Thursday, February 21, 2013



शास्त्रों की सीख है कि अच्छे काम और सोच जीवन के रहते सुख-सुकून व मृत्यु के बाद दुर्गति से बचने के लिए बहुत जरूरी हैं। व्यावहारिक रूप से भी किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए सही विचार होने और उसके मुताबिक काम को अंजाम देने पर ही मनचाहे नतीजे संभव है। अन्यथा सोच और चेष्टा में तालमेल का अभाव या दोष बुरे नतीजों के रूप में सामने आते हैं।
मृत्यु के संदर्भ में यही बात सामने रख शास्त्रों की बात पर गौर करें तो बताया गया है कि कर्म ही नहीं विचारों में गुण-दोष के मुताबिक भी मृत्यु के बाद आत्मा अलग-अलग योनि प्राप्त करती है। जिनमें भूत-प्रेत योनि भी एक है। हालांकि विज्ञान भूत-प्रेत से जुड़े विषयों को वहम या अंधविश्वास मानता है। लेकिन यहां बताई जा रही मृत्य के बाद भूत-प्रेत बनने से जुड़ी बातें मनोविज्ञान व व्यावहारिक पैमाने पर प्रामाणिक होने के साथ ही सुखी व शांति से भरे जीवन के एक अहम सूत्र भी उजागर करती हैं। जानिए, किस कारण मृत्यु के बाद मिलती है भूत-प्रेत योनि और क्या है इनमें छिपा जीवन सूत्र? 
हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवदगीता में लिखी ये बातें मृत्यु के बाद भूत-प्रेत बनने का कारण उजागर करती है -
भूतानि यान्ति भूतेज्या:
यानी भूत-प्रेतो की पूजा करने वाले भूत-प्रेत योनि को ही प्राप्त करते हैं। इस बात को एक और श्लोक अधिक स्पष्ट करता है-
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:।।
यानी मृत्यु के वक्त प्राणी मन में जिस भाव, विचार या विषय का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है, वही उसी भाव या विषय के अनुसार योनि को प्राप्त हो जाता है। 
भूत-प्रेत होने के अंधविश्वासों से परे इन बातों में छिपे संदेश पर गौर करें तो संकेत यही है कि अगर व्यक्ति ताउम्र बुरे काम व उसका चिंतन करता रहे, तो वह बुराई के रूप में मन में स्थान बना लेते हैं और अन्तकाल में भी वही बातें मन-मस्तिष्क में घूमती हैं। ऐसे बुरे भावों के मुताबिक वह व्यक्ति भूत-प्रेत की नीच योनि को ही प्राप्त हो जाता है।
दरअसल, भूत-प्रेत भी मलीनता या बुराई के प्रतीक भी हैं। इसलिए यहां भूत-प्रेत उपासना का मतलब बुराई का संग भी है। इसलिए सीख यही है कि जीवन में बुरे कर्मों से दूरी बनाए रखे, ताकि जीवन रहते भी व जीवन के अंतिम समय में मन के अच्छे भावों के कारण मृत्यु के बाद भी दुर्गति से बचें।

Wednesday, February 20, 2013

माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में इसे अजा व भीष्म एकादशी भी कहा गया है। इस दिन भगवान विष्णु के निमित्त व्रत किया जाता है। इस बार यह एकादशी 21 फरवरी, गुरुवार को है।
जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। जया एकादशी के विषय में जो कथा प्रचलित है उसके अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से निवेदन कर जया एकादशी का महात्म्य, कथा तथा व्रत विधि के बारे में पूछा था। तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि जया एकादशी बहुत ही पुण्यदायी है। इस एकादशी का व्रत विधि-विधान करने से तथा ब्राह्मण को भोजन कराने से व्यक्ति नीच योनि जैसे भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है।

जया एकादशी की व्रत विधि इस प्रकार है-
जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। जो श्रद्धालु भक्त इस एकादशी का व्रत रखते हैं उन्हें दशमी तिथि को एक समय आहार करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि आहार सात्विक हो।
एकादशी के दिन भगवान श्रीविष्णु का ध्यान करके संकल्प करें और फिर धूप, दीप, चंदन, फल, तिल, एवं पंचामृत से उनकी पूजा करें। पूरे दिन व्रत रखें संभव हो तो रात्रि में भी व्रत रखकर जागरण करें। अगर रात्रि में व्रत संभव न हो तो फलाहार कर सकते हैं। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाकर उन्हें जनेऊ व सुपारी देकर विदा करें फिर भोजन करें। इस प्रकार नियमपूर्वक जया एकादशी का व्रत करने से महान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार जो जया एकादशी का व्रत करते हैं उन्हें पिशाच योनि में जन्म नहीं लेना पड़ता।

jai shree bankey bihari ji: हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विर...

jai shree bankey bihari ji: हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विर...: हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विराट स्वरूप का वर्णन है। द्वापर युग में महाप्रतापी अर्जुन को इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कर...

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हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विराट स्वरूप का वर्णन है। द्वापर युग में महाप्रतापी अर्जुन को इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कराकर कर्मयोगी भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के महामंत्र द्वारा अर्जुन के साथ संसार के लिए भी सफल जीवन का रहस्य उजागर किया।

भगवान का विराट स्वरूप ज्ञान शक्ति और ईश्वर की प्रकृति के कण-कण में बसे ईश्वर की महिमा ही बताता है। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन, नर-नारायण के अवतार थे और महायोगी, साधक या भक्त ही इस दिव्य स्वरूप के दर्शन पा सकता है। किंतु गीता में लिखी एक बात यह भी संकेत करती है सांसारिक जीवन में साधारण इंसान के लिए ऐसा तप करना कठिन हो तो उसे हर रोज पवित्र गीता से जुड़ा क्या उपाय करना चाहिए, जिसका शुभ प्रभाव ज़िंदगी के लिए फायदेमंद हो। दूसरे शब्दों में गीता में ही लिखी एक विशेष बात कलियुग में भगवान जगदीश की विराटता देखने का तरीका भी उजागर करती है।



