Friday, July 19, 2013
हिंदू धर्म में चातुर्मास (देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक का समय) का विशेष महत्व है। चातुर्मास में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते और धार्मिक कार्यों पर अधिक ध्यान दिया जाता है। चातुर्मास के अंतर्गत सावन, भादौ, अश्विन व कार्तिक मास आता है। इस बार चातुर्मास का प्रारंभ 19 जुलाई, शुक्रवार से हो रहा है।
देवशयनी एकादशी शुक्रवार से अगले 117 दिन तक देव सोएंगे। देवताओं के शयन काल में मुहूर्त नहीं निकलने से शादी-ब्याह या कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होंगे। चातुर्मास में लोग मंदिरों-आश्रमों में कथा श्रवण एवं भगवान के भजन-कीर्तन करेंगे।
साधु-संत भी विहार बंद कर प्रवचनों की रसवर्षा करेंगे।
लग्न व मांगलिक कार्य हेतु शुभ मुहूर्त के लिए लोगों को देव उठनी एकादशी 13 नवंबर को देवताओं के जागने तक चार महीने लंबा इंतजार करना पड़ेगा।
इसलिए शादी नहीं
चातुर्मास के चार मास में कर्क, सिंह, कन्या और तुला संक्रांति काल में मुहूर्त नहीं निकलते हैं, इसलिए विवाह आदि वर्जित है।
चातुर्मास में ये करें
चिंतन-मनन, भजन-कीर्तन, निष्काम हवन-पूजन, दान-पुण्य, व्रत, कथा श्रवण।
ये बिल्कुल न करें
विवाह, शुभ कार्य, उपनयन संस्कार, सकाम पूजा-अनुष्ठान, उत्तर दिशा में यात्रा।
जानें क्या है चातुर्मास
इसे चातुर्य मास भी कहते हैं अर्थात चतुराई से व्यवहार करने के मास।
आरंभ गुरु पूर्णिमा (इस बार 22 जुलाई) पर गुरु के सान्निध्य से।
प्रथम श्रावण
श्रावण यानि श्रवण (सुनने) का समय, प्रभु के भजन-कीर्तन कर कथा श्रवण करें।
द्वितीय भाद्र
भाद्र यानि श्रेष्ठ और पद यानि पैर। श्रेष्ठ कार्य के लिए कदम बढ़ाएं।
तृतीय आश्विन
ये संयम का मास है। पितृ-देवी अर्चन कर संयमित जीवन का संकल्प लें।
चौथा कार्तिक
कार्तिक में क क्रिया को दर्शाता है। इसमें क्रिया को प्रसारित कर आगे बढ़ें, तभी लक्ष्मी प्राप्ति संभव है।
9 का योग शुभता का सूचक
देव शयनी 19 जुलाई से देव उठनी एकादशी तक कुल 117 दिन देव सोकर जागेंगे। 117 का जोड़ 9 है। अंक ज्योतिष में 9 शुभता का सूचक है, जो 9 ग्रहों से मिलकर अच्छे योग बनाएगा।
Tuesday, July 9, 2013
हिन्दू धर्म में ईश्वर की निकटता और आध्यात्मिक आनंद पाने के लिए कई धार्मिक विधान और परंपराएं प्राचीन काल से चली आ रही है। इनके पालन से जीवन में अनुशासन, नियम और संयम बना रहता है और साथ ही धार्मिक गतिविधियों के द्वारा आपसी मेल-मिलाप बढ़ता है। मानव की एक-दूसरे के प्रति भावनाओं और संवेदनाओं को बल मिलता है, साथ-साथ इंसान धर्म और मानवीय भावों से भी जुड़ा रहता है।
हिन्दू धर्म के चार प्रमुख धामों में एक पुरी स्थित जगन्नाथ धाम की वार्षिक रथयात्रा ऐसी ही धार्मिक परंपराओं में शामिल है। इस रथयात्रा में हर साल तीन विशाल और सुंदर रथों पर भगवान जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा नगर यात्रा पर निकलते हैं।
रथयात्रा में शामिल काष्ठ यानी लकड़ी से बने तीन रथों की विशालता, ऊंचाई, सजावट और सुंदरता के साथ भक्ति संगीत में डूबे देश-विदेश से आए भक्तों को देखकर हर धर्मावलंबी अध्यात्म की गहराई में डूब जाता है। संभवत: कई श्रद्धालु इस रोचक बात को नहीं जानते हैं कि यह तीन रथ हर साल नए बनाए जाते हैं और रथयात्रा के बाद रथों को विधि-विधान से तोड़ दिया जाता है। किंतु इन रथों को बनाने और तोड़ने की भी विधिवत और मर्यादित पंरपरा है। स्लाइड्स के जरिए जानिए हैं इन विशाल रथों को बनाने के तरीकों से जुड़ी दिलचस्प बातें व रथयात्रा के बाद रथों से जुड़ीं परंपरा क्या है, जो कई लोग नहीं जानते -
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के लिए प्रतिवर्ष वैशाख मास की शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया या आखा तीज के पुण्य दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों का निर्माण शुरु होता है, जो लगभग दो माह में बनकर तैयार हो जाते हैं। हर रथ निर्धारित आकार का बनाया जाता है। इनको बनाने में मंदिर की प्राचीन परंपराओं में नियत निर्देशों का कठोरता से पालन किया जाता है। इन रथों के निर्माण करने वाले बढ़ई यानि कारपेंटर अनुवांशिक अधिकार से यह कार्य करते आ रहें हैं। इन रथों के निर्माण से जुड़ी ओर भी रोचक बाते हैं -
इन रथों को बनाने वाले काष्ठ शिल्पी और कारीगर रथों के निर्माण के समय लकड़ी के टुकड़ों को नापने के लिए किसी इंच टेप या स्केल का उपयोग न कर हाथ और अंगुलियों से नापकर ही विशाल रथ बना देते हैं। यह सुंदर देशी काष्ठ शिल्प और नक्काशी का अद्भुत नमूना होता है।
