to the Matha, with kirtana, and bring all the presents to the altar. Then we will all sit together and participate in kirtana in the Matha.

RADHA GYATRI MANTAR

Aum Vrashbhanujaye Vidmahe
Krishnapriyaye Dhi-Mahi
Tanno Radha Prachodayat

VISHNU MANTAR

SHAANTAAKAARAM
BHUJAGASHAYANAM

PADMANAABHAM SURESHAM


VISHWAADHAARAM
GAGANASADRASHAM

MEGHAVARNAM SHUBHAANGAM

LAKSHMIKAANTAM
KAMALANAYANAM

YOGIBHIRDHYAANAGAMYAM

VANDE VISHNUM

BHAVABHAYAHARAM

SARVALOKAIKANAATHAM

jai shree bankey bihari jiiiii

बांके बिहारी मंदिर - भगवान श्रीकृष्ण का यह मंदिर वृंदावन के साथ ही पूरे भारत में प्रसिद्ध है। इसका मंदिर निर्माण सन् 1864 में पूर्ण हुआ। श्रीबांकेबिहारी को कृष्ण भक्त स्वामी हरिदास द्वारा प्रतिष्ठित किया गया। स्वामी हरिदास अपने भक्तिमय भजन के साथ ही इतिहास प्रसिद्ध संगीतकार तानसेन के गुरु के रूप में भी जाने जाते हैं।

Sunday, August 19, 2012

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बलिहारी बलिहारी सब संतन की..

||...संत का स्वभाव ही है परोपकार.
सर्वस्व लुट जाए, नाम, प्रतिष्ठा सब समाप्त हो जाए लेकिन जीव कल्याण का
व्रत उनका स्वभाव ही है.. भक्त हरिदास को गुंडों ने इतना मारा कि मारा हुआ
समझ कर नदी में फेंक दिया लेकिन हरिदास जी
के मुंह से यही शब्द निकले.. 'प्रभु इनके ऊपर दया करो, ये अज्ञानी हैं..'
संत उसमान के ऊपर राख का टोकरा फेंक दिया. वह ख़ुशी से नाचने लगे, कहने
लगे.. 'अरे मैं तो अंगारे फेंकने लायक हूँ, यदि हर क्षण मेरे द्वारा प्रभु
का स्मरण नहीं होता तो इस शरीर को ही जलाकर राख कर देना चाहिए...' ऐसे होते
हैं संत, बेचारे कृपा के अतिरिक्त कुछ कर ही नहीं सकते. गालियाँ दो तो भी
प्यार और प्यार के बदले तो प्यार देते ही हैं...||

TRIPUTI BALA JI MANDIR

भगवान विष्णु को अनेक रूपों में पूजा जाता है। कहीं श्रीराम के रूप में तो कहीं श्रीकृष्ण के रूप में। तिरूपति बालाजी भी भगवान विष्णु का ही एक रूप हैं। भगवान तिरूपति बालाजी का मंदिर दक्षिण भारत में स्थित है। इस मंदिर को देश का सबसे अमीर मंदिर होने का भी दर्जा प्राप्त है। यह एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां सबसे अधिक चढ़ावा आता है।

भगवान तिरूपति बालाजी भक्तों की मन्नतें पूरी करते हैं और भक्त भेंट स्वरूप अपने बाल और धन भगवान को अर्पित करते हैं। भगवान तिरूपति के मंदिर में पूरे वर्ष समान भीड़ रहती है।- भारत का सबसे धनी और संसार के सबसे धनी मंदिरों में आंध्रप्रदेश में तिरूपति नामक स्थान पर भगवान विष्णु (वैंकटेश) का मंदिर है। - वैंकटेश भगवान को कलियुग में बालाजी नाम से भी जाना गया है।
तमिल भाषा में तिरू अथवा थिरू शब्द का वही अर्थ है जो संस्कृत में श्री है। श्री शब्द, धन-समृद्धि की देवी लक्ष्मी के लिये प्रयुक्त होता है। - तिरूपति देवस्थान बोर्ड में लगभग पच्चीस हजार कर्मचारी नियुक्त हैं।
इस मंदिर में सर्वाधिक चढ़ावा आना अपने आपमें व्यक्त करता है कि यहां जनसाधारण की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और कष्ट दूर होते हैं। - भारत के सभी मंदिरों की अपेक्षा सबसे अधिक चढ़ावा तिरूपति मंदिर में आता है इसलिए इसे देश का सबसे अमीर मंदिर भी कहा जाता है।

JAI SHREE GOVARDHAN DHARI KI

भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुलवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने तथा इंद्र की पूजा न करने का कहकर इंद्र का घमण्ड तोड़ा था। चूंकि ग्रामवासियों द्वारा पूजित होने पर ही इंद्र वहां वर्षा करते थे इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र का घमण्ड तोड़कर उसे यह बताया कि वर्षा करना आपका मौलिक कर्तव्य है। इसके लिए कोई आपकी पूजा करे यह आवश्यक नहीं है।

इस प्रकार श्रीकृष्ण ने इंद्र को फल रहित कर्म करने का कर्तव्य बोध कराया था। इस संदर्भ का सार है कि सभी को अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक प्रकार से बिना किसी अतिरिक्त फल की अभिलाषा से करना चाहिए। चूंकि कर्तव्य का निर्वहन करना आपकी मौलिक जिम्मेदारी है।