श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय में ही देवी लक्ष्मी द्वारा भगवान विष्णु के सामने यह संदेह किया जाता है कि आपका स्वरूप मन-वाणी की पहुंच से दूर है तो गीता कैसे आपके दर्शन कराती है? तब जगत पालक श्रीहरि विष्णु गीता में अपने स्वरूप को उजागर करते हैं, जिसके मुताबिक -

पहले पांच अध्याय मेरे पांच मुख, उसके बाद दस अध्याय दस भुजाएं, अगला एक अध्याय पेट और अंतिम दो अध्याय श्रीहरि के चरणकमल हैं।

इस तरह गीता के अट्ठारह अध्याय भगवान की ही ज्ञानस्वरूप मूर्ति है, जो पढ़, समझ और अपनाने से पापों का नाश कर देती है। इस संबंध में लिखा भी गया है कि कोई इंसान अगर हर रोज गीता के अध्याय या श्लोक  के एक, आधे या चौथे हिस्से का भी पाठ करता है, तो उसके सभी पापों का नाश हो जाता है।

Saturday, February 16, 2013

एक ही ईश्वर के अलग-अलग धर्मों में कई नाम है। सनातन धर्म में भी ईश्वर के गुण, स्वरूप और दिव्य शक्तियों के आधार पर तीन रूप माने गए हैं। यह तीन रूप त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहलाते हैं।
इनमें भगवान विष्णु को जगत का पालन माना गया है। श्रीविष्णु को आनंद स्वरूप यानी सुख देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है। आपने भगवान विष्णु का 'हरि' नाम भी कई बार जाने-अनजाने बोला और सुना होगा

शास्त्रों के मुताबिक भगवान विष्णु के 'हरि' नाम का शाब्दिक मतलब हरण करने या चुरा लेने वाला होता है। कहा गया है कि 'हरि: हरति पापानि' जिससे यह साफ है कि हरि पाप या दु:ख हरने वाले देवता है। सरल शब्दों में 'हरि' अज्ञान और उससे पैदा होने वाले कलह को हरते या दूर कर देते हैं।
'हरि' नाम को लेकर एक रोचक बात भी बताई गई है, जिसके मुताबिक हरि को ऐश्वर्य और भोग हरने वाला भी माना है। चूंकि भौतिक सुख, वैभव और वासनाएं व्यक्ति को भगवान और भक्ति से दूर करती है। ऐसे में हरि नाम स्मरण से भक्त इन सुखों से दूर हो प्रेम, भक्ति और अंत में भगवान से जुड़ जाता है।
यही वजह है कि 'हरि' नाम को धार्मिक और व्यावहारिक रूप से सुख और शांति का महामंत्र माना गया है।

Tuesday, February 12, 2013


धर्म के नजरिए से प्रेम अहम जीवन मूल्य है। व्यावहारिक तौर पर भी प्रेम मानवीय ज़िंदगी में अलग-अलग रूप और रिश्तों में उजागर होता है। यहां तक कि प्रेम को ईश्वर से साक्षात्कार के लिए भी अहम माना गया है।  इसलिए जिंदगी में वास्तविक सुखों को पाने के लिए प्रेम का भाव बहुत जरूरी है।  हिन्दू धर्मग्रंथों के प्रसंगों पर गौर करें तो लीलाधर श्रीकृष्ण के चरित्र में प्रेम कई पहलू नजर आते हैं। माता, पिता, भाई, बहन, मित्र, पत्नी, पुत्र, सेवक, भक्त, देश या समाज के लिए प्रेम की अहमियत  भगवान कृष्ण ने जगत को बताई। उनके गोपियों संग रासलीला से भी आदर्श प्रेम के रहस्य जुड़े हैं।  जगतपालक भगवान विष्णु का अवतार होने से भी भगवान श्रीकृष्ण प्रेम, आनंद और सुख देने वाले देवता के रूप में पूजनीय हैं। इसलिए भगवान कृष्ण की उपासना जीवन से जुड़ी सुख, ऐश्वर्य, धन, प्रेम, सौभाग्य, सम्मान, सुखद दाम्पत्य, प्रतिष्ठा और मोक्ष की सारी इच्छाएं पूरी करने वाली मानी गई है।  यहां बताया जा रहा है भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का ऐसा आसान मंत्र जिसका हर रोज जप या ध्यान करने पर जीवन में मनचाहे सुखों या जीवसाथी पानें में आ रही सारी बाधाओं से भी छुटकारा मिलता है। कृष्ण का यह मूल मंत्र व्यक्ति की हर इच्छा पूरी करता है और मनचाही खुशियां दे देता है -  'कृं कृष्णाय नम:' सभी सुख देने वाले कृष्ण के इस मूलमंत्र का जप सुबह नहाने के बाद एक सौ आठ बार करें। इस छोटे से मंत्र के प्रभाव से जीवन में बड़े और सुखद बदलाव आएंगे।

Friday, February 8, 2013

भक्ति, प्रेम, समर्पण और त्याग का ही रूप है। धार्मिक आस्था है कि जब ऐसी भक्ति से ईश्वर को याद किया जाता है, तो ईश्वर भी उस प्रेम के वशीभूत हो किसी न किसी रूप से भक्त पर कृपा बरसते हैं।
भक्ति की बात हो तो भगवान शिव की भक्ति सबसे आसान और जल्द मुरादें पूरी करने वाली मानी जाती है। पौराणिक प्रसंग बताते हैं कि शिव भक्ति से दानव, मानव ही नहीं बल्कि देवताओं ने भी अपने मनोरथ पूरे किए।
इसी कड़ी में महाभारत के मुताबिक भगवान शिव ने स्वयं कहा है  - श्रीकृष्ण मेरी भक्ति करते हैं, इसलिए मुझे श्रीकृष्ण सबसे प्रिय है। भगवान श्रीकृष्ण ने शिव की उपासना शिव के हजार नामों के उच्चारण और बिल्वपत्रों को चढ़ाकर सात माह तक कठोर तप के साथ की। महाभारत के अनुशासन पर्व में बताया गया है कि श्रीकृष्ण ने शिव की भक्ति से 16 कामनाओं को पूरा किया।

