Wednesday, November 14, 2012
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (इस बार 14 नवंबर, बुधवार) के दिन पर्वतराज गोवर्धन की पूजा की जाती है। इसकी कथा इस प्रकार है-
एक समय की बात है भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं, गोप-ग्वालों के साथ गाएं
चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में जा पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि
नाच-गाकर खुशियां मना रही हैं। जब श्रीकृष्ण ने इसका कारण पूछा तो गोपियों
ने कहा कि आज मेघ व देवों के स्वामी इंद्र का पूजन होगा। पूजन से प्रसन्न
होकर वे वर्षा करते हैं, जिससे अन्न पैदा होता है तथा ब्रजवासियों का
भरण-पोषण होता है। तब श्रीकृष्ण बोले- इंद्र में क्या शक्ति है? उससे अधिक
शक्तिशाली तो हमारा गोवर्धन पर्वत है। इसी के कारण वर्षा होती है।
हमें इंद्र से भी बलवान गोवर्धन की ही पूजा करना चाहिए। तब सभी श्रीकृष्ण
की बात मानकर गोवर्धन की पूजा करने लगे। यह बात जाकर नारद ने इंद्र को बता
दी। यह सुनकर इंद्र को बहुत क्रोध आया। इंद्र ने मेघों को आज्ञा दी कि वे
गोकुल में जाकर प्रलय का-सा दृश्य उत्पन्न कर दें। मेघ ब्रज-भूमि पर जाकर
मूसलधार बरसने लगे। इससे भयभीत होकर सभी गोप-ग्वाले श्रीकृष्ण की शरण में
गए और रक्षा की प्रार्थना करने लगे।गोप-गोपियों की पुकार सुनकर श्रीकृष्ण
बोले- तुम सब गोवर्धन-पर्वत की शरण में चलो।
वह सब की रक्षा करेंगे। सब गोप-ग्वाले पशुधन सहित गोवर्धन की तराई में आ
गए। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्ठिïका अंगुली पर उठाकर छाते सा तान
दिया। गोप-ग्वाले सात दिन तक उसी की छाया में रहकर अतिवृष्टिï से बच गए।
सुदर्शन-चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर एक जल की एक बूंद भी नहीं पड़ीा।
यह चमत्कार देखकर ब्रह्मïाजी द्वारा श्रीकृष्णावतार की बात जान कर इंद्र
देव अपनी मूर्खता पर पश्चाताप करते हुए कृष्ण से क्षमा-याचना करने लगे।
श्रीकृष्ण ने सातवें दिन गोवर्धन को नीचे रखा और ब्रजवासियों से कहा कि अब
तुम प्रतिवर्ष गोवर्धन-पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया करो। तभी से यह पर्व
के रूप में प्रचलित है।
कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। इस बार गोवर्धन पूजा का पर्व 14 नवंबर, बुधवार को है। आईए जानते हैं गोवर्धन पूजा का माहात्म्य-
हमारे कृषि प्रधान देश में गोवर्धन पूजा जैसे प्रेरणाप्रद पर्व की अत्यंत आवश्यकता है। इसके पीछे एक महान संदेश पृथ्वी और गाय दोनों की उन्नति तथा विकास की ओर ध्यान देना और उनके संवर्धन के लिए सदा प्रयत्नशील होना छिपा है। अन्नकूट का महोत्सव भी गोवर्धन पूजा के दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को ही मनाया जाता है। यह ब्रजवासियों का मुख्य त्योहार है।
अन्नकूट या गोवर्धन पूजा का पर्व यूं तो अति प्राचीनकाल से मनाया जाता रहा है, लेकिन आज जो विधान मौजूद है वह भगवान श्रीकृष्ण के इस धरा पर अवतरित होने के बाद द्वापर युग से आरंभ हुआ है। उस समय जहां वर्षा के देवता इंद्र की ही उस दिन पूजा की जाती थी, वहीं अब गोवर्धन पूजा भी प्रचलन में आ गई है। धर्मग्रंथों में इस दिन इंद्र, वरुण, अग्नि आदि देवताओं की पूजा करने का उल्लेख मिलता है। उल्लेखनीय है कि ये पूजन पशुधन व अन्न आदि के भंडार के लिए किया जाता है।