जब श्रीकृष्ण ने अगुंली पर उठाया गोवर्धन

अच्छी वर्षा के लिए गोकुलवासी इंद्र को प्रसन्न करने के लिए उसकी पूजा करते थे। लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत का महत्व इंद्र से अधिक बताने पर जब ग्रामवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा की तो इंद्र बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने गोकुलवासियों को सबक सीखाने के लिए भंयकर वर्षा की जिससे सारा गांव डूबने लगा।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी एक अंगुली पर उठाकर गोकुलवासियों को आश्रय प्रदान किया था तथा इंद्र का घमण्ड भी तोड़ा था। श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप को जानकर इंद्र ने उनकी स्तुति की तथा क्षमायाचना की। तब श्रीकृष्ण ने इंद्र को समझाया था कि सभी स्थानों पर समान रूप से वर्षा करना आपका कर्तव्य है इसके लिए मन में पूजा की अभिलाषा रखना सर्वथा अनुचित है

bhagwan kehte hai

भगवान कहते हैं :-
किसी को दुख देकर मुझसे अपने सुख की इच्छा मत
करना,
लेकिन
अगर किसी को इक पल का भी सुख देते हो
तो अपने दुख की चिंता मत करना ।

chan thukda hai mera shyam

इतना खुबसूरत चेहरा है तुम्हारा ,
हर भक्त दीवाना है , तुम्हारा ,
लोग कहते है की चाँद का टुकड़ा हो तुम ,
लेकिन हम कहते हैं की चाँद टुकड़ा है तुम्हारा....

DILDAR KANHAIYA MERA

dil ki dil me ye samayi hui,,,,,,,,,,
tasveer hai ye dildar teri,,,,,,,,
in prano ke andar gunji nahi,,,,,,,,,
murli dhwani ki jhankar koi,,,,,,,,,
ham karte karte haar gaye,,,,,,,
manmohan yeh manuhaar teri,,,,,,,
par sundar shyam tu reejha nahi,,,,,,,
balihare teri balihari teri,,,,,,,,,,, ,,
aaja nandlal taras rahe naina,,,,,,,,,, ,,,,

jai tulsi maa

हिन्दू धर्म परंपराओं के मुताबिक हाल में शुरू हुआ अधिकमास भगवान विष्णु की भक्ति व उपासना से खुशहाल जीवन की कामना पूरी करने का काल है। माता लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी मानी गई हैं। हिन्दू धर्म के मुताबिक घर तुलसी का पौधा भी ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी का साक्षात स्वरूप है। इसलिए यह बड़ा ही पवित्र माना जाता है। यह भी मान्यता है घर के आंगन में तुलसी का पौधा  कलह और दरिद्रता दूर करता है। धर्मग्रंथों में तुलसी को विष्णुप्रिया कहा गया है। पुराणों में भी भगवान विष्णु और वृंदा यानी तुलसी के विवाह का वर्णन मिलता है।

वहीं आयुर्वेद के नजरिए से तुलसी के पौधे में औषधीय खूबियां होती है। इससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है व कफ से पैदा होने वाले रोगों से बचाव होता है। इसलिए तुलसी के पत्तों को खाना फायदेमंद बताया गया है, पर इसके साथ ही तुलसी के पत्तों का सही तरीके से सेवन करने की नसीहत भी दी गई है। ऐसा न करने पर तुलसी के पत्ते नुकसान भी पहुंचा सकते हैं


वहीं आयुर्वेद के नजरिए से तुलसी के पौधे में औषधीय खूबियां होती है। इससे शरीर की प्रतिरोधक
क्षमता बढ़ती है व कफ से पैदा होने वाले रोगों से बचाव होता है। इसलिए तुलसी के पत्तों को खाना फायदेमंद बताया गया है, पर इसके साथ ही तुलसी के पत्तों का सही तरीके से सेवन करने की नसीहत भी दी गई है। ऐसा न करने पर तुलसी के पत्ते नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। तुलसी के पत्ते खाने का सही तरीका यही बताया गया है कि जब भी तुलसी के पत्ते मुंह में रखें, उन्हें दांतों से न चबाकर सीधे ही निगल लें। इसके पीछे विज्ञान यह है कि तुलसी के पत्तों में पारे की धातु के अंश होते हैं, जो चबाने पर बाहर निकलकर दांतों की सुरक्षा परत को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे दांत और मुंह के रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। इस तरह अधिकमास में यह भी ध्यान रहे कि विष्णुप्रिया की आराधना कर धर्म लाभ तो पाएं लेकिन उसका सेवन सावधानी से कर स्वास्थ्य लाभ भी पाएं।

Saturday, August 18, 2012

JAI VISHNU DEVAE NAMHA








JAI SHREE VISHNU DEVAE NAMHA हिन्दू धर्म पंचांग के अधिकमास (18 से शुरू) में भगवान की उपासना के लिए मात्र आहार ही नहीं उसके साथ-साथ रहन-सहन, व्यवहार और इंद्रिय सयंम की भी बड़ी अहमियत हैं। इसलिए देव उपासक को गलत बातों, काम व सोच से दूर रखने के लिए भी उपाय बताए गए है। इनको अपनाने से भगवान विष्णु की भक्ति शक्ति और सफलता के साथ घर-परिवार के खुशहाल बनाने वाली मानी गई है। खासतौर पर विष्णु भक्त व व्रत या उपवास रखने वाले जानिए कि क्या हैं ये सरल उपाय - - पुरुषोत्तम मास की अवधि में उपासक को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। - भूमि पर सोना चाहिए। - भोजन करने के लिए थाली का उपयोग न करते हुए, ढाक या पलाश के पत्तों की बनी पत्तल का उपयोग करना चाहिए। - मासिक धर्म से गुजर रही स्त्री या रजस्वला स्त्री और धर्म विरोधी लोगों की संगति से बचें। - वैष्णव यानी भगवान विष्णु को मानने वालों की सेवा और भोजन कराना चाहिए। - अधिकमास में व्रत करने वाले को भगवान शिव या अन्य देवी देवताओं, ब्राह्मण, वेद, गुरु, गाय, साधु-संत, स्त्री, धर्म की बुराई न करना चाहिए और न सुनना चाहिए। - गाय को घास और दाना खिलाना चाहिए। - वैष्णवों और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये। उनको सोना, चाँदी, गाय, घी, अन्न, कपड़े, बर्तन, जूते-चप्पल, छतरी, गीता-भागवत जैसी धार्मिक पुस्तकों का दान करना चाहिये। - काँसे के बर्तन में 30 मालपुए रखकर ब्राह्मण और वैष्णवों को दान करने को भी बहुत पुण्यकार्य माना जाता है