रथ का निर्माण साल की लकड़ी से होता है। इसमें लगभग 2000 लकड़ी के टुकड़े उपयोग किए जाते हैं,जिन्हें समीप के दशपल्ला और रनापुर के वनों से लाया जाता है।
रथों को बनाने के इस पुण्य कार्य मे सवा सौ कारपेंटर लगते हैं। चूंकि इस कार्य में लकड़ी का उपयोग होता है, जो पेड़ों से ही मिलती है। इसलिए इस लकड़ी की जरूरत को पूरा करने के लिए हजारों की संख्या में नए पौधों को लगाया जाता है।
तीन रथों में हर रथ में 9 उपदेवता, दो द्वारपाल और एक सारथी भी विराजित होते हैं। इनका निर्माण भी लकड़ी से होता है। हर रथ में 18 खंबे और सीढ़ियां भी बनाई जाती है। इस रथ में लगने वाली लोहे की सामग्री का कार्य स्थानीय लुहारों द्वारा किया जाता है।
आषाढ़ शुक्ल दशमी को रथयात्रा संपन्न होने के बाद लकड़ी के इन तीन रथों को तोड़ दिया जाता है। इन तीन रथों को तोड़ने से निकली लकड़ियों को महाप्रसाद बनाने के लिए देवस्थान की रसोई में जलाने के लिए उपयोग किया जाता है या फिर भक्त इनको भगवान के आशीर्वाद के रूप में खरीद लेते हैं।
Saturday, July 6, 2013
jhjfg
ज़िंदगी में कर्म यानी काम ही खुशियां और कामयाबी पाने का सबसे बेहतर उपाय है। किंतु ऐसा काम ही वास्तविक और लंबा सुख देता है, जो निस्वार्थ भावना से किया जाए, क्योंकि ऐसा करने से अपेक्षा और आसक्ति न होने से मन में कलह पैदा नहीं होता।
सुख और सफल जीवन में कर्म की इसी अहमियत को भगवान श्रीकृष्ण ने पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवदगीता में कर्मयोग के सिद्धांत के जरिए उजागर किया। असल में, यह ऐसा महामंत्र है, जिससे हर इंसान दु:ख और परेशानियों से दूर रहकर जिंदगी को कामयाब बना सकता है।
अक्सर धर्म और अध्यात्म से दूर इंसान जीवन में कई मौकों पर सुख व आनंद पाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण की कई लीलाओं को सामने रख स्वार्थ पूरे करने से नहीं चूकता, किंतु सफलता के सूत्र कर्मयोग सिद्धांत की गहराई को समझने से दूर भागता है।
असल में, सांसारिक जीवन के नजरिए से युद्ध की तरह संघर्ष से भरे जीवन में हर इंसान के सामने ऐसी बुरी स्थितियां भी आती है, जब मानसिक दशा अर्जुन की तरह हो जाती है। इंसान कई मौकों पर हथियार डाल कर्म से परे भी हो जाता है।
ऐसी ही स्थिति में कर्मयोग औषधि का काम कर ऊर्जावान बनाता है। यह सिखाता है कि कर्म करो और फल की आसक्ति को छोड़ो। किंतु इस संबंध में तीन अलग-अलग स्वभाव के इंसान जिनको रज, तम और सत गुणी माना जाता है तीन तर्क देते हैं -
तमोगुणी का विचार होता है जब फल या नतीजे छोडऩा ही है तो कर्म क्यों करें?
- रजोगुणी सोचता है काम कर उससे मिलने वाले फल का लाभ व हक मेरा हो।
- जबकि सतोगुणी सोचता है कि काम करें किंतु फल या नतीजों पर अपना अधिकार न समझें।
इन तीन विचारों में सत्वगुणी का नजरिया ही कर्म योग माना जाता है। क्योंकि ऐसे इंसान की सोच होती है कि वह ऐसा काम करें, जिसमें स्वार्थ पूर्ति या उनके नतीजों के लाभ पाने की आसक्ति या भाव न हो। यही नहीं इसी सोच में तमोगुणी के काम से बचने और रजोगुणी के फल पर अधिकार की सोच दूर रहती है। यही स्थिति निष्काम कर्म के लिये प्रेरित करती है, जिससे इंसान हर स्थिति में सुख और सफलता प्राप्त करता चला जाता है।
Sunday, June 23, 2013
शास्त्रों में कृष्ण भक्ति आनंद, सुख और सौभाग्य लाने वाली मानी गई है। श्रीकृष्ण की हर लीला भी कलह नाशक ही नहीं, बल्कि हर इंसान को अपनी गुण और शक्तियों को पहचान उनसे सफलता पाने का संदेश देती हैं। श्रीकृष्ण द्वारा बताया गया कर्मयोग भी कलह और दु:खों से मुक्त रहने का सबसे श्रेष्ठ और बेजोड़ सूत्र है।
इस तरह श्रीकृष्ण चरित्र कर्म से सफलता की प्रेरणा देता है। यही नहीं, श्रीमद्भगदगीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा है कि स्वाभाविक कर्तव्यों को पूरा करते चले जाना भी देव पूजा की तरह है।
श्रीकृष्ण को इष्ट मानने वाले उन कामकाजी लोगों के लिए ही, जो विशेष त्योहार व उत्सवों पर घर से दूर होते हैं या इष्ट की पूजा का बेहद कम वक्त निकाल पाते हैं, यहां बताए जा रहे हैं भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण पूजा के सरल उपाय, खासतौर पर विष्णु भक्ति की शुभ घड़ी पूर्णिमा या हर रोज भी भक्ति और आस्था से अपनाएं तो हर परेशानी से छुटकारा मिलता है, साथ ही तरक्की भी।
सुबह पूजा के पहले स्नान करें। भगवान श्रीकृष्ण बालकृष्ण की मृर्ति को गंगाजल और पंचामृत (गाय का दूध, दही, घी, शहद व शक्कर) स्नान कराएं।
स्नान सामग्री जुटाना संभव न हो तो या तस्वीर पर ही कुंकुम, सुगंधित फूल या हार चढ़ाएं, अक्षत, पीले वस्त्र चढ़ाएं।
तुलसी के पत्ते यह मंत्र बोलते हुए चढ़ाएं-
तुलसी हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम्।