- धर्म में मेरी दृढ़ता रहे यानी सत्य, प्रेम परोपकार जैसा धर्म पालन।
- युद्ध में शत्रुघात यानी विरोधियों और जीवन के संघर्ष में विपरीत हालात पर काबू पा लेना।
- जगत में उत्तम यश मिले यानी प्रसिद्धि, सम्मान।
- परम बल यानी हर तरह से शक्ति संपन्न।
- योग बल यानी संयम और संतोष।
- सर्व प्रियता यानी सबसे मधुर संबंध और व्यवहार।
- शिव का सानिध्य यानि भगवान, धर्म और कर्म से जुड़े रहना।
- दस हजार पुत्र यानी संतान और कुटुंब सुख।
- ब्राह्मणों में कोपाभाव यानी पवित्रता और शुचिता प्राप्त हो।
- पिता की प्रसन्नता यानी पिता का प्रेम और आशीर्वाद।
- सैकड़ों पुत्र यानी दाम्पत्य सुख।
- उत्कृष्ट वैभव योग यानी सुख-समृद्धि।
- कुल में प्रीति यानी परिवार और संबंधियों में मेलजोल।
- माता का प्रसाद या अनुग्रह यानी माता से प्रेम और आशीर्वाद।
- शम प्राप्ति यानी हर तरह से शांति मिलना।
- दक्षता यानी कार्य कुशलता या हुनरमंद होना

Tuesday, February 5, 2013

भगवान विष्णु के सभी अवतार युगों बाद भी व्यक्ति, समाज और कुदरत को गतिवान और ऊर्जावान रखने का सबक देते हैं। यही वजह है कि जीवनशैली में संयम और अनुशासन लाने के लिए विष्णु पूजा, भक्ति और उपासना की अहमियत बताई गई है। खासतौर पर इनसे जुड़ी दान-धर्म की परंपराएं मन, बुद्धि और सोज को सकारात्मक भावनाओं से भर देती है।

शास्त्रों के मुताबिक खासतौप पर एकादशी तिथि (6 फरवरी) पर किया दान तो विष्णु भक्ति की दूसरी सभी शुभ तिथियों और अवसरों पर किए गए दान से भी अधिक पुण्य देता है। इनमें दान के लिए कुछ ऐसी चीजें भी शामिल हैं, जो सस्ती व आसानी से मिल जाती हैं, किंतु इनका दान बड़ा ही शुभ माना गया है।

एकादशी तिथि या द्वादशी तिथि पर सुबह इन चीजों का दान भगवान विष्णु का विधिवत व्रत व पूजा उपासना के साथ किसी ब्राह्मण को करें -
- खारक
- मौसमी फल- जल पात्र व वस्त्र
- गुड़ और अरहर यानी तुवर की दाल
- चने या चने की दाल
- केशर
- अष्टगंध
- लाल चंदन
- गोरोचन या गौलोचन
- शंख
- चाँदी के बर्तन में घी
- घंटी या घंटाल
- मोती या मोती की माला
- काँसे के बर्तन में सोना
- माणिक रत्न
- तिल

Friday, January 25, 2013

स्वस्थ तन, साफ मन और मीठी बोली किसे सुख-सुकून नहीं देती? दरअसल, तीनों ही बातों में एक समानता है और वह है - पवित्रता। जी हां, किसी भी तरह से साफ-सफाई मन को ऊर्जा व ताजगी देती है। बस, यही ऊर्जा कई तरह की खूबियों व शक्तियों में तब्दील हो सुख-संपन्न बनाने में मदद करती है। इसे ही धार्मिक आस्था से देवी लक्ष्मी की कृपा भी कहा जाता है।

जाहिर है कि जहां तन, मन, विचार व वातावरण में पवित्रता हो वहां लक्ष्मी बसती है। सांसारिक जीवन में ऐसी ही पवित्रता का प्रतीक व लक्ष्मी का साक्षात् स्वरूप माना जाता है - तुलसी का पौधा।

शास्त्रों में तुलसी का पौधा घर में लगाने का शुभ फल लक्ष्मी की असीम कृपा देने वाला यानी सुख-समृद्ध करने वाला माना गया है।

पौराणिक मान्यताओं में इसे तुलसी व वृंदा के नाम से विष्णु प्रिया या लक्ष्मी का ही रूप बताया गया है। इसीलिए शालिग्राम-तुलसी विवाह की परंपरा व पूजा भी सुख-समृद्ध करने वाली मानी गई है। माना जाता है कि हरि व हर यानी शिव-विष्णु की कृपा से ही तुलसी को देववृक्ष का स्वरूप मिला। व्यावहारिक तौर से भी घर में तुलसी पूजा से मन में शुद्ध भाव पैदा होते हैं तो खाने से तन भी निरोगी रहता है।
अगर आप भी आर्थिक परेशानियों से दूर खुशहाल जीवन चाहते हैं तो शास्त्रों में बताए कुछ विशेष मंत्रों घर में तुलसी का पौधा लगाकर देवी लक्ष्मी को बुलावा दें और स्थायी वास की कामना करें।
जानिए ये मंत्र और तुलसी पौधा लगाने का सरल तरीका -
- तुलसी पौधा लगाने के लिए वैसे तो शास्त्रों में आषाढ़ व ज्येष्ठ माह का महत्व बताया गया है। किंतु अन्य दिनों में किसी भी पवित्र तिथि पर, खासतौर पर एकादशी तिथि या पूर्णिमा तिथि को स्नान के बाद किसी भी देव मंदिर या जिस घर मे नित्य तुलसी पूजा होती हो, से तुलसी का छोटा-सा पौधा लेकर आएं।
- घर के आंगन या किसी पवित्र जगह को गंगाजल से पवित्र कर तीर्थ की पवित्र मिट्टी से भरे गमले में उस पौधे को रोपें।


तुलसी के पौधे को जल, गंध, इत्र, फूल, दूर्वा, फल अर्पित करते हुए पीली मौली या वस्त्र अर्पित करें। मिठाई का भोग लगाएं।
- बाद किसी सुहागिन स्त्री से ही तुलसी के चारों ओर दूध व जल की धारा अर्पित करवाकर नीचे लिखे मंत्रों का ध्यान करें -
विष्णु का ध्यान कर तुलसी मंत्र बोलें -
नमस्तुलसि कल्याणि नमो विष्णुप्रिये शुभे।
नमो मोक्षप्रदे देवि नम: सम्पत्प्रदायिके।।
लक्ष्मी का ध्यान कर यह मंत्र बोलें -
श्रीश्चते लक्ष्मीश्चपत्न्यावहोरात्रे पारश्वे नक्षत्राणिरूप मश्विनौव्यात्तम्।
इष्णनिषाणामुम्म इषाण सर्वलोकम्म इषाण।
- मंत्र स्मरण के बाद तुलसी की धूप, दीप व कर्पूर आरती करें व प्रसाद ग्रहण करें।