बालखिल्य ऋषि का कहना है कि अन्नकूट और गोवर्धन उत्सव श्रीविष्णु भगवान की प्रसन्नता के लिए मनाना चाहिए। इन पर्वों से गौओं का कल्याण होता है, पुत्र, पौत्रादि संततियां प्राप्त होती हैं, ऐश्वर्य और सुख प्राप्त होता है। कार्तिक के महीने में जो कुछ भी जप, होम, अर्चन किया जाता है, इन सबकी फलप्राप्ति हेतु गोवर्धन पूजन अवश्य करना चाहिए।
Sunday, November 11, 2012
दीपावली
के एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन मुख्य रूप से
मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है। इस बार यह पर्व 12 नवंबर,
सोमवार को है। नरक चतुर्दशी का पर्व मनाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं
प्रचलित हैं। उन्हीं में से एक कथा नरकासुर वध की भी है जो इस प्रकार है-
प्रागज्योतिषपुर नगर का राजा नरकासुर नामक दैत्य था। उसने अपनी शक्ति से
इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु आदि सभी देवताओं को परेशान कर दिया। वह संतों को
भी त्रास देने लगा। महिलाओं पर अत्याचार करने लगा। उसने संतों आदि की 16
हजार स्त्रियों को भी बंदी बना लिया। जब उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया तो
देवताओं व ऋषिमुनि भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए।
भगवान श्रीकृष्ण ने
उन्हें नराकासुर से मुक्ति दिलाने का आश्वसान दिया लेकिन नरकासुर को स्त्री
के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा
को सारथी बनाया तथा उन्हीं की सहायता से नरकासुर का वध कर दिया। इस प्रकार
श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर
देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई।
उसी की खुशी में दूसरे
दिन अर्थात कार्तिक मास की अमावस्या को लोगों ने अपने घरों में दीए जलाए।
तभी से नरक चतुर्दशी तथा दीपावली का त्योहार मनाया जाने लगा।
कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहते हैं। इस बार यह पर्व 12 नवंबर, सोमवार को है। इस दिन यमराज के निमित्त पूजा की जाती है। इसकी कथा इस प्रकार है-
जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर दैत्यराज बलि से तीन पग धरती मांगकर तीनों लोकों को नाप लिया तो राजा बलि ने उनसे प्रार्थना की- 'हे प्रभु! मैं आपसे एक वरदान मांगना चाहता हूं। यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो वर देकर मुझे कृतार्थ कीजिए।
तब भगवान वामन ने पूछा- क्या वरदान मांगना चाहते हो, राजन? दैत्यराज बलि बोले- प्रभु! आपने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से लेकर अमावस्या की अवधि में मेरी संपूर्ण पृथ्वी नाप ली है, इसलिए जो व्यक्ति मेरे राज्य में चतुर्दशी के दिन यमराज के लिए दीपदान करे, उसे यम यातना नहीं होनी चाहिए और जो व्यक्ति इन तीन दिनों में दीपावली का पर्व मनाए, उनके घर को लक्ष्मीजी कभी न छोड़ें।
राजा बलि की प्रार्थना सुनकर भगवान वामन बोले- राजन! मेरा वरदान है कि जो चतुर्दशी के दिन नरक के स्वामी यमराज को दीपदान करेंगे, उनके सभी पितर लोग कभी भी नरक में न रहेंगे और जो व्यक्ति इन तीन दिनों में दीपावली का उत्सव मनाएंगे, उन्हें छोड़कर मेरी प्रिय लक्ष्मी अन्यत्र न जाएंगी।