भवमोक्षप्रदातुभ्यं गृहाण परमेश्वर।।
श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएं। फल चढ़ाएं। मिठाई (शक्कर भी) नैवेद्य के रूप में चढ़ा सकते हैं।
सुगंधित धूप और दीप प्रज्जवलित कर नीचे लिखे कृष्ण मंत्रों का आस्था से कलहनाश की कामना से स्मरण करें -
- ऊँ नमो भगवते गोविन्दाय
- ऊँ नमो भगवते नन्दपुत्राय
- ऊँ कृष्णाय गोविन्दाय नमो नम:
मंत्र ध्यान के बाद भगवान कृष्ण या विष्णु की आरती करें। प्रसाद बांटे और ग्रहण करें। पूजा, आरती में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
Sunday, June 2, 2013
एक बार राधा कहे प्राणी पावन होत
हरी पधारे तासु मन और जगे प्रेम की ज्योत
जगे प्रेम की ज्योत सांवरो हिये बिराजे
मोर मुकुट और बांसुरी पीताम्बर साजे
श्री वृन्दावन वास मिले हो प्रेम अगाधा
... तेरो हो जीवन कल्याण कहे इक बार जो राधा
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा
श्री राधा जय राधा राधा राधा राधा राधा राधा
Thursday, May 30, 2013
हो तो तुम पास ही मेरे ओह मेरे श्याम
पर नजाने क्यों दर्शन ना देते हो श्याम
तेरी ही मूरत मन में बसी हैं घनशयाम
बसी हैं बन्सीवाले की बाँकी अदा
जिसने सारे जग को दीवाना हैं किया
मोर मुकुट लगाये घूमते हो हिये में हमारे
बंसी बजाके हिये को चुरा के
अब चित चोर तुम जाते हो कहा
आँखों का पर्दा तो हटा दो... HARE KRISHNA...
बंसी बजाके हिये को चुरा के
अब चित चोर तुम जाते हो कहा
आँखों का पर्दा तो हटा दो... HARE KRISHNA...
Wednesday, May 22, 2013
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नृसिंह जयंती का
पर्व मनाया जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने
नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस बार यह
पर्व कल यानी 23 मई, गुरुवार को है। इस दिन भगवान नृसिंह के निमित्त व्रत
रखा जाता है। इस व्रत की विधि इस प्रकार है-
नृसिंह जयंती के दिन सुबह जल्दी नित्य कर्मों से निवृत्त होकर व्रत के
लिए संकल्प करें। इसके बाद दोपहर में नदी, तालाब या घर पर ही वैदिक
मंत्रों के साथ मिट्टी, गोबर, आंवले का फल और तिल लेकर उनसे सब पापों की
शांति के लिए विधिपूर्वक स्नान करें। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर संध्या
तर्पण करें। अब पूजा स्थल को गाय के गोबर से लीपकर उसमें अष्टदल कमल
बनाएं।
कमल के ऊपर पंचरत्न सहित तांबे का कलश स्थापित करें। कलश के ऊपर
चावलों से भरा हुआ बर्तन रखें और बर्तन में अपनी शक्ति के अनुसार सोने की
लक्ष्मीसहित भगवान नृसिंह की प्रतिमा रखें। इसके बाद दोनों मुर्तियों को
पंचामृत से स्नान करवाएं। योग्य विद्वान ब्राह्मण (आचार्य) को बुलाकर उनसे
भगवान की पूजा करवाएं। फिर उस ब्राह्मण के हाथों फूल व षोडशोपचार
सामग्रियों से विधिपूर्वक भगवान नृसिंह का पूजन करवाएं।
भगवान नृसिंह को चंदन, कपूर, रोली व तुलसीदल भेंट करें तथा धूप-दीप
दिखाएं। इसके बाद घंटी बजाकर आरती उतारें और नीचे लिखे मंत्र के साथ भोग
लगाएं-
नैवेद्यं शर्करां चापि भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्।
ददामि ते रमाकांत सर्वपापक्षयं कुरु।।
(पद्मपुराण, उत्तरखंड 170/62)
अब भगवान नृसिंह से सुख की कामना करें। रात में जागरण करें तथा भगवान नृसिंह की कथा सुनें।
दूसरे दिन यानी पूर्णिमा के दिन स्नान करने के बाद फिर से भगवान
नृसिंह की पूजा करें। ब्राह्मणों को दान दें उन्हें भोजन करवाएं व दक्षिणा
भी दें। इसके बाद पुन: भगवान नृसिंह से मोक्ष की प्रार्थना करें। अंत में
आचार्य (पूजन करने वाला ब्राह्मण) को दक्षिणा से संतुष्ट करके विदा करें
तत्पश्चात स्वयं भोजन करें।
धर्म ग्रंथों के अनुसार जो इस प्रकार नृसिंह चतुर्दशी के पर्व पर
भगवान नृसिंह की पूजा करता है उसके मन की हर कामना पूरी हो जाती है। उसे
मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।
व्यक्ति या व्यवस्था में पैदा हुई दु:खदायी बुराइयों और
दोषों का अंत करने के लिए निर्भय होकर ऐसी असाधारण कोशिशों और विचारों की
जरूरत होती हैं, जो पवित्र और परोपकार की भावना से भरे हों, जिनको सही वक्त
और मौके को चुनने और भुनाने से सफल व संभव बनाया जा सकता है। किंतु इस
दौरान पैदा संघर्ष और कठिनाइयों से जूझने का मजबूत जज्बा भी सफलता के लिए
सबसे अहम होता है।
ऐसे ही जीवन सूत्रों से भरा है भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार का
प्रसंग, जिसका शुभ काल वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को माना जाता है। पढ़ें और
भगवान नृसिंह की उग्रता से सीख लें कि कैसे बुराई पर चढ़ाई कर जीवन में
सुखद बदलाव लाएं-
जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर राक्षस हिरण्याक्ष का संहार किया,