Tuesday, January 22, 2013

जहां जगतपालक भगवान विष्णु का सत्व गुणी यानी सत्य, धर्म, शांति, सुख और पावनता के भावों से सराबोर चरित्र जीने की प्रेरणा व जज्बा देता है तो वहीं उनका विराट स्वरूप कर्म व धर्म की राह बताने वाला है। इसी तरह उनके सारे चमत्कारी अवतार नैतिक मूल्यों और सही आचरण का सबक देकर ज़िंदगी को सही तरीके से जीना सिखाते हैं।

खासतौर पर ज़िंदगी में दायित्वों को निभाते वक्त भी जगतपालक की तरह शांति और संयम की बड़ी अहमियत है ताकि बेहतर आजीविका के साथ बिन बाधा सफलता और तरक्की पाकर खुशहाल जीवन गुजार सकें।

शास्त्रों के मुताबिक एकादशी तिथि भगवान विष्णु की उपासना शुभ तिथि है। इस दिन भगवान विष्णु मंत्रों के ध्यान से लक्ष्मी की प्रसन्नता भी मिलती है, जो दौलत, यश, प्रतिष्ठा , तरक्की की ऐसी ही कामना जल्द पूरी करती है।

इस दिन सुबह व शाम के वक्त भगवान विष्णु को केसरिया चंदन मिले जल से स्नान कराएं। स्नान के बाद चंदन, पीले वस्त्र, पीले फूल चढ़ाकर व मिठाइयों का भोग लगाकर चंदन धूप व गोघृत दीप जलाएं।

पद्मनाभोरविन्दाक्ष: पद्मगर्भ: शरीरभूत्।
महद्र्धिर्ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वज:।।
अतुल: शरभो भीम: समयज्ञो हविर्हरि:।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जय:।।

Monday, January 14, 2013

मैं साहिल पे लिखी हुई इबादत नहीं
जो लहरों से मिट जाती है
मैं बारिश कि बरसती बूंद नहीं
जो बरस कर थम जाती है
मैं ख्वाब नहीं,
जिसे देखा और भुला दिया
मैं चांद भी नहीं,
जो रात के बाद ढल गया
मैं हवा का वो झोंका भी नहीं,
के आया और गुजर गया
मैं तो वो अहसास हूं ,
जो तुझमे लहू बनकर गरदिश करे
मैं वो रंग हू
जो तेरे दिल पर चढे
ओर कभी ना उतरे
मे वो गीत हूं ,
जो तेरे लबो से जुदा ना हो
ख्वाब, इबादत, हवा कि तरह ...
चांद, बुंद, शमा कि तरह
मेरे मिटने का सवाल नहीं..
क्यूंकि
मैं तो मोहब्बत हूँ .....
!!जय श्रीराधे...जय श्रीराधे...जय श्रीराधे...!!
!!जय श्रीराधे...जय श्रीराधे...जय श्रीराधे.!!

मधुवन की लताओं में घनश्याम तुम्हें देखूं !

घनघोर घटाओं में घनश्याम तुम्हें देखूं !!

यमुना का किनारा हो , निर्मल जल धरा हो !

वहां झुला झुलाते हुए घनश्याम तुम्हें देखूं !!

जागृत की अवस्था में, तुम सामने हो मेरे !

सो जाऊ तो सपनों में घनश्याम तुम्हें देखूं !!

वृन्दावनकी गल्लियाँ हो, संग चंचल सखियाँ हो!

वहां रास रचाते हुए घनश्याम तुम्हें देखूं !!

टेढे हो खड़े मोहन, टेढा है मुकुट तेरा !

अधरों पे धरे मुर

ली घनश्याम तुम्हें देखूं !!

मधुवन की लताओं में घनश्याम तुम्हें देखूं !

घनघोर घटाओं में घनश्याम तुम्हें देखूं !!

तू सामने रहे मेरे, मै तेरा दीदार करू
सब कुछ भुला के,सिर्फ तुझे ही प्यार करू
तेरी जुल्फों के साये मे जिन्दगी मिली
तेरी आँखों मे डूब के,ख़ुशी मिली
तुझ से भी बढ़ कर तुझ पे ऐतबार करू
तुम न थे दिल मे,कोई अरमान न था
इस नाकाम जिन्दगी मे,कही मुकाम न था
सफ़र के हर मोड़ पे,तेरा इन्तेजार करू
वादा करो मुझ से,कभी दूर न जाओगे
मेरे दिल को ख़ुशी देकर फिर न रुलाओगे
मेरे सब कुछ तुम हो कान्हा,तुझ पे जान निसार करू

कोई श्याम सुन्दर से कहदो यह जाके,

भुला क्यों दिया हमें, अपना बना के |

अभी मैंने तुमको निहारा नहीं है,

तुम्हारे सिवा कोई हमारा नहीं है |

चले क्यों गए श्याम दीवाना बना के,

भुला क्यों दिया हमें, अपना बना के


Wednesday, January 9, 2013

हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विराट स्वरूप का वर्णन है। द्वापर युग में महाप्रतापी अर्जुन को इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कराकर कर्मयोगी भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के महामंत्र द्वारा अर्जुन के साथ संसार के लिए भी सफल जीवन का रहस्य उजागर किया।

भगवान का विराट स्वरूप ज्ञान शक्ति और ईश्वर की प्रकृति के कण-कण में बसे ईश्वर की महिमा ही बताता है। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन, नर-नारायण के अवतार थे और महायोगी, साधक या भक्त ही इस दिव्य स्वरूप के दर्शन पा सकता है। किंतु गीता में लिखी एक बात यह भी संकेत करती है सांसारिक जीवन में साधारण इंसान के लिए ऐसा तप करना कठिन हो तो उसे हर रोज पवित्र गीता से जुड़ा क्या उपाय करना चाहिए, जिसका शुभ प्रभाव ज़िंदगी के लिए फायदेमंद हो। दूसरे शब्दों में गीता में ही लिखी एक विशेष बात कलियुग में भगवान जगदीश की विराटता देखने का तरीका भी उजागर करती है।