भगवान वामन द्वारा राजा बलि को दिए इस वरदान के बाद से ही नरक चतुर्दशी के व्रत, पूजन और दीपदान का प्रचलन आरंभ हुआ, जो आज तक चला आ रहा है।
Sunday, November 4, 2012
श्रीमद् भागवत में रास पंचध्यायी का उतना ही महत्व है जितना हमारे शरीर में आत्मा का। श्रीमद् भागवत में रास पंचध्यायी दसवें स्कंध में 29 से 33 अध्याय में है। भाईश्री ने रास लीला के अर्थ को इस लेख में समझाया है।
एक गोपी जो भगवान कृष्ण के प्रति कोई इच्छा नहीं रखती। वह सिर्फ कृष्ण को ही चाहती है। उनके साथ रास खेलना चाहती है। उसकी खुशी सिर्फ भगवान कृष्ण को खुश देखने में है।
भागवत में श्री शुकदेवजी कहते हैं श्रीकृष्ण वृंदावन के जंगलों में रास लीला करना चाहते थे। वास्तव में भगवान कुछ नहीं चाहता, वह तो स्वयं ही साध्य भी है, साधन भी।
वास्तव में रास क्या है? रास भगवान कृष्ण और कामदेव के बीच का युद्ध एक है। कामदेव ने जब भगवान शिव का ध्यान भंग कर दिया तो उसे खुद पर बहुत गर्व होने लगा। वो भगवान कृष्ण के पास जाकर बोला कि मैं आपसे भी मुकाबला करना चाहता हूं। भगवान ने उसे स्वीकृति दे दी। लेकिन कामदेव ने इस मुकाबले के लिए भगवान के सामने एक शर्त भी रख दी। कामदेव ने कहा कि इसके लिए आपको अश्विन मास की पूर्णिमा को वृंदावन के रमणीय जंगलों में स्वर्ग की अप्सराओं सी सुंदर गोपियों के साथ आना होगा। कृष्ण ने यह भी मान लिया। कामदेव ने कहा कि उसे अपने अनुकूल वातावरण भी चाहिए और उसके पिता मन भी वहां ना हों।
फिर जब तय शरद पूर्णिमा की रात आई। भगवान कृष्ण ने अपनी बांसुरी बजाई। बांसुरी की सुरीली तान सुनकर गोपियां अपनी सुध खो बैठीं। कृष्ण ने उनके मन मोह लिए। उनके मन में काम का भाव जागा, लेकिन ये काम कोई वासना नहीं थी, ये तो गोपियों के मन में भगवान को पाने की इच्छा थी।
आमतौर पर काम, क्रोध, मद, मोह और भय अच्छे भाव नहीं माने जाते हैं लेकिन जिसका मन भगवान ने चुरा लिया हो तो ये भाव उसके लिए कल्याणकारी हो जाते है। उदाहरण के लिए जैसे जिसके भी मन में भगवान कृष्ण थे, उसने क्रोध करके भगवान से युद्ध किया तो उसे मुक्ति ही मिली, जैसे कंस और शिशुपाल।
ऐसे ही गोपियों में जब कृष्ण के प्रति काम का संचार हुआ, वे उत्साहित हुईं और गहरी नींद से जाग गईं।
भगवान ने बांसुरी की तान पर हर एक गोपी को उसके नाम से पुकारा। हर गोपी ने ये सोचा कि उसने कृष्ण को मोहित किया है और वे बिना किसी को कहे, घर से जंगल के लिए निकल पड़ीं। जबकि रात में कोई गोपी अकेली जंगल में नहीं जा सकती थी।
एक स्त्री कई मर्यादाओं में बंधी होती है। लेकिन गोपियों के मन में जो प्रेम था उसने उन्हें डर के बावजूद हिम्मत दी। जहां डर और स्वार्थ हो, वहां ऐसे भाव को वासना कहा जाता है। रावण बहुत शक्तिशाली था लेकिन वासना के कारण, जब वो सीता का साधु के रुप में अपहरण करने गया तो पेड़ की सामान्य पत्तियों से भी डर रहा था। कागभुशुंडी गरुड़ से कहते हैं कि हे गरुड़, मनुष्य गलत रास्तों पर अपनी विवेक और ताकत खो देता है, उसके पास सिर्फ डर ही रह जाता है।
यहां गोपियों के मन में कोई भय नहीं था। क्यों? क्योंकि वे जानती थीं कि वे कोई गलत काम नहीं कर रही हैं। वे वो लक्ष्य प्राप्त करने जा रही है जिसके लिए जीव को जन्म मिलता है। श्रीकृष्ण के साथ रास खेलना यानी परमात्मा को प्राप्त करना है।