तो उसका भाई हिरण्यकशिपु उनका शत्रु बन गया। उसने घोर तप से ब्रह्मदेव से
अमर होने का यह वरदान पाया कि वह न दिन में, न रात में, न मनुष्य से, न पशु
से, न शस्त्र से न अस्त्र से, न घर में न बाहर, न जमीन पर न आसमान में और न
भगवान विष्णु के हाथों मृत्यु को प्राप्त होगा।
अमरत्व के वरदान से अहंकार में चूर हिरण्यकशिपु ने इंद्र समेत सभी
देवताओं पर हमला बोला। पूरी प्रजा को मात्र उसकी भक्ति और पूजा करने के लिए
सताया। किंतु स्वयं हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रहलाद ही भगवान विष्णु का परम
भक्त था।
हिरण्यकशिपु ने उसको भी विष्णु भक्ति से रोकने के लिए अपनी बहन होलिका
की गोद में बैठाकर जलाने, हाथी के पैर से कुचलने, पहाड़ से फेंककर मारने,
तेल के कड़ाव में बैठाने जैसे यातनाएं दी। किंतु विष्णु भक्ति पर अडिग
प्रहलाद विष्णु कृपा से बचा गया।
विष्णु भक्ति का ऐसा असर देख हिरण्युकशिपु ने आपा खो दिया। तब अंत में
जब उसने प्रहलाद को एक गर्म लोहे के खंबे पर बांधने का आदेश दिया। तब
भगवान विष्णु ने भक्त प्रहलाद के प्राणों की रक्षा, भक्ति का मान रखने और
हिरण्यकशिपु की यातना से जगत को छुटकारा देने के लिए वही खंबा फाड़कर आधे
नर व आधे सिंह के उग्र रूप नृसिंह अवतार में प्रकट हो दुष्ट हिरण्यकशिपु का
पेट अपने नाखूनों से चीरकर उसका अंत कर दिया।
हिरण्यकशिपु के वध के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार के लिए ऐसा
समय, रूप और तरीका चुना, जो हिरण्युकशिपु के वरदान की सारी बातों की काट
करता हो। भगवान नृसिंह अवतार, जो आधा मानव और आधा सिंह का रूप था, लेकर
गोधूलि बेला में प्रकट हुए। उन्होंने हिरण्यकशिपु को दरवाजे की दहलीज पर
बैठकर उसे अपनी जंघा पर रखा और अपने नाखूनों से चीर संहार किया।
इस प्रकार जब हिरण्यकशिपु का अंत हुआ तब वह घर में था, न घर के बाहर, न
जमीन पर था, न आसमान पर, वह न अस्त्र से मरा न शस्त्र से, न दिन में मरा, न
रात में। इन सबसें रोचक एक ओर बात है कि भगवान विष्णु ने हिरण्यकशिपु के
लिए उस काल को चुना जो बारह मासों से अलग था, वह था भगवान विष्णु का प्रिय
मास पुरुषोत्तम मास, जो हिरण्युकशिप जैसे दुष्ट के विचारों से भी बाहर था।
वहीं जगत को संदेश दिया कि अपनी या दूसरों की बुराइयों और दुर्गुणों
का अंत करने के लिए नामुमकिन कोशिशें जरूरी है, चाहे परिस्थितियां कितनी ही
विषम हो। साथ ही धर्म और सदाचरण के प्रतीक भक्त प्रहलाद की भक्ति यह संदेश
देती है कि भक्ति को कर्म की तरह नहीं, बल्कि कर्म को भक्ति का रूप देकर
उसमें लीन होने पर ही देव रूपी सफलता जरूर मिलती है।
Tuesday, May 21, 2013
हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवतगीता में श्रीकृष्ण के भक्तों पर स्नेह लुटाने वाले देव स्वरूप यानी भक्त वत्सलता की महिमा बताई गई है, जो यह साबित करती है कि भगवान श्रीकृष्ण भक्ति भाव के भूखे हैं, न कि बिना भक्ति भाव के दिखावे के लिए चढ़ाए तरह-तरह की सुंदर और महंगी चीजों के। गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि -
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपह्रतमश्रामि प्रयतात्मन:।।
जिसका सरल शब्दों में मतलब है मेरे लिए निस्वार्थ और प्रेम भाव से चढ़ाए गए फूल, फल और जल आदि को मैं बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लेता हूं।
ऐसे ही भक्तप्रेमी भगवान के स्मरण के लिए शास्त्रों में एक ऐसा मंत्र बताया गया है, जिसका स्मरण भगवान विष्णु व कृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन कराने वाला माना गया हैं।
इस मंत्र के स्मरण से पहले स्नान से पवित्र होकर श्रीकृष्ण को मात्र गंध, फूल चढ़ाकर माखन का भोग लगाएं और नीचे लिखा मंत्र जप कर धूप, दीप से आरती करें। एकादशी पर इस मंत्र जप से कृष्ण पूजा और आरती अपार सुख-संपत्ति, ऐश्वर्य और वैभव देने वाली होती है। जानिए यह मंत्र -
ऊँ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।
शास्त्रों के मुताबिक इस मंत्र के पहले पद क्लीं से पृथ्वी, दूसरे पद कृष्णाय से जल, तीसरे पद गोविन्दाय से अग्रि, चौथे पद गोपीजनवल्लभाय से वायु और पांचवे पद स्वाहा से आकाश की रचना हुई। इस तरह यह श्रीकृष्ण के विराटस्वरूप का मंत्र रूप में स्मरण है।
Wednesday, May 8, 2013
इच्छाओं और जरूरतों को पूरा करने की आपाधापी में आज की व्यस्त दिनचर्या और तेज जीवनशैली अनचाहे तनाव व दबाव की वजह बनती है। हर व्यक्ति मानसिक बेचैनी में डूबा होता है, किंतु सतही तौर पर वह सामान्य दिखाई देता है। कभी-कभी व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है कि वह गुस्से या हिंसा के रूप में बाहर निकलती है, लेकिन बात में पछतावा देती है।