RADHEY SHYAM HARISH GARG



Friday, August 17, 2012

JAI VISHNU DEVAE NAMHA

ज़िंदगी में कई मौकों पर शरीर, बुद्धि, ज्ञान रूपी ताकत के गलत उपयोग के पीछे मन, बोल और व्यवहार में आया कोई न कोई दोष होता है। इससे थोड़े वक्त के लिए स्वार्थ सिद्ध या फायदा तो होता है, पर यही दोष आखिरकार बड़े कलह, अशांति, दु:ख, हानि और बुरे नतीजों की वजह भी बनता है। इससे तमाम सुख-सुविधाओं के बीच भी मन अशांत और अस्थिर रहता है।


धर्मशास्त्रों में मन और घर में प्रेम और शांति बनाए रखने के लिये ही जगतपालक भगवान विष्णु की भक्ति, सेवा और उपासना का महत्व बताया गया है। विष्णु पूजा मनचाहे सुख व संपन्नता भी देने वाली होती है। खासतौर पर इसके लिये अधिकमास (18 अगस्त से) में विष्णु भक्ति में कुछ मर्यादाओं और नियम-संयम का पालन भी जरूरी बताया गया है। इनसे अनजाने होने वाले धर्म व देव दोष से बचा जा सकता है।सबसे पहले विष्णु पूजा में तन की पवित्रता और स्वच्छता को अपनाएं। शौच के बाद बिना नहाए विष्णु आराधना न करें। बिना दांतों की सफाई किए बिना पूजा-उपासना न करें। गंदे और मैले वस्त्र पहनकर विष्णु पूजा न करें। काले या लाल वस्त्र पहनने के स्थान पर पीले वस्त्र पहन पूजा करें। पूजा के समय उदर या पेट की वायु न छोडें। मासिक धर्म से गुजर रही स्त्री के स्पर्श हो जाने पर स्नान करने के बाद ही विष्णु पूजा करें। शवयात्रा में शामिल होने या शव को छूने के बाद बिना स्नान कर ही विष्णु दर्शन या पूजा न करें।

JAI SHREE KRISHNA

हिन्दू धर्म में अधिकमास यानी पुरुषोत्तम मास पवित्र व पुण्यदायी माना जाता है। इसमें भगवान विष्णु व उनके ही पुरुषोत्तम रूप की भक्ति का महत्व है। शास्त्रों में उजागर किया गया है कि पुरुषोत्तम मास में व्रत-नियम के लिए कैसा रहन-सहन, खान-पान व बोलचाल होना चाहिए। इनका पालन करने से संकल्प शक्ति मजबूत होती है। इससे बुद्धि, विचार, चेतना, ज्ञान और एकाग्रता बढ़ती है। ऐसा माना जाता है कि इस मास में विधिपूर्वक उपासना से भगवान पुरुषोत्तम, जगत पालक श्रीविष्णु और श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न होते हैं। साथ ही विष्णु पत्नी महालक्ष्मी की कृपा से भी सौभाग्य व संतान सहित हर सुख मिलते हैं।

अगर आप भी यशस्वी, सफल, धनवान व खुशकिस्मत बनने की कामना रखते हैं तो भावना व आस्था से इस माह में जगतपालक श्री विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा के शास्त्रों में बताए कुछ आसान व असरदार उपाय स्वयं करें या किसी विद्वान ब्राह्मण से करवाएं।ऊँ न
मो भगवते वासुदेवाय इस बारह अक्षरों वाले महामंत्र का हर रोज जप करें। कलश स्थापना कर अखण्ड दीप पूरे अधिकमास में जलाएं।तुलसी के पत्तों पर ऊँ या श्रीकृष्ण चन्दन से लिखकर भगवान शालिग्राम शिला पर अर्पित करना चाहिए। श्रीकृष्ण, श्रीशालग्राम शिला की हर रोज पंचामृत(दूध, दही, शहद, शक्कर व घी)से पूजा करें।
श्रीमद्भागवतपुराण, श्रीमद्भगवदगीता का पाठ करना या सुनना चाहिए।
सुबह सूर्योदय से पहले उठकर नित्यकर्म, दातुन व स्नान कर भगवान विष्णु की षोडशोपचार पूचा यानी सोलह पूजा उपायों व सामगियों से भगवान की पूजा करनी चाहिएइस मास में घर, मंदिर, तीर्थ और पवित्र देवस्थानों में भगवान विष्णु की पूजा के साथ ही व्रत-उपवास, दान, पुण्य, पूजा, कथा कीर्तन और जागरण करना चाहिए। इस तरह पूरे पुरुषोत्तम मास में संभव हो तो हर रोज धार्मिक आचरण करने से जीवन तनावों से दूर होता है, मन, शांत और चित्त की चंचलता नहीं रहती। इससे जीवन को नए तरीके और सोच से जीने की राह दिखाई देती है। इसलिए जीवन को पतन से बचाने और आत्म अनुशासन पाने के लिए धर्म का मार्ग सबसे सरल है।