सभी गोपियों ने महसूस किया कि भगवान सिर्फ उन्हें ही पुकार रहे हैं। लेकिन वो एक नहीं थी, कई थीं। मतलब भगवान को पाने के रास्ते पर कई लोग चल रहे हैं और सभी यही सोचते हैं कि वे अपने दम पर चल रहे हैं। भगवान से हमारे रिश्ते में कोई गोपनीयता नहीं होती है लेकिन निजता जरूर होती है।
इसलिए, गोपियां डरी नहीं। उन्होंने अपना सबकुछ छोड़ दिया। घर, परिवार, रिश्ते-नाते, जमीन-जायदाद, सुख-शांति और वृंदावन के उस जंगल में पहुंच गईं, जहां कृष्ण थे। श्रीकृष्ण ने सभी गोपियों का स्वागत किया।
भगवान ने एक बातचीत के जरिए सबके मनोभावों को परखा। उनके निष्काम भावों से भगवान प्रसन्न हुए और उन्होंने गोपियों से कहा “आओ रास खेलें।”
Thursday, November 1, 2012
♥ जय श्री कृष्णा ♥
मेरा दिल तो देवाना है, मेरे राधा रमण का।
क्या रूप सुहाना है, मेरे राधा रमण का॥
संसार देवाना है, राधा रमण का॥
राधे राधे, राधे राधे, राधे राधे बोलो।
कृष्णा कृष्णा, कृष्णा कृष्णा, कृष्णा कृष्णा बोलो॥
मेरी रमण बिहारी की हर बात निराली है,
हर बोल तराना है, राधा रमण का॥
मदमस्त भरे नयना, अमृत जो बरसे,
ऐसा मुस्काना है, राधा रमण का॥
रिश्ता नहीं दो दिन का मेरा तो इन संग,
सदीओं से याराना है, मेरे राधा रमण का॥
यही आस बसूं ब्रिज में गुरुदेव कृपा से,
निसदिन गुण गाना है, मेरे राधा रमण का॥
—
मेरा दिल तो देवाना है, मेरे राधा रमण का।
क्या रूप सुहाना है, मेरे राधा रमण का॥
संसार देवाना है, राधा रमण का॥
राधे राधे, राधे राधे, राधे राधे बोलो।
कृष्णा कृष्णा, कृष्णा कृष्णा, कृष्णा कृष्णा बोलो॥
मेरी रमण बिहारी की हर बात निराली है,
हर बोल तराना है, राधा रमण का॥
मदमस्त भरे नयना, अमृत जो बरसे,
ऐसा मुस्काना है, राधा रमण का॥
रिश्ता नहीं दो दिन का मेरा तो इन संग,
सदीओं से याराना है, मेरे राधा रमण का॥
यही आस बसूं ब्रिज में गुरुदेव कृपा से,
निसदिन गुण गाना है, मेरे राधा रमण का॥
!!! कृष्णं वन्दे जगत गुरुं !!!
सुनो श्यामसुन्दर बिनती हमारी ।
दरसन को आया दरस भिखारी ॥
तेज भँवर में फँस गयी नैया, तू ही बता अब कौन खिवैया ।
कृष्ण कन्हैया गिरवर धारी, हे नटनागर कुँजबिहारी ॥
हे नाथ आकर अब तो सँभालो, डूबती नैया मोरी पार लगालो ।
तेरी शरण में मैं आया नटवर, तुझे लाज रखनी होगी हमारी ॥
तुझ बिना कोई न मेरा जहाँ में, जाऊँ कहाँ अब तू ही बता दे ।
मेरी लाज जावे तो जावे भले ही, मगर नाथ होगी हाँसी तुम्हारी ॥
सुनो श्यामसुन्दर बिनती हमारी ।
दरसन को आया दरस भिखारी ॥
तेज भँवर में फँस गयी नैया, तू ही बता अब कौन खिवैया ।
कृष्ण कन्हैया गिरवर धारी, हे नटनागर कुँजबिहारी ॥
हे नाथ आकर अब तो सँभालो, डूबती नैया मोरी पार लगालो ।
तेरी शरण में मैं आया नटवर, तुझे लाज रखनी होगी हमारी ॥
तुझ बिना कोई न मेरा जहाँ में, जाऊँ कहाँ अब तू ही बता दे ।
मेरी लाज जावे तो जावे भले ही, मगर नाथ होगी हाँसी तुम्हारी ॥
हे नाथ आकर अब तो सँभालो, डूबती नैया मोरी पार लगालो ।
तेरी शरण में मैं आया नटवर, तुझे लाज रखनी होगी हमारी ॥
तुझ बिना कोई न मेरा जहाँ में, जाऊँ कहाँ अब तू ही बता दे ।
मेरी लाज जावे तो जावे भले ही, मगर नाथ होगी हाँसी तुम्हारी ॥
वृन्दावन धाम अपार, जपे जा राधे राधे,
राधे सब वेदन को सार, जपे जा राधे राधे।
जपे जा राधे राधे, भजे जा राधे राधे.
