Saturday, August 18, 2012

JAI VISHNU DEVAE NAMHA








JAI SHREE VISHNU DEVAE NAMHA हिन्दू धर्म पंचांग के अधिकमास (18 से शुरू) में भगवान की उपासना के लिए मात्र आहार ही नहीं उसके साथ-साथ रहन-सहन, व्यवहार और इंद्रिय सयंम की भी बड़ी अहमियत हैं। इसलिए देव उपासक को गलत बातों, काम व सोच से दूर रखने के लिए भी उपाय बताए गए है। इनको अपनाने से भगवान विष्णु की भक्ति शक्ति और सफलता के साथ घर-परिवार के खुशहाल बनाने वाली मानी गई है। खासतौर पर विष्णु भक्त व व्रत या उपवास रखने वाले जानिए कि क्या हैं ये सरल उपाय - - पुरुषोत्तम मास की अवधि में उपासक को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। - भूमि पर सोना चाहिए। - भोजन करने के लिए थाली का उपयोग न करते हुए, ढाक या पलाश के पत्तों की बनी पत्तल का उपयोग करना चाहिए। - मासिक धर्म से गुजर रही स्त्री या रजस्वला स्त्री और धर्म विरोधी लोगों की संगति से बचें। - वैष्णव यानी भगवान विष्णु को मानने वालों की सेवा और भोजन कराना चाहिए। - अधिकमास में व्रत करने वाले को भगवान शिव या अन्य देवी देवताओं, ब्राह्मण, वेद, गुरु, गाय, साधु-संत, स्त्री, धर्म की बुराई न करना चाहिए और न सुनना चाहिए। - गाय को घास और दाना खिलाना चाहिए। - वैष्णवों और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये। उनको सोना, चाँदी, गाय, घी, अन्न, कपड़े, बर्तन, जूते-चप्पल, छतरी, गीता-भागवत जैसी धार्मिक पुस्तकों का दान करना चाहिये। - काँसे के बर्तन में 30 मालपुए रखकर ब्राह्मण और वैष्णवों को दान करने को भी बहुत पुण्यकार्य माना जाता है

RADHEY SHYAM HARISH GARG



Friday, August 17, 2012

JAI VISHNU DEVAE NAMHA

ज़िंदगी में कई मौकों पर शरीर, बुद्धि, ज्ञान रूपी ताकत के गलत उपयोग के पीछे मन, बोल और व्यवहार में आया कोई न कोई दोष होता है। इससे थोड़े वक्त के लिए स्वार्थ सिद्ध या फायदा तो होता है, पर यही दोष आखिरकार बड़े कलह, अशांति, दु:ख, हानि और बुरे नतीजों की वजह भी बनता है। इससे तमाम सुख-सुविधाओं के बीच भी मन अशांत और अस्थिर रहता है।


धर्मशास्त्रों में मन और घर में प्रेम और शांति बनाए रखने के लिये ही जगतपालक भगवान विष्णु की भक्ति, सेवा और उपासना का महत्व बताया गया है। विष्णु पूजा मनचाहे सुख व संपन्नता भी देने वाली होती है। खासतौर पर इसके लिये अधिकमास (18 अगस्त से) में विष्णु भक्ति में कुछ मर्यादाओं और नियम-संयम का पालन भी जरूरी बताया गया है। इनसे अनजाने होने वाले धर्म व देव दोष से बचा जा सकता है।सबसे पहले विष्णु पूजा में तन की पवित्रता और स्वच्छता को अपनाएं। शौच के बाद बिना नहाए विष्णु आराधना न करें। बिना दांतों की सफाई किए बिना पूजा-उपासना न करें। गंदे और मैले वस्त्र पहनकर विष्णु पूजा न करें। काले या लाल वस्त्र पहनने के स्थान पर पीले वस्त्र पहन पूजा करें। पूजा के समय उदर या पेट की वायु न छोडें। मासिक धर्म से गुजर रही स्त्री के स्पर्श हो जाने पर स्नान करने के बाद ही विष्णु पूजा करें। शवयात्रा में शामिल होने या शव को छूने के बाद बिना स्नान कर ही विष्णु दर्शन या पूजा न करें।