हिन्दू धर्मशास्त्र श्रीमद्भगवदगीता के श्लोक में मन के संयम से सुख-सुकून पाने के लिए ही एक छोटे से उपाय की बड़ी अहमियत बताई गई है।
श्रीमद्भगवदगीता में ऐसे ही मानसिक असंतुलन से बचने का बेहतर उपाय बताया गया है- ध्यान। सरल शब्दों में ध्यान का मतलब होता है कि मन को साधना यानी मन को चिंताओं, बेचैनी और बुरे विचारों से हटाकर सकारात्मक सोच पर केन्द्रित या एकाग्र करना। विचारों की गति पर नियंत्रण और संयम से दिल-दिमाग को सुकून पहुंचाने का अभ्यास भी ध्यान है।
जिसमें लिखा गया है -
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
इसमें व्यावहारिक जीवन के लिए संकेत यही है कि मन को काबू करने से ही सभी इन्द्रियां भी नियंत्रित हो जाती है, जिससे बुद्धि और विवेक को भी सही दिशा मिलती है। इस तरह मन पर वश होने पर दुनिया भी वश में हो सकती है। ऐसा करने के लिए ध्यान ही श्रेष्ठ उपाय है।
इस तरह अध्यात्मिक और धार्मिक नजरिए से ध्यान से आत्मिक लाभ मिलता है यानी यह सोई हुई शक्तियों को जगाता है और ईश्वरीय सत्ता को महसूस कराता है।
वहीं, व्यावहारिक जीवन के नजरिए से ध्यान मन की प्रसन्नता, एकाग्रता, मानसिक ऊर्जा और स्फूर्ति देता है। इसका फायदा यह होता है कि हम बेहतर तरीके से काम को अंजाम देते हैं। जिसके कामयाबी के रूप में सुखद नतीजे मिलते हैं। कामयाबी हर भौतिक सुख की राह आसान बनाती है।
Sunday, April 28, 2013
धर्म के नजरिए से माता-पिता की भावनाएं संतान के लिए गहरी और
नि:स्वार्थ होती है। हालांकि आज के दौर में कई अवसरों पर माता-पिता और
संतान के बीच अपेक्षा या महत्वाकांक्षा के चलते रिश्तों में तनाव व मनमुटाव
भी देखा जाता है। लेकिन सच यही है कि माता-पिता और संतान के बीच रिश्तों
का अटूट बंधन होता है।
यही वजह है कि हर माता-पिता भी पुत्र हो या पुत्री दोनों के सुख,
सुविधा और तरक्की की चाहत रखते हैं। इसके लिए वह जीवन भर हरसंभव कोशिश करते
हैं, लेकिन अगर इस संबंध में धार्मिक उपायों की बात करें तो शास्त्रों में
कुछ ऐसे सरल मंत्र बताए गए हैं, जिनका नियमित रूप से कुछ देर के लिए ध्यान
संतान को तन, मन और धन सभी परेशानियों से बचाता है। खासतौर पर वर्तमान में
चल रहे विष्णु भक्ति के काल वैशाख माह (25 मई तक) में।
यह मंत्र भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान है, जिनका चरित्र माता-पिता और
संतान के रिश्तों के लिए भी आदर्श है। साथ ही वह हर संकट से रक्षा करने
वाले देवता के रूप में पूजनीय है। जानिए यह सरल मंत्र -
- बालकृष्ण की गंध, अक्षत, फूल अर्पित कर पूजा करें और खासतौर पर मक्खन का भोग लगाएं। पूजा के बाद इस मंत्र का जप करें -
श्री कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणत: क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नम:।।
Friday, April 26, 2013
भगवान श्रीकृष्ण ‘लीलाधर’ पुकारे जाते हैं। श्रीकृष्ण ने हर लीला के जरिए अधर्म को सहन करने की आदत से सभी के दबे व सोए आत्मविश्वास और पराक्रम को जगाया। भगवान होकर भी श्रीकृष्ण का सांसारिक जीव के रूप में लीलाएं करने के पीछे मकसद उन आदर्शों को स्थापित करना ही था, जिनको साधारण इंसान देख, समझ व अपनाकर खुद की शक्तियों को पहचाने और ज़िंदगी को सही दिशा व सोच के साथ सफल बनाए।
इसी कड़ी में श्रीकृष्ण का सांसारिक धर्म का पालन कर, गुरुकुल जाना, वहां अद्भुत 64 कलाओं व विद्याओं को सीखने के पीछे भी असल में, गुरुसेवा व ज्ञान की अहमियत दुनिया के सामने उजागर करने की ही एक लीला थी। यह इस बात से भी जाहिर होता है कि साक्षात जगतपालक के अवतार होने से श्रीकृष्ण स्वयं ही सारे गुण, ज्ञान व शक्तियों के स्त्रोत थे। इस बात को भागवतपुराण में कुछ इस तरह उजागर भी किया गया है –
प्रभवौ सर्वविद्यानां सर्वज्ञौ जगदीश्वरौ।
नान्यसिद्धामलज्ञानं गूहमानौ नरेहितैः।।
यानी श्रीकृष्ण और बलराम ही जगत के स्वामी हैं। सारी विद्याएं व ज्ञान उनसे ही निकला है और स्वयंसिद्ध है। फिर भी उन दोनों ने मनुष्य की तरह बने रहकर उन्हें छुपाए रखा।
दरअसल, किताबी ज्ञान से कोई भी व्यक्ति भरपूर पैसा और मान-सम्मान तो बटोर सकता है, किंतु मन की शांति भी मिल जाए, यह जरूरी नहीं। शांति के लिए अहम है – सेवा। क्योंकि खुद की कोशिशों से बटोरा ज्ञान अहंकार पैदा कर सकता है व अधूरापन भी। किंतु सेवा से, वह भी गुरु सेवा से पाया ज्ञान इन दोषों से बचाने के साथ संपूर्ण, विनम्र व यशस्वी बना देता है।