राधा अलबेली सरकार, जपे जा राधे राधे॥
जो राधा राधा गावे, वो प्रेम पदार्थ पावे।
वाको है जावे बेडा पार, जपे जा राधे राधे॥
वृन्दावन में राधे राधे, यमुना तट पे, राधे राधे...
जय राधे राधे, राधे राधे...
जो राधा राधा नाम ना तो, रसराज बिचारो रोते।
नहीं होतो कृष्ण अवतार, जपे जा राधे राधे॥
बंसिवत पे राधे राधे, श्री निधिबन में राधे राधे...
जय राधे राधे, राधे राधे...
यह वृन्दावन की लीला, मत जानो गुड को चीला।
यामे ऋषि मुनि गए हार, जपे जा राधे राधे॥
जो राधा राधा गावे, वो प्रेम पदार्थ पावे।
वाको है जावे बेडा पार, जपे जा राधे राधे॥
वृन्दावन में राधे राधे, यमुना तट पे, राधे राधे...
जय राधे राधे, राधे राधे...
जो राधा राधा नाम ना तो, रसराज बिचारो रोते।
नहीं होतो कृष्ण अवतार, जपे जा राधे राधे॥
बंसिवत पे राधे राधे, श्री निधिबन में राधे राधे...
जय राधे राधे, राधे राधे...
यह वृन्दावन की लीला, मत जानो गुड को चीला।
यामे ऋषि मुनि गए हार, जपे जा राधे राधे॥
♥♥♥ जय जय श्री कृष्ण ♥♥♥
मोहन से दिल क्यूँ लगाया है, यह मैं जानू या वो जाने ।
छलिया से दिल क्यूँ लगाया है, यह मैं जानू या वो जाने ॥
हर बात निराली है उसकी, कर बात में है इक टेडापन ।
टेड़े पर दिल क्यूँ आया है, यह मैं जानू या वो जाने ॥
जितना दिल ने तुझे याद किया, उतना जग ने बदनाम किया ।
बदनामी का फल क्या पाया हैं, यह मैं जानू या वो जाने ॥
तेरे दिल ने दिल दीवाना किया, मुझे इस जग से बेगाना किया ।
मैंने क्या खोया क्या पाया हैं, यह मैं जानू या वो जाने ॥
मिलता भी है वो मिलता भी नहीं, नजरो से मेरी हटता भी नहीं ।
यह कैसा जादू चलाया है, यह मैं जानू या वो जाने ॥
टेड़े पर दिल क्यूँ आया है, यह मैं जानू या वो जाने ॥
जितना दिल ने तुझे याद किया, उतना जग ने बदनाम किया ।
बदनामी का फल क्या पाया हैं, यह मैं जानू या वो जाने ॥
तेरे दिल ने दिल दीवाना किया, मुझे इस जग से बेगाना किया ।
मैंने क्या खोया क्या पाया हैं, यह मैं जानू या वो जाने ॥
मिलता भी है वो मिलता भी नहीं, नजरो से मेरी हटता भी नहीं ।
यह कैसा जादू चलाया है, यह मैं जानू या वो जाने ॥
Wednesday, October 31, 2012
है आँख वो जो श्याम का दर्शन किया करे,
है शीश जो प्रभु चरण में वंदन किया करे...
बकार वो मुख है जो व्यर्थ बातों में,
मुख है वो जो हरिनाम का सुमिरण किया करे...
हीरे मोती से नहीं शोभा है हाथ की,
... है हाथ जो भगवान् का पूजन किया करे...
मर के भी अमर नाम है उस जीव का जग में,
प्रभु प्रेम में बलिदान जो जीवन किया करे...
♥ ♥जय श्रीकृष्णा ♥ ♥
श्यामा तेरी यादों में जो अश्क बहते है ,
ये मेरे अंग का अनमोल रत्न है ,
इसे में अपने आँखों में समाये रखना चाहूंगी ज़िन्दगी
भर ,अश्क बहार आये अगर तेरी यादों में मोती बनकर ,
उस अश्क को में कभी बहने न दूंगी ,
ये मेरा वादा है !!
दोस्तों इस अनमोल रत्न को अगर कोई संभाल कर
रखे तो उसके ज़िन्दगी में कभी कोई दुःख नाम का चीज़
नहीं रहेगा !!