श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय में ही देवी लक्ष्मी द्वारा भगवान विष्णु के सामने यह संदेह किया जाता है कि आपका स्वरूप मन-वाणी की पहुंच से दूर है तो गीता कैसे आपके दर्शन कराती है? तब जगत पालक श्री हरि विष्णु गीता में अपने स्वरूप को उजागर करते हैं, जिसके मुताबिक -

पहले पांच अध्याय मेरे पांच मुख, उसके बाद दस अध्याय दस भुजाएं, अगला एक अध्याय पेट और अंतिम दो अध्याय श्रीहरि के चरणकमल हैं।

इस तरह गीता के अट्ठारह अध्याय भगवान की ही ज्ञानस्वरूप मूर्ति है, जो पढ़, समझ और अपनाने से पापों का नाश कर देती है। इस संबंध में लिखा भी गया है कि कोई इंसान अगर हर रोज गीता के अध्याय या श्लोक  के एक, आधे या चौथे हिस्से का भी पाठ करता है, तो उसके सभी पापों का नाश हो जाता है।


Tuesday, January 8, 2013

हिन्दू धर्म पंचांग की एकादशी तिथि से जुड़ी भगवान विष्णु उपासना की धर्म परंपराओं के पीछे मूल भावना, सोच और आचरण की पवित्रता को अपनाने की है ताकि इंसान मन और विचार से मजबूत और एकाग्र रहकर हर मुश्किलों से पार पा सके।

इसी सिलसिले में संयम और शांति पाने का बेहतर उपाय संतुलित आहार से भी जुड़ा है। खासतौर पर व्रत-उपवास या इनके बिना भी खास चीजों को खाना जहां शरीर को सेहतमंद बनाने वाला बताया गया है, वहीं दूसरी ओर कुछ खास चीजों को खाना सेहत के लिए परेशानी की वजह बनने वाला भी माना गया है।


 शहद, चावल का माँड, उड़द, राई, मसूर-दाल, बकरी, भैंस और भेड़ का दूध, मांस, मादक पदार्थ और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।

- इसी तरह मूली, प्याज, कुम्हड़ा, लहसुन, गाजर, बैंगन भोजन में नहीं लेना चाहिए। तिल का तेल, बासी भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।

- ताँबे के बर्तन में दूध रखना, चमड़े के बर्तन में पानी और खुद के लिए बनाया भोजन अशुद्ध माना जाता है। ऐसा करने से बचना चाहिए।

Monday, January 7, 2013

पौष मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को सफला एकादशी कहते हैं। इस बार यह एकादशी 8 जनवरी, मंगलवार को है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस व्रत की विधि इस प्रकार है-
सफला एकादशी (8 जनवरी, मंगलवार) के दिन सुबह स्नान कर साफ वस्त्र पहन कर माथे पर चंदन लगाकर कमल अथवा वैजयन्ती फूल, फल, गंगा जल, पंचामृत, धूप, दीप, सहित लक्ष्मी नारायण की पूजा एवं आरती करें। भगवान श्रीहरि के विभिन्न नाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए फलों के द्वारा उनका पूजन करें। शाम को दीप दान के बाद फलाहार कर सकते हैं।
सफला एकादशी के दिन दीप-दान करने की परंपरा भी है। इस रात्रि को वैष्णव संप्रदाय के लोग भगवान श्रीहरि का नाम-संकीर्तन करते हुए जागते हैं। एकादशी का रात्रि में जागरण करने से जो फल प्राप्त होता है, वह हजारों वर्ष तक तपस्या करने पर भी नहीं मिलता, ऐसा धर्मग्रंथों में लिखा है। द्वादशी के दिन भगवान की पूजा के पश्चात कर्मकाण्डी ब्राह्मण को भोजन करवा कर जनेऊ एवं दक्षिणा देकर विदा करने के पश्चात भोजन करें।
इस प्रकार सफला एकादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

Tuesday, January 1, 2013







धर्मग्रंथ कर्म को पूजा का दर्जा देते हैं। किंतु कर्म के साथ-साथ ईश्वर भक्ति और कृपा को भी सफल जीवन का सूत्र भी माना गया है। आज की व्यस्त जिंदगी में इंसान के पास काम व दायित्वों को पूरा करने की उलझन में ईश्वर स्मरण के लिए वक्त निकालना मुश्किल है।
यही वजह है कि साल 2013 के पहले दिन यहां बता रहे हैं धर्मग्रंथों का एक ऐसा सरल और असरदार मंत्र, जिसके लिए आस्था है कि देव पूजा के अलावा कार्य और जिम्मेदारियों के दौरान किसी भी वक्त मन ही मन स्मरण करें, तो सारे काम बिना बाधा और परेशानी के पूरे ही नहीं होंगे, बल्कि नाम व पैसा देने वाले भी साबित होंगे।
यह मंत्र भगवान विष्णु के साथ उनके अवतार श्रीकृष्ण का स्मरण है।  इसलिए इस मंत्र का स्मरण बहुत ही शुभ फल देने वाला होगा।

सुबह स्नान के बाद यथासंभव पीले वस्त्र पहनकर देवालय में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा गंध, अक्षत, पीले फूल व धूप, दीप से करें।
- पूजा के बाद इस मंत्र का यथाशक्ति जप करें। यही मंत्र दिन में किसी भी वक्त काम के दौरान ध्यान भी कर सकते हैं -
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
कर्म की अहमियत बताने वाले भगवान श्रीकृष्ण और शांतिस्वरूप भगवान विष्णु के ध्यान से आपका हर काम न केवल निर्विघ्र संपन्न होगा, बल्कि शांति और सुकून भी लाएगा।

Monday, December 24, 2012

विश्व के किसी भी धर्म या संप्रदाय के किसी भी ग्रंथ का जन्मदिन नहीं मनाया जाता। जयंती सिर्फ श्रीमद्भगवत गीता की मनाई जाती है क्योंकि अन्य ग्रंथ किसी मनुष्य द्वारा लिखे या संकलित किए गए हैं, जबकि गीता का जन्म भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से हुआ है।