jai gaU MATA

कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के 'गोरक्षा-सम्मेलन' मेँ भाषण देते हुए नामधारी सिख-सम्प्रदायके सद्गुरु महाराज श्रीजगजीतसिँहजी ने गोमाता के द्वारा प्रत्यक्ष प्रकट होकर एक मुसलमान सज्जनकी प्राण रक्षा की अद्भुत घटना सुनायी थी । जब महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध वारकरी-संप्रदाय के सत्य पूज्य श्रीकृष्णगोपाल वानखड़े गुरुजी महाराज कृपापूर्वक मेरे यहाँ पिलखुवा पधारे तो मैँने वह घटना उनको सुनायी । वे इसे सुनकर बड़े प्रभावित हुए और स्वयं भैनी साहब जाकर महाराज श्रीजगजीतसिँहजी से मिले और पूरी घटना उनसे सुनकर मुझे लिखकर भिजवायी । वही यहाँ प्रकाशित है-



तपामंडी तहसील वरनाला जिला संगरुर मेँ एक मुसलमान सज्जन रहते थे, जो गोमाता के बड़े भक्त थे । उन्हीँके जीवन की यह सत्य घटना है । सन् 1947 मेँ हिँदुस्तान-पाकिस्तान के बँटवारे के समय जब समस्त देश मेँ भयंकर मार-काट मच रही थी तो उस समय घोर भयंकर विपत्तिके समय मेँ उन मुसलमान सज्जन के प्राणोँकी रक्षा गोमाता ने स्वयं प्रकट होकर कैसे अद्भुत ढ़ंगसे की, इसके संबंधमेँ स्वयं उन मुसलमान सज्जन ने सद्गुरु महाराज श्रीजगजीतसिँहजी को सुनाते हुए बताया-



सन् 1947 से कुछ दिनोँ पूर्व की बात है कि कुछ मुसलमान कसाई बूचड़ोँ को मैँने एक बहुत दुबली-पतली गाय ले जाते देखा । वे उसे काटने के लिए ले जा रहे थे । मुझे उस गाय को देखकर बड़ी दया आयी और मैँने उनसे वह गाय मोल देने के लिए कहा । उन कसाइयोँ ने मुझसे उस गाय के दाम बीस रुपये माँगे । मेरे पास उस समय बीस रुपये थे नहीँ । मैँ बड़ा गरीब आदमी था; फिर भी मैने गाय के प्राण बचाने की सोची और मैँने अपने घरपर जाकर अपनी भौजाई से एक सोने की चीज ली । उसे गिरवी रखकर बीस रुपये प्राप्त किये और वह गाय उनसे खरीद ली । मैँने कसाइयोँ के हाथोँ से बचायी गयी उस गाय को अपने घर पर नहीँ रखा; क्योँकि मैँने यह काम घरवालोँ से बिना पूछे चोरी से किया था । जब वह गाय ब्यायी तो अपने घरपर लानेपर दूध के लालच से किसीने भी इनकार नहीँ किया । कुछ सालतक उस गाय को अपने पास रखकर फिर उसे मैँने ऐसी जगहपर बेच दिया कि जहाँ फिर उसको किसी प्रकार का कष्ट न हो और उसके जीवन को किसी प्रकार का भी खतरा न हो ।



सन् 1947 मेँ हिँदुस्तान-पाकिस्तानका बँटवारा हुआ तो सभी को यह मालूम है कि उस समय एक बहुत बड़ा कत्लेआम हुआ था और उस समय हिँदू-मुसलमान एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गये थे । मुसलमानोँने हिँदुओँको और हिँदुओँने मुसलमानोँको मारा-काटा था । हम मुसलमान वहाँ पर थोड़ी संख्यामेँ थे तो जब हमपर हमला हुआ तो हम हिन्दुओँके उस हमले से डरकर एक मकान के अंदर घुस गये और अंदर से उस मकान की साँकल लगा दी । लोगोँने मकानको घेरकर उसमेँ आग लगा दी । मकान मेँ आग लगी देखकर सब लोग एकदमसे बाहर निकल गये । सिर्फ मैँ ही अकेला उस मकानके अंदर रह गया, मकान धुएँ से भर गया । मकान के चारोँ ओर आग लगी थी । अब तो मैँ बड़ा घबराया कि अब मेरे प्राणोँ की रक्षा इस समय कैसे होगी ? अकस्मात मैँ उस समय क्या देखता हूँ कि जिस गाय को मैँने कुछ दिनोँ पूर्व मुसलमान कसाइयोँ के हाथोँ से बचाया था, ठीक उसी प्रकार की और ठीक उसी रंग की गाय की पूँछ मेरे सामने घूमने लगी और अपनी पूँछ से उस धूएँ से और उस आग से मेरी बराबर रक्षा करती रही । फिर जब आतंक समाप्त हुआ तो मैँ उस गाय की कृपा से अग्नि के बीच से जीवित निकल आया ।



यह है हमारी पूजनीया गोमाता की भक्ति का महान आश्चर्यजनक अद्भुत चमत्कार ।


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Thursday, August 16, 2012

SHYAM PREM

अमूल्य श्याम प्रेम का मूल्य केवल अविरल अश्रुधारा ही है. और कोई साधन नहीं है जो प्रिय-प्रियतम को प्रसन्न कर सके. अपने आपको साधनहीन स्वीकार करते हुये करुण क्रन्दन बस यही जन्माष्टमी पर उनको प्रसन्न करने का एक मात्र उपाय है और यही उनकी प्राप्ति का सर्वसुगम सर्वश्रेष्ठ साधन है.