JAI SHREE KRISHNA

हिन्दू धर्म में अधिकमास यानी पुरुषोत्तम मास पवित्र व पुण्यदायी माना जाता है। इसमें भगवान विष्णु व उनके ही पुरुषोत्तम रूप की भक्ति का महत्व है। शास्त्रों में उजागर किया गया है कि पुरुषोत्तम मास में व्रत-नियम के लिए कैसा रहन-सहन, खान-पान व बोलचाल होना चाहिए। इनका पालन करने से संकल्प शक्ति मजबूत होती है। इससे बुद्धि, विचार, चेतना, ज्ञान और एकाग्रता बढ़ती है। ऐसा माना जाता है कि इस मास में विधिपूर्वक उपासना से भगवान पुरुषोत्तम, जगत पालक श्रीविष्णु और श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न होते हैं। साथ ही विष्णु पत्नी महालक्ष्मी की कृपा से भी सौभाग्य व संतान सहित हर सुख मिलते हैं।

अगर आप भी यशस्वी, सफल, धनवान व खुशकिस्मत बनने की कामना रखते हैं तो भावना व आस्था से इस माह में जगतपालक श्री विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा के शास्त्रों में बताए कुछ आसान व असरदार उपाय स्वयं करें या किसी विद्वान ब्राह्मण से करवाएं।ऊँ न
मो भगवते वासुदेवाय इस बारह अक्षरों वाले महामंत्र का हर रोज जप करें। कलश स्थापना कर अखण्ड दीप पूरे अधिकमास में जलाएं।तुलसी के पत्तों पर ऊँ या श्रीकृष्ण चन्दन से लिखकर भगवान शालिग्राम शिला पर अर्पित करना चाहिए। श्रीकृष्ण, श्रीशालग्राम शिला की हर रोज पंचामृत(दूध, दही, शहद, शक्कर व घी)से पूजा करें।
श्रीमद्भागवतपुराण, श्रीमद्भगवदगीता का पाठ करना या सुनना चाहिए।
सुबह सूर्योदय से पहले उठकर नित्यकर्म, दातुन व स्नान कर भगवान विष्णु की षोडशोपचार पूचा यानी सोलह पूजा उपायों व सामगियों से भगवान की पूजा करनी चाहिएइस मास में घर, मंदिर, तीर्थ और पवित्र देवस्थानों में भगवान विष्णु की पूजा के साथ ही व्रत-उपवास, दान, पुण्य, पूजा, कथा कीर्तन और जागरण करना चाहिए। इस तरह पूरे पुरुषोत्तम मास में संभव हो तो हर रोज धार्मिक आचरण करने से जीवन तनावों से दूर होता है, मन, शांत और चित्त की चंचलता नहीं रहती। इससे जीवन को नए तरीके और सोच से जीने की राह दिखाई देती है। इसलिए जीवन को पतन से बचाने और आत्म अनुशासन पाने के लिए धर्म का मार्ग सबसे सरल है।

jai gaU MATA

कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के 'गोरक्षा-सम्मेलन' मेँ भाषण देते हुए नामधारी सिख-सम्प्रदायके सद्गुरु महाराज श्रीजगजीतसिँहजी ने गोमाता के द्वारा प्रत्यक्ष प्रकट होकर एक मुसलमान सज्जनकी प्राण रक्षा की अद्भुत घटना सुनायी थी । जब महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध वारकरी-संप्रदाय के सत्य पूज्य श्रीकृष्णगोपाल वानखड़े गुरुजी महाराज कृपापूर्वक मेरे यहाँ पिलखुवा पधारे तो मैँने वह घटना उनको सुनायी । वे इसे सुनकर बड़े प्रभावित हुए और स्वयं भैनी साहब जाकर महाराज श्रीजगजीतसिँहजी से मिले और पूरी घटना उनसे सुनकर मुझे लिखकर भिजवायी । वही यहाँ प्रकाशित है-



तपामंडी तहसील वरनाला जिला संगरुर मेँ एक मुसलमान सज्जन रहते थे, जो गोमाता के बड़े भक्त थे । उन्हीँके जीवन की यह सत्य घटना है । सन् 1947 मेँ हिँदुस्तान-पाकिस्तान के बँटवारे के समय जब समस्त देश मेँ भयंकर मार-काट मच रही थी तो उस समय घोर भयंकर विपत्तिके समय मेँ उन मुसलमान सज्जन के प्राणोँकी रक्षा गोमाता ने स्वयं प्रकट होकर कैसे अद्भुत ढ़ंगसे की, इसके संबंधमेँ स्वयं उन मुसलमान सज्जन ने सद्गुरु महाराज श्रीजगजीतसिँहजी को सुनाते हुए बताया-