श्रीकृष्ण व बलराम ने भी अंवतीपुर (आज के दौर का उज्जैन) नगरी में गुरु सांदीपनी से केवल 64 दिनों में ही गुरु सेवा व कृपा से ऐसी 64 कलाओं में दक्षता हासिल की, जो न केवल कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में बड़े-बड़े सूरमाओं को पस्त करने का जरिया बनी, बल्कि गुरु से मिले इन कलाओं और ज्ञान के अक्षय व नवीन रहने का आशार्वाद श्रीमद्भगवद्गगीता के रूप में आज भी जगतगुरु श्रीकृष्ण के साक्षात ज्ञानस्वरूप के दर्शन कराता है और हर युग में जीने की कला भी उजागर करने वाला विलक्षण धर्मग्रंथ है।
गुरु सांदीपनि ने श्रीकृष्ण व बलराम को सारे वेद, उनका गूढ़ रहस्य बताने वाले शास्त्र, उपनिषद, मंत्र व देवाताओं से जुड़ा ज्ञान, धनुर्वेद, मनुस्मृति सहित सारे धर्मशास्त्रों, तर्क विद्या या न्यायशास्त्र का ज्ञान दिया। संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध व आश्रय जैसे 6 रहस्यों वाली राजनीति भी सिखाई। यही नहीं, दोनों भाइयों ने केवल गुरु के 1 बार बोलनेभर से ही 64 दिन-रात में 64 अद्भुत कलाओं को भी सीख लिया।
1- नृत्य – नाचना
2- वाद्य- तरह-तरह के बाजे बजाना
3- गानविद्या – गायकी।
4- नाट्य – तरह-तरह के हाव-भाव व अभिनय
5- इंद्रजाल-जादूगरी
6- नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना
7- सुगंधित चीजें- इत्र, तैल आदि बनाना
8- फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
9- बेताल आदि को वश में रखने की विद्या
10- बच्चों के खेल
11- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
12- मन्त्रविद्या
13- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना
14- रत्नों को नाना प्रकार के आकारों में काटना
15- नाना प्रकार के मातृकायन्त्र बनाना
16- सांकेतिक भाषा बनाना
17- जल को बांध देना।
18- बेल-बूटे बनाना
19- चावल और फूलों से पूजा के उपहार की रचना करना। ( देव पूजन या अन्य शुभ मौकों पर कई रंगों से रंगे चावल, जौ आदि चीजों और फूलों को तरह-तरह से सजाना )
20- फूलों की सेज बनाना
21- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना – इस कला के जरिए तोता-मैना की तरह बोलना या उनको बोल सिखाए जाते हैं।
22- वृक्षों की चिकित्सा
23- भेड़, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति
24- उच्चाटन की विधि
25- घर आदि बनाने की कारीगरी
26- गलीचे, दरी आदि बनाना
27- बढ़ई की कारीगरी
28- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना यानी आसन, कुर्सी, पलंग आदि को बेंत आदि चीजों से बनाना।
29- तरह-तरह खाने की चीजें बनाना यानी कई तरह सब्जी, रस, मीठे पकवान, कड़ी आदि बनाने की कला।
30- हाथ की फुर्ती कें काम
31- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
32- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
33- द्यू्त क्रीड़ा
34- समस्त छन्दों का ज्ञान
35- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
36- दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
37- कपड़े और गहने बनाना
38- हार-माला आदि बनाना
39- विचित्र सिद्धियां दिखलाना यानी ऐसे मंत्रों का प्रयोग या फिर जड़ी-बुटियों को मिलाकर ऐसी चीजें या औषधि बनाना जिससे शत्रु कमजोर हो या नुकसान उठाए।
40-कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना – स्त्रियों की चोटी पर सजाने के लिए गहनों का रूप देकर फूलों को गूंथना।
41- कठपुतली बनाना, नाचना
42- प्रतिमा आदि बनाना
43- पहली
44- सूई का काम यानी कपड़ों की सिलाई, रफू, कसीदाकारी व मोजे, बनियान या कच्छे बुनना।
45 - बालों की सफाई का कौशल
46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
47- कई देशों की भाषा का ज्ञान
48 - म्लेच्छ-काव्यों का समझ लेना – ऐसे संकेतों को लिखने व समझने की कला जो उसे जाननेवाला ही समझ सके।
49 - सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा
50 - सोना-चांदी आदि बना लेना
51 - मणियों के रंग को पहचानना
52- खानों की पहचान
53- चित्रकारी
54- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
55- शय्या-रचना
56- मणियों की फर्श बनाना यानी घर के फर्श के कुछ हिस्से में मोती, रत्नों से जड़ना।
57- कूटनीति
58- ग्रंथों के पढ़ाने की चातुरी
59- नयी-नयी बातें निकालना
60- समस्यापूर्ति करना
61- समस्त कोशों का ज्ञान
62- मन में कटक रचना करना यानी किसी श्लोक आदि में छूटे पद या चरण को मन से पूरा करना।
63-छल से काम निकालना
64- कानों के पत्तों की रचना करना यानी शंख, हाथीदांत सहित कई तरह के कान के गहने तैयार करना।
Saturday, April 20, 2013
आज
के दौर में दबाव या तनाव दिमाग पर हावी होने की वजहों में घर या नौकरी के
काम व लक्ष्य नियत समय पर पूरा न होने व मनचाहे नतीजों को न पाना भी है।
इससे कई मौकों पर दिमाग अस्थिर व अशांत हो जाता है। मन-मस्तिष्क को ऐसी दशा