~ ~ जय श्री कृष्ण ~ ~
Thursday, October 25, 2012
हिंदू
पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी
कहते हैं। इस एकादशी के दिन मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु
कीपूजा की जाती है। इस बार यह एकादशी 25 अक्टूबर, गुरुवार को है।
धर्म
ग्रंथों के अनुसार जो मनुष्य कठिन तपस्याओं के द्वारा फल प्राप्त करते है,
वही फल इस एकादशी के दिन शेषनाग पर शयन करने वाले श्री विष्णु को नमस्कार
करने से ही मिल जाते हैं और मनुष्य को यमलोक के दु:ख नहीं भोगने पड़ते हैं।
यह एकादशी उपवासक के मातृपक्ष के दस और पितृपक्ष के दस पितरों को विष्णु
लोक लेकर जाती है। इस व्रत की कथा इस प्रकार है-
प्राचीन समय में
विंध्य पर्वत पर क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था। वह बड़ा क्रूर था। उसका
सारा जीवन पाप कर्मों में बीता। जब उसका अंत समय आया तो वह मृत्यु-भय से
कांपता हुआ महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचकर याचना करने लगा- हे ऋषिवर,
मैंने जीवन भर पाप कर्म ही किए हैं। कृपा कर मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं
जिससे मेरे सारे पाप मिट जाएं और मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। उसके निवेदन पर
महर्षि अंगिरा ने उसे पापांकुशा एकादशी का व्रत करने को कहा। महर्षि
अंगिरा के कहे अनुसार उस बहेलिए ने पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत किया और
किए गए सारे पापों से छुटकारा पा लिया।
Wednesday, October 24, 2012
रधिका पास आकर बोली...
आज फ़िर से उल्झन मे हू स्वामी
कहा आज फ़िर किसी ने
कोई और है कृष्णा की पटरानी...
क्यु भ्रम मे हो कि कृष्णा तुम्हारा है
रास रचाये गोपियो संग
मीरा का प्यारा है.
आज प्रीत की पूछ नही
ये सब कह्ते है
व्यथित मन के देख सवाल
कृष्णा मुस्कराते है...
बोली राधा
सुनो प्रिये..
तुम यु ना मुस्कराओ
मेरे अनुत्रित प्रेश्नो का
कुछ समाधान बताओ
कहा कृष्णा ने "हे राधे"
सुनो ध्यान से
जो कह्ता हू.
राधे शब्द का आज अर्थ बतलाता हू..
रुक्मनि, सत्याभामा है मुझ्को प्यारी
लेकिन राधे शब्द के आगे हर कोई हारी...
" बिना राधे. श्याम आधे"
ये मूल जीवन का
अगर समझ लो तुम इसको
तो कृष्णा तुम्हारा है..
न लेगा कोई नाम मेरा
बिना तुम्हे याद किये-
आज फ़िर से उल्झन मे हू स्वामी
कहा आज फ़िर किसी ने
कोई और है कृष्णा की पटरानी...
क्यु भ्रम मे हो कि कृष्णा तुम्हारा है
रास रचाये गोपियो संग
मीरा का प्यारा है.
आज प्रीत की पूछ नही
ये सब कह्ते है
व्यथित मन के देख सवाल
कृष्णा मुस्कराते है...
बोली राधा
सुनो प्रिये..
तुम यु ना मुस्कराओ
मेरे अनुत्रित प्रेश्नो का
कुछ समाधान बताओ
कहा कृष्णा ने "हे राधे"
सुनो ध्यान से
जो कह्ता हू.
राधे शब्द का आज अर्थ बतलाता हू..
रुक्मनि, सत्याभामा है मुझ्को प्यारी
लेकिन राधे शब्द के आगे हर कोई हारी...
" बिना राधे. श्याम आधे"
ये मूल जीवन का
अगर समझ लो तुम इसको
तो कृष्णा तुम्हारा है..
न लेगा कोई नाम मेरा
बिना तुम्हे याद किये-
Thursday, October 11, 2012
चरणामृत का क्या महत्व है?
अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है.
क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की.
कि चरणामृतका क्या महत्व है.
शास्त्रों में कहा गया है
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।
"अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप- व्याधियोंका शमन करने वाला है तथा औषधी के समान है।
जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता"
जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता,
जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है.