सब अवतार मधुर गोविन्द राधे,
कृष्ण लीला मधुरातिमाधुर बता दे.

भगवान का जब सगुण साकार अवतार होता है तो अपने नाम, रूप, लीला, गुण, धाम यह वह छोड़ जाते है जिसका अवलंब लेकर अनन्तानन्त जीव भगवान के प्रेमानंद को प्राप्त होते है उदारहर्नाथ अगर श्री कृष्ण का अवतार न होता तो शुकदेव श्री कृष्ण के लिये व्याकुल न होते. भागवत को सुना और परीक्षित को सुनाया. बिना सगुण साकार अवतार लिये भगवान के सगुण नाम, रूप, लीला, धाम का विस्तार हमको न मिलता. और बिना इसके प्राप्त हुये घोर मायाबध जीव किस प्रकार भगवत्प्राप्ति करते इसलिये जीव कल्याण के लिये ही भगवान का अवतार होता है.

ॐविष्णुíवष्णुíवष्णु:अद्य
शर्वरीनामसंवत्सरेसूर्येदक्षिणायनेवर्षतरैभाद्रपदमासेकृष्णपक्षेश्रीकृष्णजन्माष्टम्यांतिथौभौमवासरेअमुकनामाहं(अमुक
की जगह अपना नाम बोलें) मम चतुर्वर्गसिद्धिद्वारा
श्रीकृष्णदेवप्रीतयेजन्माष्टमीव्रताङ्गत्वेनश्रीकृष्णदेवस्ययथामिलितोपचारै:पूजनंकरिष्ये।

RADHEY RADHEY

JAI TULSI MAA

शालग्राम शिला भगवान विष्णु का साक्षात स्वरूप मानी जाती है। इसलिए जहां शालग्राम शिला होती है, वह स्थान तीर्थ के समान पुण्यदायी माना गया है। यही नहीं शालग्राम शिला और भगवती स्वरूपा तुलसी का योग तो सारे अभाव, कलह और संताप का अंत करने वाला माना गया है।

यही वजह है कि हिन्दू पंचांग की हर एकादशी पर शालग्राम-तुलसी उपासना ज्ञान, धन, स्वास्थ्य, विद्या, प्रतिष्ठा, यश सहित किसी भी अभाव का अंत करने वाली मानी गई है।

जीवन में ऐसे ही मंगल के लिए शास्त्रों में ऐसे भी छोटे-छोटे उपाय बताए गए हैं, जिनसे शालग्राम व तुलसी उपासना एक ही साथ हो जाती है। इनमें ही एक उपाय है शालग्राम शिला को स्नान कराकर तुलसी दल विशेष मंत्र से अर्पित करना और चरणामृत ग्रहण करना। जानिए यह विशेष मंत्र-

- शालग्राम शिला को पवित्र स्थान या पात्र में रखकर पवित्र जल से स्नान या अभिषेक कराकर साफ वस्त्र से पोंछकर नियत स्थान पर विराजित करें। केसरिया चंदन, सुगंधित फूल चढ़ाकर पूजा करें, मिठाई का भोग लगाकर नीचे लिखे तुलसी मंत्र से तुलसी दल शालग्राम को अर्पित करें -

तुलसी हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम्।

भवमोक्षप्रदां तुभ्यमर्पयामि हरिप्रियाम्।।

- तुलसी दल चढ़ाने के बाद शालग्राम या विष्णु भगवान की धूप, दीप व कर्पूर आरती कर खुशहाल जीवन की कामना करें।

♥♥♥ जय जय श्री कृष्ण ♥♥♥

मोहन से दिल क्यूँ लगाया है, यह मैं जानू या वो जाने ।
छलिया से दिल क्यूँ लगाया है, यह मैं जानू या वो जाने ॥

हर बात निराली है उसकी, कर बात में है इक टेडापन ।
टेड़े पर दिल क्यूँ आया है, यह मैं जानू या वो जाने ॥

जितना दिल ने तुझे याद किया, उतना जग ने बदनाम किया ।
बदनामी का फल क्या पाया हैं, यह मैं जानू या वो जाने ॥

तेरे दिल ने दिल दीवाना किया, मुझे इस जग से बेगाना किया ।
मैंने क्या खोया क्या पाया हैं, यह मैं जानू या वो जाने ॥

मिलता भी है वो मिलता भी नहीं, नजरो से मेरी हटता भी नहीं ।
यह कैसा जादू चलाया है, यह मैं जानू या वो जाने ॥