सन् 1947 से कुछ दिनोँ पूर्व की बात है कि कुछ मुसलमान कसाई बूचड़ोँ को मैँने एक बहुत दुबली-पतली गाय ले जाते देखा । वे उसे काटने के लिए ले जा रहे थे । मुझे उस गाय को देखकर बड़ी दया आयी और मैँने उनसे वह गाय मोल देने के लिए कहा । उन कसाइयोँ ने मुझसे उस गाय के दाम बीस रुपये माँगे । मेरे पास उस समय बीस रुपये थे नहीँ । मैँ बड़ा गरीब आदमी था; फिर भी मैने गाय के प्राण बचाने की सोची और मैँने अपने घरपर जाकर अपनी भौजाई से एक सोने की चीज ली । उसे गिरवी रखकर बीस रुपये प्राप्त किये और वह गाय उनसे खरीद ली । मैँने कसाइयोँ के हाथोँ से बचायी गयी उस गाय को अपने घर पर नहीँ रखा; क्योँकि मैँने यह काम घरवालोँ से बिना पूछे चोरी से किया था । जब वह गाय ब्यायी तो अपने घरपर लानेपर दूध के लालच से किसीने भी इनकार नहीँ किया । कुछ सालतक उस गाय को अपने पास रखकर फिर उसे मैँने ऐसी जगहपर बेच दिया कि जहाँ फिर उसको किसी प्रकार का कष्ट न हो और उसके जीवन को किसी प्रकार का भी खतरा न हो ।



सन् 1947 मेँ हिँदुस्तान-पाकिस्तानका बँटवारा हुआ तो सभी को यह मालूम है कि उस समय एक बहुत बड़ा कत्लेआम हुआ था और उस समय हिँदू-मुसलमान एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गये थे । मुसलमानोँने हिँदुओँको और हिँदुओँने मुसलमानोँको मारा-काटा था । हम मुसलमान वहाँ पर थोड़ी संख्यामेँ थे तो जब हमपर हमला हुआ तो हम हिन्दुओँके उस हमले से डरकर एक मकान के अंदर घुस गये और अंदर से उस मकान की साँकल लगा दी । लोगोँने मकानको घेरकर उसमेँ आग लगा दी । मकान मेँ आग लगी देखकर सब लोग एकदमसे बाहर निकल गये । सिर्फ मैँ ही अकेला उस मकानके अंदर रह गया, मकान धुएँ से भर गया । मकान के चारोँ ओर आग लगी थी । अब तो मैँ बड़ा घबराया कि अब मेरे प्राणोँ की रक्षा इस समय कैसे होगी ? अकस्मात मैँ उस समय क्या देखता हूँ कि जिस गाय को मैँने कुछ दिनोँ पूर्व मुसलमान कसाइयोँ के हाथोँ से बचाया था, ठीक उसी प्रकार की और ठीक उसी रंग की गाय की पूँछ मेरे सामने घूमने लगी और अपनी पूँछ से उस धूएँ से और उस आग से मेरी बराबर रक्षा करती रही । फिर जब आतंक समाप्त हुआ तो मैँ उस गाय की कृपा से अग्नि के बीच से जीवित निकल आया ।



यह है हमारी पूजनीया गोमाता की भक्ति का महान आश्चर्यजनक अद्भुत चमत्कार ।


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Thursday, August 16, 2012

SHYAM PREM

अमूल्य श्याम प्रेम का मूल्य केवल अविरल अश्रुधारा ही है. और कोई साधन नहीं है जो प्रिय-प्रियतम को प्रसन्न कर सके. अपने आपको साधनहीन स्वीकार करते हुये करुण क्रन्दन बस यही जन्माष्टमी पर उनको प्रसन्न करने का एक मात्र उपाय है और यही उनकी प्राप्ति का सर्वसुगम सर्वश्रेष्ठ साधन है.

सब अवतार मधुर गोविन्द राधे,
कृष्ण लीला मधुरातिमाधुर बता दे.

भगवान का जब सगुण साकार अवतार होता है तो अपने नाम, रूप, लीला, गुण, धाम यह वह छोड़ जाते है जिसका अवलंब लेकर अनन्तानन्त जीव भगवान के प्रेमानंद को प्राप्त होते है उदारहर्नाथ अगर श्री कृष्ण का अवतार न होता तो शुकदेव श्री कृष्ण के लिये व्याकुल न होते. भागवत को सुना और परीक्षित को सुनाया. बिना सगुण साकार अवतार लिये भगवान के सगुण नाम, रूप, लीला, धाम का विस्तार हमको न मिलता. और बिना इसके प्राप्त हुये घोर मायाबध जीव किस प्रकार भगवत्प्राप्ति करते इसलिये जीव कल्याण के लिये ही भगवान का अवतार होता है.