से बचाने के लिए शास्त्रों के जरिए उपाय ढूंढे तो यही कहा गया है कि हर
रोज कर्म और कर्तव्यों को संकल्प और समर्पण के साथ पूरा करते चले जाना भी
ईश्वर उपासना के समान है। इसलिए भी कर्म को ही पूजा कहा गया है।
व्यावहारिक तौर पर भी जिस तरह देव पूजा में ईश्वर के प्रति आस्था व
श्रद्धा शुभ फल देने वाली मानी जाती हैं। ठीक उसी तरह लगन, सही सोच व
विश्वास के साथ काम करना भी अच्छे नतीजे तय करता है। वहीं, अगर सुख, शांति व
सफलता की चाहत से देव विशेष की पूजा उपाय की बात करें तो जगतपालक,
लक्ष्मीपति भगवान विष्णु का स्मरण श्रेष्ठ माना गया है। इसके लिए एकादशी
तिथि (21 अप्रैल) बड़ी ही शुभ मानी गई है।
21 को भगवान विष्णु भक्ति शुभ दिन इस विष्णु मंत्र का स्मरण आनंदस्वरूप व
जगतपालक भगवान विष्णु की कृपा से सौभाग्य, वैभव, सफलता व तरक्की के लिए
बड़ा ही शुभ माना गया है। इस मंत्र को घर ही नहीं रोज कार्यस्थल या
कार्यालय में भी शुद्ध भाव और चिंतन से बोलना बेहतर नतीजे देने वाला साबित
होता है।
सत्यस्थ: सत्यसङ्कल्प: सत्यवित् सत्यत्प्रदस्तथा।
धर्मो धर्मी च कर्मी च सर्वकर्मविवर्जित:।।
कर्मकर्ता च कर्मैव क्रिया कार्यं तथैव च।
श्रीपतिर्नृपति: श्रीमान् सर्वस्य पतिरूर्जित:।।
Tuesday, April 9, 2013
भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। यहां हर दिन कोई न कोई त्योहार, पर्व या व्रत होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि स्थान बदलने के साथ-साथ परंपराओं में भी थोड़ा परिवर्तन आ जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (इस बार 11 अप्रैल, गुरुवार) से हिंदू नव वर्ष का प्रारंभ माना जाता है।
यह पर्व भी भारत के अनेक स्थानों में मनाया जाता है। व्रज में भी यह पर्व पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है। वृंदावन में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से दशमी तक श्रीराम मंदिर में दस दिवसीय ब्रह्मोत्सव होता है। इसमें प्रतिदिन सुबह धूमधाम से सोने-चांदी के वाहनों पर विराजमान भगवान रंगमन्नार की सवारी मंदिर से बगीचा जाती व आती है।
नवसंवत को (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) प्राय: सभी मंदिरों में पंचांग सुना जाता है। प्रतिपदा से नवमी तक देवी मंदिरों में विशेष पूजन-हवन, यज्ञादि धार्मिक कार्य किए जाते हैं। वृंदावन के कात्यायनीपीठ में बृहदोत्सव होत है क्योंकि वृंदावन शक्तिपीठ और कात्यायनी व्रज गोपियों द्वारा पूजित हैं, जो कृष्ण प्राप्ति में सहायिका हैं।
चैत्र कृष्ण नवमी को दक्षिणी शैली के विशाल सुसज्जित रथ में श्रीरंगनाथ-गोदाम्बा की यात्रा निकाली जाती है। इसे रथ का मेला भी कहते हैं। दशमी की रात को आतिशबाजी की जाती है। एकादशी को मंदिरों में गुलाबडोल सजाए जाते हैं। गुलाब पुष्पों से निर्मित डोलों (झूलों) में राधा-कृष्ण रात के समय झूला झूलते हैं।
Saturday, April 6, 2013
हिन्दू पंचांग की हर एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की भी उपासना ज्ञान, धन, स्वास्थ्य, विद्या, प्रतिष्ठा, यश सहित किसी भी अभाव का अंत करने वाली मानी गई है।
ऐसे ही मंगलकारी जीवन की चाहत पूरी करने के लिए शास्त्रों में ऐसे भी छोटे-छोटे उपाय बताए गए हैं, जिनसे भगवान विष्णु व लक्ष्मी की उपासना एक ही साथ हो जाती है। खासतौर पर यहां बताया जा रहा उपाय धनलाभ देने वाला व कलह दूर करने वाला माना गया है। यह उपाय है - भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्नान कराकर तुलसी दल विशेष मंत्र से अर्पित करना।
हिन्दू धर्म मान्यताओं में तुलसी का पौधा लक्ष्मी स्वरूपा माना गया है।
- भगवान विष्णु की प्रतिमा को पवित्र स्थान या पात्र में रखकर पवित्र जल से या पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद व शक्कर) से स्नान या अभिषेक कराकर साफ वस्त्र से पोंछकर नियत स्थान पर विराजित करें। केसरिया चंदन, सुगंधित फूल चढ़ाकर पूजा करें, मिठाई का भोग लगाकर नीचे लिखे तुलसी मंत्र से तुलसी दल को अर्पित करें -
तुलसी हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम्।
भवमोक्षप्रदां तुभ्यमर्पयामि हरिप्रियाम्।।
- तुलसी दल चढ़ाने के बाद विष्णु भगवान की धूप, दीप व कर्पूर आरती कर खुशहाल जीवन की कामना करें। भगवान को स्नान कराया पंचामृत ग्रहण करें।
Friday, April 5, 2013