MAKHAN CHOR

भगवान की माखनचोरी का रहस्य :
जब भगवान श्रीकृष्ण छोटे थे, तो सभी गोपियों का हृदय उन्हे लाड लडाने के लिये आतुर रहता था. उनका मन करता कि गोपाल को माखन खिलायें. एक दो बार तो वो नन्दभवन मे जा के कन्हैया को माखन खिला आयीं, पर रोज - रोज जाना शायद नन्दरानी को अच्छा न लगे. उनके यहाँ तो लाखों गायें हैं, और दधि और माखन तो उनके घर मे भरा ही रहता है. तो नन्दरानी यह भी कह सकती हैं, कि बहन माखन तो हमारे यहाँ पहल
े से ही है, तुम क्यों रोज - रोज कष्ट करती हो? ऐसा सोच कर, मन मसोस कर सब की सब अपने घरों मे ही रहीं. कन्हैया को अपने घर का माखन न खिला पाने से उनके आकुल हृदय मे बड़ी वेदना होने लगी.
भक्तवत्सल भगवान का प्रण है कि जो भी मुझे प्रेम से, चाहे फल, फूल, पत्ती या फिर जल ही अर्पित करे, तो मैं बडे प्रेम से उसे ग्रहण करता हूँ. वो जान गये कि गोप- मातायें मुझे लाड लडाने के लिये और माखन खिलाने के लिये अधीर हैं. उन्होने सोचा कि मैं कौन सा ऐसा कार्य करूँ, जिस से इन वात्सल्यमयी गोपियों को अपूर्व आनन्द मिले?
तो भगवान चोरी से उनके यहाँ जा के माखन खाने लगे.
चोरी से ही क्यों? जा के मांग के भी तो खा सकते थे?
तो उत्तर ये है, कि अपने घर मे कोई चीज अगर बहुतायत मे हो, और किसी और के घर जा के वही चीज मांगें, तो इस का अर्थ है कि दूसरे के यहाँ की चीज अपनी चीज से उत्तम है. और अगर अपने यहाँ कोई चीज बहुतायत मे होते हुए भी, अगर दूसरे के घर मे उसी चीज के लिये चोरी करें, तो इसका मतलब है कि दूसरे के यहाँ की चीज हमारी चीज से उत्तम ही नहीं, बल्कि हमारे लिये अनमोल है, हमें उस चीज की अत्यधिक चाह है, हम उस के बिना रह नहीं सकते, हमारे लिये वो चीज अमूल्य है, तभी तो हम उसे चुरा रहे हैं.
इसी लिये उन वात्सल्यप्रेममयी गोपियों के घर मे हमारे नन्दनन्दन चोरी कर के माखन खाते थे. और बिना कहे ही कहते थे, कि मैया तेरा माखन खाये बिना मुझे चैन नहीं पडता.

पुरुषोत्तम व मल मास

हिंदू पंचांग के अनुसार विक्रम संवत् 2069 में (सन् 2012) भाद्रपद नामक अधिकमास है। यह अधिक मास 18 अगस्त, शनिवार को प्रारंभ होगा जो 16  सितंबर, रविवार तक रहेगा। धर्म ग्रंथों में इसे पुरुषोत्तम व मल मास भी कहा गया है। इस महीने में भगवान विष्णु का पूजन करने का विशेष महत्व है।

ज्योतिषियों के अनुसार इस बार सूर्य की सिंह संक्रांति में ही भाद्रपद की दो अमावस्याएं व्यतीत हो जाएंगी। पहली अमावस्या के बाद दूसरी अमावस्या तक का मास श्रीपुरुषोत्तम मास होगा। इस प्रकार 2012 में दो भाद्रपद मास होंगे।

क्यों आता है अधिक मास?

32 महीने, 16 दिन, 1 घंटा 36 मिनट के अंतराल से हर तीसरे साल अधिक मास आता है। ज्योतिष में चंद्रमास 354 दिन व सौरमास 365 दिन का होता है। इस कारण हर साल 11 दिन का अंतर आता है जो 3 साल में एक माह से कुछ ज्यादा होता है। चंद्र और सौर मास के अंतर को पूरा करने के लिए धर्मशास्त्रों में अधिक मास की व्यवस्था की है।

क्या रहेगा प्रभाव?

ज्योतिषियों के अनुसार जिस वर्ष भाद्रपद का अधिक मास होता है उस वर्ष धान की उत्पत्ति बहुत अधिक होती है। फसल अच्छी होने से अर्थ व्यवस्था पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे देश के आर्थिक हालात में सुधार होता है तथा व्यापार-व्यवसाय में भी तेजी रहती है।

हिन्दू धर्म का यह महीना पुरुषोत्तम मास या अधिमास के रूप में प्रसिद्ध है। ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक यह मास 32 माह 16 दिन और चार घड़ी में फिर से आता है। यानी लगभग 3 साल में एक बार। धार्मिक दृष्टि से यह मास भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को समर्पित पुण्यदायी मास है। भगवान श्रीकृष्ण का ही एक नाम पुरुषोत्तम होने से इस मास का नाम पुरुषोत्तम मास कहलाया। करीब 3 साल में आने वाला यह विशेष काल अधिकमास भी कहलाता हैयोतिष विज्ञान के मुताबिक जिस चन्द्रमास में सूर्य की संक्रान्ति नही होती है वह मास अधिमास कहलाता है। सरल शब्दों में अगर चन्द्रमास के दोनों ही पक्षों में सूर्य किसी भी राशि में प्रवेश नहीं करता यानी संक्रमण नहीं करता है, तब वह संक्रमणरहित मास साल के माहों की गिनती में अधिक हो जाता है। इसलिए इसे अधिकमास भी पुकारा जाता है। इस बार इस बार पुरुषोत्तम मास का संयोग भाद्रपद मास से हो रहा है। अधिकमास होने पर एक ही माह को पहला और दूसरा कहकर दो बार गणना की जाती है। यह शुभ संयोग शनिवार (18 अगस्त) से शुरू हो रहा है। शास्त्रों में उल्लेख है कि भाद्रपद और अधिकमास के संयोग के पूरे साठ दिनों में से अधिमास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ कर अधिमास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक अधिमास के भगवान विष्णु व श्रीकृष्ण की भक्ति, सेवा, व्रत-उपवास व दान-पुण्य करने से अक्षय फल व सौभाग्य प्राप्त होते हैं।

♥♥ चलो देख आएं नन्द घर लाला हुआ।
यह तो नन्द जी के कुल का उजाला हुआ॥

देखो सब ग्वाल बाल, चले होके खुशिहाल,
संग बईया गल डाल, नाचे दे दे के ताल।
सब मिलझुल कहें गोप ग्वाला हुआ,
चलो देख आएं नन्द घर लाला हुआ॥