ॐविष्णुíवष्णुíवष्णु:अद्य
शर्वरीनामसंवत्सरेसूर्येदक्षिणायनेवर्षतरैभाद्रपदमासेकृष्णपक्षेश्रीकृष्णजन्माष्टम्यांतिथौभौमवासरेअमुकनामाहं(अमुक
की जगह अपना नाम बोलें) मम चतुर्वर्गसिद्धिद्वारा
श्रीकृष्णदेवप्रीतयेजन्माष्टमीव्रताङ्गत्वेनश्रीकृष्णदेवस्ययथामिलितोपचारै:पूजनंकरिष्ये।

RADHEY RADHEY

JAI TULSI MAA

शालग्राम शिला भगवान विष्णु का साक्षात स्वरूप मानी जाती है। इसलिए जहां शालग्राम शिला होती है, वह स्थान तीर्थ के समान पुण्यदायी माना गया है। यही नहीं शालग्राम शिला और भगवती स्वरूपा तुलसी का योग तो सारे अभाव, कलह और संताप का अंत करने वाला माना गया है।

यही वजह है कि हिन्दू पंचांग की हर एकादशी पर शालग्राम-तुलसी उपासना ज्ञान, धन, स्वास्थ्य, विद्या, प्रतिष्ठा, यश सहित किसी भी अभाव का अंत करने वाली मानी गई है।

जीवन में ऐसे ही मंगल के लिए शास्त्रों में ऐसे भी छोटे-छोटे उपाय बताए गए हैं, जिनसे शालग्राम व तुलसी उपासना एक ही साथ हो जाती है। इनमें ही एक उपाय है शालग्राम शिला को स्नान कराकर तुलसी दल विशेष मंत्र से अर्पित करना और चरणामृत ग्रहण करना। जानिए यह विशेष मंत्र-

- शालग्राम शिला को पवित्र स्थान या पात्र में रखकर पवित्र जल से स्नान या अभिषेक कराकर साफ वस्त्र से पोंछकर नियत स्थान पर विराजित करें। केसरिया चंदन, सुगंधित फूल चढ़ाकर पूजा करें, मिठाई का भोग लगाकर नीचे लिखे तुलसी मंत्र से तुलसी दल शालग्राम को अर्पित करें -

तुलसी हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम्।

भवमोक्षप्रदां तुभ्यमर्पयामि हरिप्रियाम्।।

- तुलसी दल चढ़ाने के बाद शालग्राम या विष्णु भगवान की धूप, दीप व कर्पूर आरती कर खुशहाल जीवन की कामना करें।

♥♥♥ जय जय श्री कृष्ण ♥♥♥

मोहन से दिल क्यूँ लगाया है, यह मैं जानू या वो जाने ।
छलिया से दिल क्यूँ लगाया है, यह मैं जानू या वो जाने ॥

हर बात निराली है उसकी, कर बात में है इक टेडापन ।
टेड़े पर दिल क्यूँ आया है, यह मैं जानू या वो जाने ॥

जितना दिल ने तुझे याद किया, उतना जग ने बदनाम किया ।
बदनामी का फल क्या पाया हैं, यह मैं जानू या वो जाने ॥

तेरे दिल ने दिल दीवाना किया, मुझे इस जग से बेगाना किया ।
मैंने क्या खोया क्या पाया हैं, यह मैं जानू या वो जाने ॥

मिलता भी है वो मिलता भी नहीं, नजरो से मेरी हटता भी नहीं ।
यह कैसा जादू चलाया है, यह मैं जानू या वो जाने ॥