जब भगवान का वामन अवतार हुआ,
और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए तब उन्होंने तीन पग में तीन
लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के लोक नाप लिए और दूसरे मेंऊपर
के लोक नापने लगे तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया तो ब्रह्मा जी ने
अपने कमंडलु में से जल लेकर
भगवान के चरण धोए और फिर चरणामृत
को वापस अपने
कमंडल में रख लिया.
वह चरणामृत गंगा जी बन गई,
जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है,
ये शक्ति उनके पास कहाँ से आई ये शक्ति है भगवान के चरणों की.
जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी .
जब हम बाँके बिहारी जी की आरती गाते है तो कहते है -
"चरणों से निकली गंगा प्यारी जिसने सारी दुनिया तारी "
धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन
किया जाता है।
चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।
कहते हैं भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर
केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी
तार दिया।
चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं चिकित्सकीय भी है।
चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।
आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है।
उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते।
इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है।
तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए।
ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि, स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।
इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधी के समान है। यदि उसमें
तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती
है।
कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ
काम या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है। इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ
से लेना चाहिये, लेकिन चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि
वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं।
चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं?
दरअसल शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है।
कहते हैं इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है।
इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए।.
Wednesday, October 10, 2012
""कान्हा जी हमे अपनी पायल नही तो
पायल का एक घुँघरू ही बना लो
और उसे अपने चरणकमलों से लगा लो
कान्हा जी हमे अपने कंगन नही तो
कंगन में जड़ा हुआ एक पत्थर ही बना दो
और उसे अपनी प्यारी कलाईयों में सजा लो
कान्हा जी हमे अपनी मुरली नही तो
अपनी मुरली की कोई धुन ही बना लो
और उसे अपने अधरों से इक बार तो बजा लो
कान्हा जी और कुछ नही तो अपने
चरणों की धूल ही बना लो
वो चरणधूल फिर ब्रज में उड़ा दो
सच कहूँ मेरे कान्हा जी देखना फिर
चरणों की धूलकण बन कैसे इतराऊँ मै.....""
ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है
यहां सर दे के होते हैं सौदे, आशिकी इतनी सस्ती नहीं है
प्रेम वालों ने कब वक्त पूछा
उनकी पूजा में, सुन ले ऐ उद्धव
यहां दम दम में होती है पूजा
सर झुकाने की फुर्सत नहीं है
ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है !!
जो असल में हैं मस्ती में डूबे
उन्हें क्या परवाह ज़िंदगी की
जो उतरती है, चढ़ती है मस्ती
वो हकीकत में मस्ती नहीं है
ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है !!
जिसकी नज़रों में हैं श्याम प्यारे
वो तो रहते हैं जग से न्यारे
जिसकी नज़रों में मोहन समाये
वो नज़र फिर तरसती नहीं है
ये तो प्रेम की बात है ऊद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है !!
यहां सर दे के होते हैं सौदे, आशिकी इतनी सस्ती नहीं है
!!!!!!!!!!!!! HARE KRISHNA!!!!!!
Friday, September 28, 2012
भाद्रमास मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी अनन्त चतुर्दशी के रूप में मनाई जाती है। इस दिन भगवान अनन्त की पूजा की जाती है। इस दिन महिलाएं सौभाग्य की रक्षा एवं सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं। दस दिवसीय गणेशोत्सव की समापन भी इसी दिन होता है। इस बार अनन्त चतुर्दशी का पर्व 29 सितंबर, शनिवार को है।
व्रत विधि
इस दिन व्रती (व्रत करने वाला) को सुबह व्रत के लिए संकल्प लेना चाहिए व भगवान विष्णु की पूजा करना चाहिए। भगवान विष्णु के सामने 14 ग्रंथियुक्त अनन्त सूत्र (14 गांठ युक्त धागा, जो बाजार में आसानी से मिल जाता है) को रखकर भगवान विष्णु के साथ ही उसकी भी पूजा करनी चाहिए। पूजा में रोली, मोली, चंदन, फूल, अगरबत्ती, धूप, दीप, नैवेद्य आदि का प्रयोग करना चाहिए और प्रत्येक को समर्पित करते समय ऊँ अनन्ताय नम: का जप करना चाहिए।