बाजे शंख घड़ेयाल, जनम लीनो गोपाल,
सखी ब्रिज में सब ग्वाल, कहें जय जय गोपाल।
झूले अंगना में पलना है डाला हुआ,
चलो देख आएं नन्द घर लाला हुआ॥

प्रगटे बृज में बृजराज, करने भक्तों के काज,
आया सारा समाज, दर्शन करने को आज।
सुख नैनो को पहुचाने वाला हुआ,
चलो देख आएं नन्द घर लाला हुआ॥

देखो गोकुल की और, कैसे नाच रहे मोर,
छाए बादल घनघोर, बोले पची करे छोर।
बर्षा आनंद की बरसाने वाला हुआ,
चलो देख आएं नन्द घर लाला हुआ॥ ♥♥

Wednesday, August 15, 2012

jai shree bankey bihari ji

श्रीबाँकेबिहारी जी के दर्शन सम्बन्ध में अनेकों कहानियाँ प्रचलित हैं। जिनमें से एक तथा दो निम्नलिखित हैं– एक बार एक भक्तिमती ने अपने पति को बहुत अनुनय–विनय के पश्चात वृन्दावन जाने के लिए राजी किया। दोनों वृन्दावन आकर श्रीबाँकेबिहारी जी के दर्शन करने लगे। कुछ दिन श्रीबिहारी जी के दर्शन करने के पश्चात उसके पति ने जब स्वगृह वापस लौटने कि चेष्टा की तो भक्तिमति ने श्रीबिहारी जी दर्शन लाभ से वंचित होना पड़ेगा, ऐसा सोचकर वो रोने लगी। संसार बंधन के लिए स्वगृह जायेंगे, इसलिए वो श्रीबिहारी जी के निकट रोते–रोते प्रार्थना करने लगी कि– 'हे प्रभु में घर जा रही हुँ, किन्तु तुम चिरकाल मेरे ही पास निवास करना, ऐसा प्रार्थना करने के पश्चात वे दोनों रेलवे स्टेशन की ओर घोड़ागाड़ी में बैठकर चल दिये। उस समय श्रीबाँकेविहारी जी एक गोप बालक का रूप धारण कर घोड़ागाड़ी के पीछे आकर उनको साथ लेकर ले जाने के लिये भक्तिमति से प्रार्थना करने लगे। इधर पुजारी ने मंदिर में ठाकुर जी को न देखकर उन्होंने भक्तिमति के प्रेमयुक्त घटना को जान लिया एवं तत्काल वे घोड़ा गाड़ी के पीछे दौड़े। गाड़ी में बालक रूपी श्रीबाँकेबिहारी जी से प्रार्थना करने लगे। दोनों में ऐसा वार्तालाप चलते समय वो बालक उनके मध्य से गायब हो गया। तब पुजारी जी मन्दिर लौटकर पुन श्रीबाँकेबिहारी जी के दर्शन करने लगे।
इधर भक्त तथा भक्तिमति श्रीबाँकेबिहारी जी की स्वयं कृपा जानकर दोनों ने संसार का गमन त्याग कर श्रीबाँकेबिहारी जी के चरणों में अपने जीवन को समर्पित कर दिया। ऐसे ही अनेकों कारण से श्रीबाँकेबिहारी जी के झलक दर्शन अर्थात झाँकी दर्शन होते हैं।