MAKHAN CHOR

भगवान की माखनचोरी का रहस्य :
जब भगवान श्रीकृष्ण छोटे थे, तो सभी गोपियों का हृदय उन्हे लाड लडाने के लिये आतुर रहता था. उनका मन करता कि गोपाल को माखन खिलायें. एक दो बार तो वो नन्दभवन मे जा के कन्हैया को माखन खिला आयीं, पर रोज - रोज जाना शायद नन्दरानी को अच्छा न लगे. उनके यहाँ तो लाखों गायें हैं, और दधि और माखन तो उनके घर मे भरा ही रहता है. तो नन्दरानी यह भी कह सकती हैं, कि बहन माखन तो हमारे यहाँ पहल
े से ही है, तुम क्यों रोज - रोज कष्ट करती हो? ऐसा सोच कर, मन मसोस कर सब की सब अपने घरों मे ही रहीं. कन्हैया को अपने घर का माखन न खिला पाने से उनके आकुल हृदय मे बड़ी वेदना होने लगी.
भक्तवत्सल भगवान का प्रण है कि जो भी मुझे प्रेम से, चाहे फल, फूल, पत्ती या फिर जल ही अर्पित करे, तो मैं बडे प्रेम से उसे ग्रहण करता हूँ. वो जान गये कि गोप- मातायें मुझे लाड लडाने के लिये और माखन खिलाने के लिये अधीर हैं. उन्होने सोचा कि मैं कौन सा ऐसा कार्य करूँ, जिस से इन वात्सल्यमयी गोपियों को अपूर्व आनन्द मिले?
तो भगवान चोरी से उनके यहाँ जा के माखन खाने लगे.
चोरी से ही क्यों? जा के मांग के भी तो खा सकते थे?
तो उत्तर ये है, कि अपने घर मे कोई चीज अगर बहुतायत मे हो, और किसी और के घर जा के वही चीज मांगें, तो इस का अर्थ है कि दूसरे के यहाँ की चीज अपनी चीज से उत्तम है. और अगर अपने यहाँ कोई चीज बहुतायत मे होते हुए भी, अगर दूसरे के घर मे उसी चीज के लिये चोरी करें, तो इसका मतलब है कि दूसरे के यहाँ की चीज हमारी चीज से उत्तम ही नहीं, बल्कि हमारे लिये अनमोल है, हमें उस चीज की अत्यधिक चाह है, हम उस के बिना रह नहीं सकते, हमारे लिये वो चीज अमूल्य है, तभी तो हम उसे चुरा रहे हैं.
इसी लिये उन वात्सल्यप्रेममयी गोपियों के घर मे हमारे नन्दनन्दन चोरी कर के माखन खाते थे. और बिना कहे ही कहते थे, कि मैया तेरा माखन खाये बिना मुझे चैन नहीं पडता.

पुरुषोत्तम व मल मास

हिंदू पंचांग के अनुसार विक्रम संवत् 2069 में (सन् 2012) भाद्रपद नामक अधिकमास है। यह अधिक मास 18 अगस्त, शनिवार को प्रारंभ होगा जो 16  सितंबर, रविवार तक रहेगा। धर्म ग्रंथों में इसे पुरुषोत्तम व मल मास भी कहा गया है। इस महीने में भगवान विष्णु का पूजन करने का विशेष महत्व है।

ज्योतिषियों के अनुसार इस बार सूर्य की सिंह संक्रांति में ही भाद्रपद की दो अमावस्याएं व्यतीत हो जाएंगी। पहली अमावस्या के बाद दूसरी अमावस्या तक का मास श्रीपुरुषोत्तम मास होगा। इस प्रकार 2012 में दो भाद्रपद मास होंगे।

क्यों आता है अधिक मास?

32 महीने, 16 दिन, 1 घंटा 36 मिनट के अंतराल से हर तीसरे साल अधिक मास आता है। ज्योतिष में चंद्रमास 354 दिन व सौरमास 365 दिन का होता है। इस कारण हर साल 11 दिन का अंतर आता है जो 3 साल में एक माह से कुछ ज्यादा होता है। चंद्र और सौर मास के अंतर को पूरा करने के लिए धर्मशास्त्रों में अधिक मास की व्यवस्था की है।

क्या रहेगा प्रभाव?

ज्योतिषियों के अनुसार जिस वर्ष भाद्रपद का अधिक मास होता है उस वर्ष धान की उत्पत्ति बहुत अधिक होती है। फसल अच्छी होने से अर्थ व्यवस्था पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे देश के आर्थिक हालात में सुधार होता है तथा व्यापार-व्यवसाय में भी तेजी रहती है।