या स्वयं पद्मनाभस्य मुख पद्माद्विनि: सृता।।

गीता का जन्म कुरुक्षेत्र में मार्गशीर्ष मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से हुआ। मोक्षदा एकादशी के नाम से विख्यात यह तिथि इस बार 23 दिसंबर को थी। गीता किसी देश, काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिए न होकर संपूर्ण मानव जाति के लिए है। इसे स्वयं श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निमित्त बनाकर कहा है। जिस प्रकार गाय के दूध को बछड़े के बाद सभी धर्म, संप्रदाय के लोग पान करते हैं। इसे दुहने वाले गोपाल श्रीकृष्ण हैं, अर्जुन रूपी बछड़े के पीने से निकलने वाला महान् अमृतसदृश दूध ही गीतामृत है।

गीता वेदों और उपनिषदों का सार है। लोक-परलोक में मंगलमय मार्ग दिखाने वाला, कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों मार्गों द्वारा मनुष्य को परम श्रेय के साधन का उपदेश देने वाला, ऊंचे ज्ञान, विमल भक्ति, उज्जवल कर्म, यम, नियम, त्रिविध तप, अहिंसा, सत्य और दया के उपदेश देने वाला ग्रंथ है। इसके छोटे-छोटे 18 अध्यायों में इतना ज्ञान, इतने ऊंचे गंभीर सात्विक उपदेश हैं, जो व्यक्ति को नीची दशा से उठाकर देवताओं के स्थान में बैठा देने की शक्ति रखते हैं। गीता का लक्ष्य मनुष्य को कर्तव्य का बोध कराना है।

दुनिया के किसी भी धर्म-दर्शन में पूर्वजन्म या पुनर्जन्म की स्पष्ट व्याख्या नहीं मिलती। सिर्फ हिंदू सनातन धर्म-दर्शन में ही पूर्व और पुनर्जन्म पर चर्चा की गई है। व्यावहारिक रूप में देखें तो सिर्फ हमारी व्यवस्था में ही हम एक ही जन्म में तीन जन्मों की चर्चा करते हैं। इसके पीछे हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित सत्कर्म की शिक्षा ही है। श्रीकृष्ण ने गीता में आत्मा के अजर-अमर होने और निष्काम फल की शिक्षा दी है।

 

फलित ज्योतिष में जातक की कुंडली के लग्न से वर्तमान जन्म, नवम् भाव से पिछले जन्म व पंचम् भाव से अगले जन्म का फलित जाना जाता है। कुंडली में ग्रहों की स्थितियां और दशाएं पिछले जन्म में संचित कर्मों के आधार पर प्रारब्ध के रूप में मिलती हैं। प्रारब्ध के आधार पर ही वर्तमान जन्म में उत्थान या पतन होता है। ईश्वर ने 84 लाख योनियों में सिर्फ  मनुष्य को ही यह विशेषाधिकार दिया है कि वह वर्तमान जन्म में सत्कर्म कर प्रारब्ध में मिले दुष्कर्मों के प्रभाव को कम करे व आने वाले जन्म को व्यवस्थित करे।

श्रीकृष्ण-अर्जुन के संवाद के 18 अध्याय अर्जुन विषाद योग, सांख्य योग, कर्म योग, ज्ञान-कर्म-संन्यास योग, कर्म-संन्यास योग, आत्म-संयम योग, ज्ञान-विज्ञान योग, अक्षर ब्रह्म योग, विद्याराजगुह्य योग, विभूति योग, विश्व रूप-दर्शन योग, भक्ति योग, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग, गुणत्रय विभाग योग, पुरुषोत्तम योग, देवासुर संपद्विभाग योग, श्रद्धात्रय विभाग योग और मोक्ष संन्यास योग में बांटे गए हैं।

 

इन अध्यायों के पढऩे या सुनने से ही पूर्वजन्मों के पापों से मुक्ति पाने के प्रसंग पद्मपुराण में वर्णित हैं। अत: मनुष्य को अंतिम समय में गीता सुनाई जाती है।

गीता हमें जीवन जीने की कला सिखाती है। इस श्लोक से ही इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। 'सुख-दु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।' भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- हे अर्जुन! जो भक्ति प्रेमपूर्वक, उत्साह सहित परम रहस्य युक्त गीता को निष्काम भाव से प्रेमपूर्वक मेरे भक्तों को पढ़ाएगा या इसका प्रचार करेगा, वह निश्चित ही मुझे ही प्राप्त करेगा। न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है और न उससे बढ़कर मेरा अत्यंत प्यारा पृथ्वी पर दूसरा कोई होगा। हे अर्जुन! जो पुरुष इस धर्ममय गीताशास्त्र को पढ़ेगा उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊंगा।

हम बड़े भाग्यवान हैं कि इस संसार के घोर अंधकार से भरे घने मार्ग में गीता के रूप में प्रकाश दिखाने वाला यह धर्मदीप प्राप्त हुआ है। अत: हमारा भी यह धर्म-कर्तव्य है कि हम इसके लाभ को मनुष्य मात्र तक पहुंचाने का सतत् प्रयास करें।

इसी वजह से गीता जयंती का महापर्व मनाया जाता है। गीता जयंती पर जनता-जनार्दन में गीता प्रचार के साथ ही श्रीगीता के अध्ययन, गीता की शिक्षा को जीवन में उतारने की स्थाई योजना बनानी चाहिए।

इसके लिए निम्न कार्य किए जाने चाहिए-

1. श्रीमद्भगवत गीता का पूजन।

2. गीता वक्ता भगवान् श्रीकृष्ण, उसके श्रोता नरस्वरूप भक्त प्रवर अर्जुन तथा उसे महाभारत में ग्रंथित करने वाले भगवान् वेदव्यास का पूजन।

3. गीता का यथा साध्य व्यक्तिगत और सामूहिक परायण।

4.  गीता तत्व को समझाने तथा उसके प्रचार-प्रसार के लिए सभाओं, प्रवचन और गोष्ठियों का आयोजन।