jai shree bankey bihari ji

श्री बाँकेबिहारी जी का संक्षिप्त इतिहास

श्रीधाम वृन्दावन, यह एक ऐसी पावन भूमि है, जिस भूमि पर आने मात्र से ही सभी पापों का नाश हो जाता है। ऐसा आख़िर कौन व्यक्ति होगा जो इस पवित्र भूमि पर आना नहीं चाहेगा तथा श्री बाँकेबिहारी जी के दर्शन कर अपने को कृतार्थ करना नही चाहेगा। यह मन्दिर श्री वृन्दावन धाम के एक सुन्दर इलाके में स्थित है। कहा जाता है कि इस मन्दिर का निर्माण स्वामी श्री हरिदास जी के वंशजो के सामूहिक प्रयास से संवत १९२१ के लगभग किया गया।
मन्दिर निर्माण के शुरूआत में किसी दान-दाता का धन इसमें नहीं लगाया गया। श्रीहरिदास स्वामी विषय उदासीन वैष्णव थे। उनके भजन–कीर्तन से प्रसन्न हो निधिवन से श्री बाँकेबिहारीजी प्रकट हुये थे। स्वामी हरिदास जी का जन्म संवत 1536 में भाद्रपद महिने के शुक्ल पक्ष में अष्टमी के दिन वृन्दावन के निकट राजापुर नामक गाँव में हूआ था। इनके आराध्यदेव श्याम–सलोनी सूरत बाले श्रीबाँकेबिहारी जी थे। इनके पिता का नाम गंगाधर एवं माता का नाम श्रीमती चित्रा देवी था। हरिदास जी, स्वामी आशुधीर देव जी के शिष्य थे। इन्हें देखते ही आशुधीर देवजी जान गये थे कि ये सखी ललिताजी के अवतार हैं तथा राधाष्टमी के दिन भक्ति प्रदायनी श्री राधा जी के मंगल–महोत्सव का दर्शन लाभ हेतु ही यहाँ पधारे है। हरिदासजी को रसनिधि सखी का अवतार माना गया है। ये बचपन से ही संसार से ऊबे रहते थे। किशोरावस्था में इन्होंने आशुधीर जी से युगल मन्त्र दीक्षा ली तथा यमुना समीप निकुंज में एकान्त स्थान पर जाकर ध्यान-मग्न रहने लगे। जब ये 25 वर्ष के हुए तब इन्होंने अपने गुरु जी से विरक्तावेष प्राप्त किया एवं संसार से दूर होकर निकुंज बिहारी जी के नित्य लीलाओं का चिन्तन करने में रह गये। निकुंज वन में ही स्वामी हरिदासजी को बिहारीजी की मूर्ति निकालने का स्वप्नादेश हुआ था। तब उनकी आज्ञानुसार मनोहर श्यामवर्ण छवि वाले श्रीविग्रह को धरा को गोद से बाहर निकाला गया। यही सुन्दर मूर्ति जग में श्रीबाँकेबिहारी जी के नाम से विख्यात हुई यह मूर्ति मार्गशीर्ष, शुक्ला के पंचमी तिथि को निकाला गया था। अतः प्राकट्य तिथि को हम विहार पंचमी के रूप में बड़े ही उल्लास के साथ मानते है।
श्री बाँकेबिहारी जी निधिवन में ही बहुत समय तक स्वामी जी द्वारा सेवित होते रहे थे। फिर जब मन्दिर का निर्माण कार्य सम्पन्न हो गया, तब उनको वहाँ लाकर स्थापित कर दिया गया। सनाढय वंश परम्परागत श्रीकृष्ण यति जी, बिहारी जी के भोग एवं अन्य सेवा व्यवस्था सम्भाले रहे। फिर इन्होंने संवत 1975 में हरगुलाल सेठ जी को श्रीबिहारी जी की सेवा व्यवस्था सम्भालने हेतु नियुक्त किया। तब इस सेठ ने वेरी, कोलकत्ता, रोहतक, इत्यादि स्थानों पर श्रीबाँकेबिहारी ट्रस्टों की स्थापना की। इसके अलावा अन्य भक्तों का सहयोग भी इसमें काफी सहायता प्रदान कर रहा है। आनन्द का विषय है कि जब काला पहाड़ के उत्पात की आशंका से अनेकों विग्रह स्थानान्तरित हुए। परन्तु श्रीबाँकेविहारी जी यहां से स्थानान्तरित नहीं हुए। आज भी उनकी यहां प्रेम सहित पूजा चल रही हैं। कालान्तर में स्वामी हरिदास जी के उपासना पद्धति में परिवर्तन लाकर एक नये सम्प्रदाय, निम्बार्क संप्रदाय से स्वतंत्र होकर सखीभाव संप्रदाय बना। इसी पद्धति अनुसार वृन्दावन के सभी मन्दिरों में सेवा एवं महोत्सव आदि मनाये जाते हैं। श्रीबाँकेबिहारी जी मन्दिर में केवल शरद पूर्णिमा के दिन श्री श्रीबाँकेबिहारी जी वंशीधारण करते हैं। केवल श्रावन तीज के दिन ही ठाकुर जी झूले पर बैठते हैं एवं जन्माष्टमी के दिन ही केवल उनकी मंगला–आरती होती हैं । जिसके दर्शन सौभाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त होते हैं । और चरण दर्शन केवल अक्षय तृतीया के दिन ही होता है । इन चरण-कमलों का जो दर्शन करता है उसका तो बेड़ा ही पार लग जाता है। स्वामी हरिदास जी संगीत के प्रसिद्ध गायक एवं तानसेन के गुरु थे। एक दिन प्रातःकाल स्वामी जी देखने लगे कि उनके बिस्तर पर कोई रजाई ओढ़कर सो रहा हैं। यह देखकर स्वामी जी बोले– अरे मेरे बिस्तर पर कौन सो रहा हैं। वहाँ श्रीबिहारी जी स्वयं सो रहे थे। शब्द सुनते ही बिहारी जी निकल भागे। किन्तु वे अपने चुड़ा एवं वंशी, को विस्तर पर रखकर चले गये। स्वामी जी, वृद्ध अवस्था में दृष्टि जीर्ण होने के कारण उनकों कुछ नजर नहीं आय । इसके पश्चात श्री बाँकेबिहारीजी मन्दिर के पुजारी ने जब मन्दिर के कपाट खोले तो उन्हें श्री बाँकेविहारीजी मन्दिर के पुजारी ने जब मन्दिर में कपट खोले तो उन्हें श्रीबाँकेबिहारी जी के पलने में चुड़ा एवं वंशी नजर नहीं आयी। किन्तु मन्दिर का दरवाजा बन्द था। आश्चर्यचकित होकर पुजारी जी निधिवन में स्वामी जी के पास आये एवं स्वामी जी को सभी बातें बतायी। स्वामी जी बोले कि प्रातःकाल कोई मेरे पंलग पर सोया हुआ था। वो जाते वक्त कुछ छोड़ गया हैं। तब पुजारी जी ने प्रत्यक्ष देखा कि पंलग पर श्रीबाँकेबिहारी जी की चुड़ा–वंशी विराजमान हैं। इससे प्रमाणित होता है कि श्रीबाँकेबिहारी जी रात को रास करने के लिए निधिवन जाते हैं।
इसी कारण से प्रातः श्रीबिहारी जी की मंगला–आरती नहीं होती हैं। कारण–रात्रि में रास करके यहां बिहारी जी आते है। अतः प्रातः शयन में बाधा डालकर उनकी आरती करना अपराध हैं। स्वामी हरिदास जी के दर्शन प्राप्त करने के लिए अनेकों सम्राट यहाँ आते थे। एक बार दिल्ली के सम्राट अकबर, स्वामी जी के दर्शन हेतु यहाँ आये थे। ठाकुर जी के दर्शन प्रातः 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक एवं सायं 6 बजे से रात्रि 6 बजे तक होते हैं। विशेष तिथि उपलक्ष्यानुसार समय के परिवर्तन कर दिया जाता हैं।