हिन्दू धर्म का यह महीना पुरुषोत्तम मास या अधिमास के रूप में प्रसिद्ध है। ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक यह मास 32 माह 16 दिन और चार घड़ी में फिर से आता है। यानी लगभग 3 साल में एक बार। धार्मिक दृष्टि से यह मास भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को समर्पित पुण्यदायी मास है। भगवान श्रीकृष्ण का ही एक नाम पुरुषोत्तम होने से इस मास का नाम पुरुषोत्तम मास कहलाया। करीब 3 साल में आने वाला यह विशेष काल अधिकमास भी कहलाता हैयोतिष विज्ञान के मुताबिक जिस चन्द्रमास में सूर्य की संक्रान्ति नही होती है वह मास अधिमास कहलाता है। सरल शब्दों में अगर चन्द्रमास के दोनों ही पक्षों में सूर्य किसी भी राशि में प्रवेश नहीं करता यानी संक्रमण नहीं करता है, तब वह संक्रमणरहित मास साल के माहों की गिनती में अधिक हो जाता है। इसलिए इसे अधिकमास भी पुकारा जाता है। इस बार इस बार पुरुषोत्तम मास का संयोग भाद्रपद मास से हो रहा है। अधिकमास होने पर एक ही माह को पहला और दूसरा कहकर दो बार गणना की जाती है। यह शुभ संयोग शनिवार (18 अगस्त) से शुरू हो रहा है। शास्त्रों में उल्लेख है कि भाद्रपद और अधिकमास के संयोग के पूरे साठ दिनों में से अधिमास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ कर अधिमास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक अधिमास के भगवान विष्णु व श्रीकृष्ण की भक्ति, सेवा, व्रत-उपवास व दान-पुण्य करने से अक्षय फल व सौभाग्य प्राप्त होते हैं।

♥♥ चलो देख आएं नन्द घर लाला हुआ।
यह तो नन्द जी के कुल का उजाला हुआ॥

देखो सब ग्वाल बाल, चले होके खुशिहाल,
संग बईया गल डाल, नाचे दे दे के ताल।
सब मिलझुल कहें गोप ग्वाला हुआ,
चलो देख आएं नन्द घर लाला हुआ॥

बाजे शंख घड़ेयाल, जनम लीनो गोपाल,
सखी ब्रिज में सब ग्वाल, कहें जय जय गोपाल।
झूले अंगना में पलना है डाला हुआ,
चलो देख आएं नन्द घर लाला हुआ॥

प्रगटे बृज में बृजराज, करने भक्तों के काज,
आया सारा समाज, दर्शन करने को आज।
सुख नैनो को पहुचाने वाला हुआ,
चलो देख आएं नन्द घर लाला हुआ॥

देखो गोकुल की और, कैसे नाच रहे मोर,
छाए बादल घनघोर, बोले पची करे छोर।
बर्षा आनंद की बरसाने वाला हुआ,
चलो देख आएं नन्द घर लाला हुआ॥ ♥♥

Wednesday, August 15, 2012

jai shree bankey bihari ji

श्रीबाँकेबिहारी जी के दर्शन सम्बन्ध में अनेकों कहानियाँ प्रचलित हैं। जिनमें से एक तथा दो निम्नलिखित हैं– एक बार एक भक्तिमती ने अपने पति को बहुत अनुनय–विनय के पश्चात वृन्दावन जाने के लिए राजी किया। दोनों वृन्दावन आकर श्रीबाँकेबिहारी जी के दर्शन करने लगे। कुछ दिन श्रीबिहारी जी के दर्शन करने के पश्चात उसके पति ने जब स्वगृह वापस लौटने कि चेष्टा की तो भक्तिमति ने श्रीबिहारी जी दर्शन लाभ से वंचित होना पड़ेगा, ऐसा सोचकर वो रोने लगी। संसार बंधन के लिए स्वगृह जायेंगे, इसलिए वो श्रीबिहारी जी के निकट रोते–रोते प्रार्थना करने लगी कि– 'हे प्रभु में घर जा रही हुँ, किन्तु तुम चिरकाल मेरे ही पास निवास करना, ऐसा प्रार्थना करने के पश्चात वे दोनों रेलवे स्टेशन की ओर घोड़ागाड़ी में बैठकर चल दिये। उस समय श्रीबाँकेविहारी जी एक गोप बालक का रूप धारण कर घोड़ागाड़ी के पीछे आकर उनको साथ लेकर ले जाने के लिये भक्तिमति से प्रार्थना करने लगे। इधर पुजारी ने मंदिर में ठाकुर जी को न देखकर उन्होंने भक्तिमति के प्रेमयुक्त घटना को जान लिया एवं तत्काल वे घोड़ा गाड़ी के पीछे दौड़े। गाड़ी में बालक रूपी श्रीबाँकेबिहारी जी से प्रार्थना करने लगे। दोनों में ऐसा वार्तालाप चलते समय वो बालक उनके मध्य से गायब हो गया। तब पुजारी जी मन्दिर लौटकर पुन श्रीबाँकेबिहारी जी के दर्शन करने लगे।
इधर भक्त तथा भक्तिमति श्रीबाँकेबिहारी जी की स्वयं कृपा जानकर दोनों ने संसार का गमन त्याग कर श्रीबाँकेबिहारी जी के चरणों में अपने जीवन को समर्पित कर दिया। ऐसे ही अनेकों कारण से श्रीबाँकेबिहारी जी के झलक दर्शन अर्थात झाँकी दर्शन होते हैं।