5. विद्यालयों और महाविद्यालयों में गीता पाठ, उस पर व्याख्यान का आयोजन।

6.  गीता ज्ञान संबंधी परीक्षा का आयोजन और उसमें उत्तीर्ण छात्र-छात्राओं को पुरस्कार वितरण।

7.  मंदिर, देवस्थान आदि में श्रीमद्गीता कथा का आयोजन।

8.  गीताजी की शोभायात्रा निकालना आदि।


Sunday, December 23, 2012

भगवान विष्णु के अवतारों खासतौर पर श्रीकृष्ण और श्रीराम के कर्म और मर्यादा के सूत्र हर काल में सुखी जीवन के बेहतर उपाय माने गए हैं।

23 को एकादशी के शुभ योग में मन, वचन, व्यवहार को साधने के लिए यहां भगवान श्रीकृष्ण, श्रीराम के रूप में भगवान विष्णु के ध्यान का सरल मंत्र बताया जा रहा है, जिसका आप अकेले या परिवार, इष्टमित्रों के साथ बैठकर भी ध्यान करें तो मनचाहे काम जल्द बनने के साथ तनाव, दबाव व परेशानी से मुक्त जीवन का सुख भी उठा पाएंगे।

 एकादशी के दौरान यथासंभव हर दिन भगवान विष्णु की गंध, चंदन, पीले फूल, नैवेद्य अर्पित कर सुगंधित धूप व दीप जलाकर इस आसान मंत्र का जप करें -

अच्युतं केशवम् रामनारायणम्
कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिम्
श्रीधरं माधवं गोपिका वल्लभम्
जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे

- मंत्र जप या भजन के बाद विष्णु आरती कर प्रसाद जरूर ग्रहण करें।

हिंदू पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 23 दिसंबर, रविवार को है। महाभारत के अनुसार जब कौरवों व पांडवों में युद्ध प्रारंभ होने वाला था। तब अर्जुन ने कौरवों के साथ भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि श्रेष्ठ महानुभावों को देखकर तथा उनके प्रति स्नेह होने पर युद्ध करने से इंकार कर दिया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था जिसे सुन अर्जुन ने न सिर्फ महाभारत युद्ध में भाग लिया अपितु उसे निर्णायक स्थिति तक पहुंचाया।
गीता को आज भी हिंदू धर्म में बड़ा ही पवित्र ग्रंथ माना जाता है। गीता के माध्यम से ही श्रीकृष्ण ने संसार को धर्मानुसार कर्म करने की प्रेरणा दी। वास्तव में यह उपदेश भगवान श्रीकृष्ण कलयुग के मापदंड को ध्यान में रखते हुए ही दिया है। कुछ लोग गीता को वैराग्य का ग्रंथ समझते हैं जबकि गीता के उपदेश में जिस वैराग्य का वर्णन किया गया है वह एक कर्मयोगी का है। कर्म भी ऐसा हो जिसमें फल की इच्छा न हो अर्थात निष्काम कर्म।
गीता में यह कहा गया है कि निष्काम काम से अपने धर्म का पालन करना ही निष्कामयोग है। इसका सीधा का अर्थ है कि आप जो भी कार्य करें, पूरी तरह मन लगाकर तन्मयता से करें। फल की इच्छा न करें। अगर फल की अभिलाषा से कोई कार्य करेंगे तो वह सकाम कर्म कहलाएगा। गीता का उपदेश कर्मविहिन वैराग्य या निराशा से युक्त भक्ति में डूबना नहीं सीखाता वह तो सदैव निष्काम कर्म करने की प्रेरणा देता है।

Saturday, December 22, 2012

श्रीकृष्ण चरित्र कर्म से सफलता की प्रेरणा देता है। यही नहीं श्रीमद्भगदगीता  के मुताबिक स्वाभाविक कर्तव्यों व कामों को पूरा करते चले जाना भी भगवान की पूजा  की तरह है। कई क्षेत्रों में ऐसे कामकाजी लोग हैं जो इन कर्तव्यों के चलते ही विशेष त्योहार व उत्सवों पर घर से दूर होते हैं या इष्ट की पूजा का बेहद कम वक्त निकाल पाते हैं।

श्रीकृष्ण को इष्ट मानने वाले कामकाजी लोगों के लिए ही यहां बताए जा रहे हैं श्रीकृष्ण पूजा के 5 सरल उपाय खासतौर पर एकादशी तिथि पर भक्ति और आस्था से अपनाएं तो हर परेशानी से छुटकारा मिलता है।
- बालकृष्ण की मृर्ति या तस्वीर पर केसर या पीला चंदन, फूल या हार चढ़ाएं। यथासंभव पूजा के पहले स्नान करें।
- तुलसी के पत्ते चढ़ाएं।
- फल चढ़ाएं। मिठाई (शक्कर भी) नैवेद्य के रूप में चढ़ाएं।
- अगरबत्ती व दीपक लगाकर आरती करें।
- इस बेहद सरल कृष्ण मंत्र को बोल कर्मयोगी भगवान कृष्ण से पूजा हर काम में सफलता की कामना करें -
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

हिन्दू धर्म परंपराओं में एकादशी तिथि भगवान विष्णु व उनके अवतारों की उपासना का शुभ दिन माना जाता है। श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना गया है। श्रीमद्भगवतगीता में श्रीकृष्ण को 'भगवान' पुकारा गया है। पुराणों के मुताबिक श्री और ऐश्वर्य भी भगवान की छ: शक्तियों में शामिल है।

यही वजह है कि खासतौर पर धन कामना पूरी करने के लिए एकादशी की घड़ी में कुछ खास व असरदार कृष्ण मंत्र बोलना धनलाभ देने वाले माने गए हैं।

- ॐ श्रीं नमः श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा

- ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीकृष्णाय गोविंदाय गोपीजन वल्लभाय श्रीं श्रीं श्रीं

- लीलादंड गोपीजनसंसक्तदोर्दण्ड बालरूप मेघश्याम भगवन विष्णो स्वाहा


Friday, December 21, 2012


मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी का व्रत किया जाता है। इस बार 23 दिसंबर, रविवार को यह व्रत है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था, जो मोक्ष प्रदान करता है। इसी कारण इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहते हैं। इसकी विधि इस प्रकार है-