धर्मग्रंथ भी ईश्वर के साक्षात् ज्ञान स्वरूप व शक्ति के रूप में पूजनीय होते हैं। यही वजह है कि हिन्दू धर्म परंपराओं में नियत मर्यादा का पालन करते हुए धर्मग्रंथों का अध्ययन या उनसे जुड़े प्रवचन शुरू करना शुभ माना गया है। किंतु कई लोग धर्मग्रंथों को केवल साधारण किताब की तरह उपयोग करते हुए देखे जाते हैं, इसके चलते वह धर्मग्रंथों के लिए नियत मर्यादा का ध्यान न रख कहीं भी, किसी भी स्थान पर रख उसको पढ़ते हैं, इसके पीछे कहीं न कहीं धर्म से जुड़ी समझ व विचारों में पावनता का अभाव होता है। हालांकि माना जाता है कि भक्ति किसी भी रूप में ईश्वर को प्रसन्न करती है, किंतु उसके लिए आस्था व विचारों की पवित्रता भी जरूरी है।
इसी कड़ी में हिन्दू धर्म परंपराओं में पवित्र धर्मग्रंथों, जिनमें पुराण, गीता या श्रीमद्भागवत महापुराण शामिल है, पढ़ना सांसारिक जीवन के सारे कलह और परेशानियों से छुटकारा देने वाले माने गए हैं। इन पावन धर्मग्रंथों को पढ़ने से पहले एक मंत्र विशेष बोलने का महत्व बताया गया है, जिसमें ईश्वर के ही एक रूप श्री हरि के विराट स्वरूप का स्मरण कर शिव के साथ अलग-अलग देवों की भी वंदना है। यह मंत्र भगवान शिव व हरि के रूप में अलग-अलग शक्तियों के रूप में ईश्वर के एक ही होने की ओर संकेत भी करता है।
अजमजरमनन्तं ज्ञानरूपं महान्तं शिवमममनादिं भूतदेहादिहीनम्।
सकलकरणहीनं सर्वभूतस्थितं तं हरिममलममायं सर्वगं वन्द एकम्।
नमस्यामि हरिं रुद्रं ब्राह्मणं च गणाधिपम्।
देवीं सरस्वतीं चैव मनोवाक्कर्मभि: सदा।।
इसका सरल शब्दों में मतलब है - अजन्मे, अजर, अनादि, अनन्त, पावन, जिनका शरीर पंचभूतों से नहीं बना है, इन्द्रियों से रहित, हर जीव में बसे, माया से दूर, हर जगह मौजूद, मंगलकारी भगवान श्री हरि की मैं वंदना करता हूं। साथ ही मन, बोल और कर्म से विष्णु, ब्रह्मा, शिव, गणेश और माता सरस्वती को नमस्कार करता हूं।
हिन्दू वर्ष के बारह महीनों में हर माह के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में एक-एक एकादशी तिथि आती है। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत सभी दोषों और विकारों से छुटकारा देने वाला माना गया है। इस तरह यह इंसान के लिए आत्मरक्षक ही है। यह खासतौर पर वैष्णव व्रत है, किंतु विष्णु उपासक हर धर्मावलंबी इस व्रत को करता है।
दरअसल, एकादशी व्रत मात्र धार्मिक नजरिए से ही नहीं बल्कि व्यावहारिक तौर पर भी मानसिक एवं शारीरिक पवित्रता के लिए भी अहम है। किंतु यह भी देखा जाता है कि कई शिक्षित युवा भी इस संबंध में ज्ञान के अभाव में भारतीय सनातन धर्म से जुडी व्रत परंपराओं की उपेक्षा करते हैं।
सच यह है कि प्राचीन काल से ऋषि-मुनियों से लेकर देश की आजादी के महानायक महात्मा गांधी भी व्रत-उपवास के महत्व को सिद्ध कर चुके हैं । नई पीढी के लिए यह समझना जरूरी है कि अगर कोई इस व्रत को धर्म या ईश भक्ति की नजरिए से न करें, किंतु निरोग रहने में भी यह व्रत महत्वपूर्ण है। यह मन को संयम रखने के भाव सिखाता है। शरीर को नई ऊर्जा प्रदान करता है।
इस व्रत से जुड़े वैज्ञानिक पहलू पर गौर करें तो चूंकि चन्द्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने का प्रभाव सभी प्राणियों और वनस्पतियों पर पड़ता है। हिन्दू धर्म पंचांग तिथियों पर आधारित होता है। हर तिथि पर चन्द्रमा की स्थिति सदा एक सी रहती है। इसलिए उसका असर भी शरीर पर वैसा ही पडता है। इसलिए सेहत के नजरिए से ऐसा माना जाता है कि चतुर्थी तिथि से एकादशी के बीच पैदा रोग गंभीर नहीं हो पाते। इस काल में पहले के रोग भी ठीक हो जाते हैं। हर मास में दो एकादशी होती है । इस तरह महीने में आने वाली 2 एकादशी तिथियों के दो दिन आहार संयम रखा जाए तो यह हमारी पाचन क्रिया को मजबूत बनाकर शरीर को सेहतमंद व मन को प्रसन्न रखता है।
हिन्दू धर्म पंचांग की एकादशी तिथि से जुड़ी भगवान विष्णु उपासना की धर्म परंपराओं के पीछे मूल भावना, सोच और आचरण की पवित्रता को अपनाने की है ताकि इंसान मन और विचार से मजबूत और एकाग्र रहकर हर परेशानियों से पार पा सके।
इसी सिलसिले में संयम और शांति पाने का बेहतर उपाय संतुलित आहार से भी जुड़ा है। खासतौर पर व्रत-उपवास या इनके बिना भी खास चीजों को खाना जहां शरीर को सेहतमंद बनाने वाला बताया गया है, वहीं दूसरी ओर कुछ खास चीजों को खाना सेहत के लिए परेशानी की वजह भी माना गया है।
6 को चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी है
शहद, चावल का मांड, उड़द, राई, मसूर-दाल, बकरी, भैंस और भेड़ का दूध, मांस, मादक पदार्थ और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।
- इसी तरह मूली, प्याज, कुम्हड़ा, लहसुन, गाजर, बैंगन भोजन में नहीं लेना चाहिए। तिल का तेल, बासी भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
- तांबे के बर्तन में दूध रखना, चमड़े के बर्तन में पानी और खुद के लिए बनाया भोजन अशुद्ध माना जाता है। ऐसा करने से बचना चाहिए।
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