jai shree bankey bihari ji

श्री बाँकेबिहारी जी का संक्षिप्त इतिहास

श्रीधाम वृन्दावन, यह एक ऐसी पावन भूमि है, जिस भूमि पर आने मात्र से ही सभी पापों का नाश हो जाता है। ऐसा आख़िर कौन व्यक्ति होगा जो इस पवित्र भूमि पर आना नहीं चाहेगा तथा श्री बाँकेबिहारी जी के दर्शन कर अपने को कृतार्थ करना नही चाहेगा। यह मन्दिर श्री वृन्दावन धाम के एक सुन्दर इलाके में स्थित है। कहा जाता है कि इस मन्दिर का निर्माण स्वामी श्री हरिदास जी के वंशजो के सामूहिक प्रयास से संवत १९२१ के लगभग किया गया।
मन्दिर निर्माण के शुरूआत में किसी दान-दाता का धन इसमें नहीं लगाया गया। श्रीहरिदास स्वामी विषय उदासीन वैष्णव थे। उनके भजन–कीर्तन से प्रसन्न हो निधिवन से श्री बाँकेबिहारीजी प्रकट हुये थे। स्वामी हरिदास जी का जन्म संवत 1536 में भाद्रपद महिने के शुक्ल पक्ष में अष्टमी के दिन वृन्दावन के निकट राजापुर नामक गाँव में हूआ था। इनके आराध्यदेव श्याम–सलोनी सूरत बाले श्रीबाँकेबिहारी जी थे। इनके पिता का नाम गंगाधर एवं माता का नाम श्रीमती चित्रा देवी था। हरिदास जी, स्वामी आशुधीर देव जी के शिष्य थे। इन्हें देखते ही आशुधीर देवजी जान गये थे कि ये सखी ललिताजी के अवतार हैं तथा राधाष्टमी के दिन भक्ति प्रदायनी श्री राधा जी के मंगल–महोत्सव का दर्शन लाभ हेतु ही यहाँ पधारे है। हरिदासजी को रसनिधि सखी का अवतार माना गया है। ये बचपन से ही संसार से ऊबे रहते थे। किशोरावस्था में इन्होंने आशुधीर जी से युगल मन्त्र दीक्षा ली तथा यमुना समीप निकुंज में एकान्त स्थान पर जाकर ध्यान-मग्न रहने लगे। जब ये 25 वर्ष के हुए तब इन्होंने अपने गुरु जी से विरक्तावेष प्राप्त किया एवं संसार से दूर होकर निकुंज बिहारी जी के नित्य लीलाओं का चिन्तन करने में रह गये। निकुंज वन में ही स्वामी हरिदासजी को बिहारीजी की मूर्ति निकालने का स्वप्नादेश हुआ था। तब उनकी आज्ञानुसार मनोहर श्यामवर्ण छवि वाले श्रीविग्रह को धरा को गोद से बाहर निकाला गया। यही सुन्दर मूर्ति जग में श्रीबाँकेबिहारी जी के नाम से विख्यात हुई यह मूर्ति मार्गशीर्ष, शुक्ला के पंचमी तिथि को निकाला गया था। अतः प्राकट्य तिथि को हम विहार पंचमी के रूप में बड़े ही उल्लास के साथ मानते है।
श्री बाँकेबिहारी जी निधिवन में ही बहुत समय तक स्वामी जी द्वारा सेवित होते रहे थे। फिर जब मन्दिर का निर्माण कार्य सम्पन्न हो गया, तब उनको वहाँ लाकर स्थापित कर दिया गया। सनाढय वंश परम्परागत श्रीकृष्ण यति जी, बिहारी जी के भोग एवं अन्य सेवा व्यवस्था सम्भाले रहे। फिर इन्होंने संवत 1975 में हरगुलाल सेठ जी को श्रीबिहारी जी की सेवा व्यवस्था सम्भालने हेतु नियुक्त किया। तब इस सेठ ने वेरी, कोलकत्ता, रोहतक, इत्यादि स्थानों पर श्रीबाँकेबिहारी ट्रस्टों की स्थापना की। इसके अलावा अन्य भक्तों का