मोक्षदा एकादशी (23 दिसंबर, रविवार) के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। इसके पश्चात शौच आदि से निवृत्त होकर शुद्ध जल से स्नान करें। इसके पश्चात धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह चीजों से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करें और रात को दीपदान करें। रात में सोए नहीं। सारी रात भजन-कीर्तन आदि करना चाहिए।

जो कुछ पहले जाने-अनजाने में पाप हो गए हों, उनकी क्षमा माँगनी चाहिए। सुबह पुन: भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करें व योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथा संभव दान देने के पश्चात ही स्वयं भोजन करें। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस व्रत का फल हजारों यज्ञों से भी अधिक है। रात्रि को भोजन करने वाले को उपवास का आधा फल मिलता है जबकि निर्जल व्रत रखने वाले का माहात्म्य तो देवता भी वर्णन नहीं कर सकते।

धर्म ग्रंथों में मिले वर्णन करने के भगवान श्रीकृष्ण की 16108  रानियां थी। उनमें से प्रमुख आठ पटारानियां थी। जिनके नाम इस प्रकार है रुक्मिणी,सत्यभामा,जाम्बवंती,सत्या,कालिंदी,लक्ष्मणा, मित्रविन्दा। इन आठों पटरानियों से श्रीकृष्ण के दस-दस पुत्र थे जिनके नाम इस प्रकार हैं......

 

रुक्मिणी: प्रधुम्न, चारुदेष्ण, सुदेष्ण, चारुदेह, सुचारू, चरुगुप्त, भद्रचारू, चारुचंद्र, विचारू और चारू।

 

 

जाम्बवंती: साम्ब, सुमित्र, पुरुजित, शतजित, सहस्त्रजित, विजय, चित्रकेतु, वसुमान, द्रविड़ और क्रतु।

 

सत्या: वीर, चन्द्र, अश्वसेन, चित्रगु, वेगवान, वृष, आम, शंकु, वसु और कुन्ति।

कालिंदी: श्रुत, कवि, वृष, वीर, सुबाहु, भद्र, शांति, दर्श, पूर्णमास और सोमक।

मित्रविन्दा: वृक, हर्ष, अनिल, गृध्र, वर्धन, अन्नाद, महांस, पावन, वह्नि और क्षुधि।

 

लक्ष्मणा: प्रघोष, गात्रवान, सिंह, बल, प्रबल, ऊध्र्वग, महाशक्ति, सह, ओज और अपराजित।

 

भद्रा: संग्रामजित, वृहत्सेन, शूर, प्रहरण, अरिजित, जय, सुभद्र, वाम, आयु और सत्यक।

सत्यभामा: भानु, सुभानु, स्वरभानु, प्रभानु, भानुमान, चंद्रभानु, वृहद्भानु, अतिभानु, श्रीभानु और प्रतिभानु।


ईश्वरीय सत्ता को मानने वाले हर धर्मावलंबी के लिए ईश्वर से जुडऩे के लिए ज्ञान और कर्म के अलावा एक ओर आसान उपाय बताया गया है। यह तरीका है - भक्ति। भक्ति का मार्ग न केवल ज्ञान और कर्म की तुलना में आसान माना गया है, बल्कि भक्ति के जो रूप बताए गए हैं, वह व्यावहारिक जीवन में अपनाना हर उस इंसान के लिए संभव है, जो देव कृपा से जीवन में सुख और शांति की कामना रखता है।
हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगदगीता में लिखी बात भक्ति के 9 रूप उजागर करती है -
श्रवणं कीर्तनं विष्णों: स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्य्रमात्मनिवेदनम्।।
इसमें भगवान की भक्ति के 9 रूप श्रवण यानी सुनकर, कीर्तन, स्मरण, चरणसेवा, पूजन-अर्चन, वन्दना, दास भाव, सखा भाव और समर्पण भाव को बहुत ही शुभ बताया गया है।
यही नहीं भक्ति के इन 9 रास्तों से जिन भक्तों ने भगवान की कृपा पाई, उनके नाम भी धर्मग्रंथों में मिलते हैं। जानिए  उन 9 विलक्षण और महान भक्तों के नाम उनके द्वारा अपनाए भक्ति के 9 अद्भुत तरीके -
श्रवण - राजा परीक्षित
कीर्तन - श्रीशुकदेवजी
स्मरण - भक्त प्रह्लाद
चरण सेवा - देवी लक्ष्मी
पूजन-अर्चन - राजा पृथु
वन्दना - अक्रूरजी
दास - श्रीहनुमान
सखा या मित्र भाव - अर्जुन
समर्पण - राजा बलि

Wednesday, December 19, 2012


विश्व के किसी भी धर्म या संप्रदाय में किसी भी ग्रंथ की जयंती नहीं मनाई जाती। हिंदू धर्म में भी सिर्फ गीता जयंती मनाने की परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है क्योंकि अन्य ग्रंथ किसी मनुष्य द्वारा लिखे या संकलित किए गए हैं जबकि गीता का जन्म स्वयं श्रीभगवान के श्रीमुख से हुआ है-

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनि:सृता।।

श्रीगीताजी का जन्म धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में मार्गशीर्ष मास में शुक्लपक्ष की एकादशी (इस बार 23 दिसंबर, रविवार) को हुआ था। यह तिथि मोक्षदा एकादशी के नाम से विख्यात है। गीता एक सार्वभौम ग्रंथ है। यह किसी काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिए नहीं अपितु संपूर्ण मानव जाति के लिए हैं। इसे स्वयं श्रीभगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर कहा है इसलिए इस ग्रंथ में कहीं भी श्रीकृष्ण उवाच शब्द नहीं आया है बल्कि श्रीभगवानुवाच का प्रयोग किया गया है।

इसके छोटे-छोटे अठारह अध्यायों में इतना सत्य, ज्ञान व गंभीर उपदेश भरे हैं जो मनुष्यमात्र को नीची से नीची दशा से उठाकर देवताओं के स्थान पर बैठाने की शक्ति रखते हैं।

 

Monday, December 17, 2012

http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=jzKaynWyTmo
"Aaj badhayi hai Vrindavan.....
Bankey bihari ji ne janam liyo hai
kunj bihari ji ne janam liyo hai"