सहयोग भी इसमें काफी सहायता प्रदान कर रहा है। आनन्द का विषय है कि जब काला पहाड़ के उत्पात की आशंका से अनेकों विग्रह स्थानान्तरित हुए। परन्तु श्रीबाँकेविहारी जी यहां से स्थानान्तरित नहीं हुए। आज भी उनकी यहां प्रेम सहित पूजा चल रही हैं। कालान्तर में स्वामी हरिदास जी के उपासना पद्धति में परिवर्तन लाकर एक नये सम्प्रदाय, निम्बार्क संप्रदाय से स्वतंत्र होकर सखीभाव संप्रदाय बना। इसी पद्धति अनुसार वृन्दावन के सभी मन्दिरों में सेवा एवं महोत्सव आदि मनाये जाते हैं। श्रीबाँकेबिहारी जी मन्दिर में केवल शरद पूर्णिमा के दिन श्री श्रीबाँकेबिहारी जी वंशीधारण करते हैं। केवल श्रावन तीज के दिन ही ठाकुर जी झूले पर बैठते हैं एवं जन्माष्टमी के दिन ही केवल उनकी मंगला–आरती होती हैं । जिसके दर्शन सौभाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त होते हैं । और चरण दर्शन केवल अक्षय तृतीया के दिन ही होता है । इन चरण-कमलों का जो दर्शन करता है उसका तो बेड़ा ही पार लग जाता है। स्वामी हरिदास जी संगीत के प्रसिद्ध गायक एवं तानसेन के गुरु थे। एक दिन प्रातःकाल स्वामी जी देखने लगे कि उनके बिस्तर पर कोई रजाई ओढ़कर सो रहा हैं। यह देखकर स्वामी जी बोले– अरे मेरे बिस्तर पर कौन सो रहा हैं। वहाँ श्रीबिहारी जी स्वयं सो रहे थे। शब्द सुनते ही बिहारी जी निकल भागे। किन्तु वे अपने चुड़ा एवं वंशी, को विस्तर पर रखकर चले गये। स्वामी जी, वृद्ध अवस्था में दृष्टि जीर्ण होने के कारण उनकों कुछ नजर नहीं आय । इसके पश्चात श्री बाँकेबिहारीजी मन्दिर के पुजारी ने जब मन्दिर के कपाट खोले तो उन्हें श्री बाँकेविहारीजी मन्दिर के पुजारी ने जब मन्दिर में कपट खोले तो उन्हें श्रीबाँकेबिहारी जी के पलने में चुड़ा एवं वंशी नजर नहीं आयी। किन्तु मन्दिर का दरवाजा बन्द था। आश्चर्यचकित होकर पुजारी जी निधिवन में स्वामी जी के पास आये एवं स्वामी जी को सभी बातें बतायी। स्वामी जी बोले कि प्रातःकाल कोई मेरे पंलग पर सोया हुआ था। वो जाते वक्त कुछ छोड़ गया हैं। तब पुजारी जी ने प्रत्यक्ष देखा कि पंलग पर श्रीबाँकेबिहारी जी की चुड़ा–वंशी विराजमान हैं। इससे प्रमाणित होता है कि श्रीबाँकेबिहारी जी रात को रास करने के लिए निधिवन जाते हैं।
इसी कारण से प्रातः श्रीबिहारी जी की मंगला–आरती नहीं होती हैं। कारण–रात्रि में रास करके यहां बिहारी जी आते है। अतः प्रातः शयन में बाधा डालकर उनकी आरती करना अपराध हैं। स्वामी हरिदास जी के दर्शन प्राप्त करने के लिए अनेकों सम्राट यहाँ आते थे। एक बार दिल्ली के सम्राट अकबर, स्वामी जी के दर्शन हेतु यहाँ आये थे। ठाकुर जी के दर्शन प्रातः 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक एवं सायं 6 बजे से रात्रि 6 बजे तक होते हैं। विशेष तिथि उपलक्ष्यानुसार समय के परिवर्तन कर दिया जाता हैं।