पूजा के बाद यह प्रार्थना करें-
नमस्ते देवदेवेशे नमस्ते धरणीधर।
नमस्ते सर्वनागेंद्र नमस्ते पुरुषोत्तम।।
न्यूनातिरिक्तानि परिस्फुटानि
यानीह कर्माणि मया कृतानि।
सर्वाणि चैतानि मम क्षमस्व
प्रयाहि तुष्ट: पुनरागमाय।।
दाता च विष्णुर्भगवाननन्त:
प्रतिग्रहीता च स एव विष्णु:।
तस्मात्तवया सर्वमिदं ततं च
प्रसीद देवेश वरान् ददस्व।।
प्रार्थना के पश्चात कथा सुनें तथा रक्षासूत्र पुरुष दाएं हाथ में और महिलाएं बाएं हाथ में बांध लें। रक्षासूत्र बांधते समय इस मंत्र का जप करें-
अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान् समभ्युद्धर वासुदेव।
अनन्तरूपे विनियोजितात्मामाह्यनन्तरूपाय नमोनमस्ते।।
इसके बाद ब्राह्मण को भोजन कराकर व दान देने के बाद स्वयं भोजन करें। इस दिन नमक रहित भोजन करना चाहिए।
Tuesday, September 25, 2012
भादौ
मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी, जयझूलनी, वामन, डोल ग्यारस व
अन्य कई नामों से जाना जाता है। इस बार यह एकादशी 26 अगस्त, बुधवार को है।
परिवर्तिनी एकादशी के व्रत की विधि इस प्रकार है-
परिवर्तिनी एकादशी
व्रत का नियम पालन दशमी तिथि (25 सितंबर, मंगलवार) की रात्रि से ही शुरु
करें व ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन सुबह नित्य कर्मों से
निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनकर भगवान वामन की प्रतिमा के सामने बैठकर व्रत
का संकल्प लें। इस दिन यथासंभव उपवास करें। उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करें
संभव न हो तो एक समय फलाहारी कर सकते हैं।
इसके बाद भगवान वामन की
पूजा विधि-विधान से करें।(यदि आप पूजन करने में असमर्थ हों तो पूजन किसी
योग्य ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं।) भगवान वामन को पंचामृत से स्नान
कराएं। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और
परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़कें और उस चरणामृत को पीएं। इसके
बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित
करें।
विष्णु सहस्त्रनाम का जप एवं भगवान वामन की कथा सुनें। रात
को भगवान वामन की मूर्ति के समीप हो सोएं और दूसरे दिन यानी द्वादशी के दिन
वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करें। जो
मनुष्य यत्न के साथ विधिपूर्वक इस व्रत को करते हुए रात्रि जागरण करते हैं,
उनके समस्त पाप नष्ट होकर अंत में वे स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं। इस
एकादशी की कथा के श्रवणमात्र से वाजपेई यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
परिवर्तिनी एकादशी व्रत का नियम पालन दशमी तिथि (25 सितंबर, मंगलवार) की रात्रि से ही शुरु करें व ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनकर भगवान वामन की प्रतिमा के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें। इस दिन यथासंभव उपवास करें। उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करें संभव न हो तो एक समय फलाहारी कर सकते हैं।
इसके बाद भगवान वामन की पूजा विधि-विधान से करें।(यदि आप पूजन करने में असमर्थ हों तो पूजन किसी योग्य ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं।) भगवान वामन को पंचामृत से स्नान कराएं। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़कें और उस चरणामृत को पीएं। इसके बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित करें।
विष्णु सहस्त्रनाम का जप एवं भगवान वामन की कथा सुनें। रात को भगवान वामन की मूर्ति के समीप हो सोएं और दूसरे दिन यानी द्वादशी के दिन वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करें। जो मनुष्य यत्न के साथ विधिपूर्वक इस व्रत को करते हुए रात्रि जागरण करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट होकर अंत में वे स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवणमात्र से वाजपेई यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
Sunday, September 23, 2012
भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को श्रीराधाजन्माष्टमी का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इसी दिन श्रीकृष्णप्रिया श्रीराधिकाजी का जन्म वृषभानुपुरी नामक नगर में हुआ था। धर्म शास्त्रों के अनुसार वृषभानुपुरी के राजा वृषभानु शास्त्रों के ज्ञाता तथा श्रीकृष्ण के आराधक थे। उनकी पत्नी श्रीकीर्तिदा के गर्भ से भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मध्याह्न काल में श्रीराधिकाजी का जन्म हुआ था। इस बार यह पर्व 23 सितंबर, रविवार को है।
व्रत विधान
श्रीराधाजन्माष्टमी के दिन व्रत रखकर उनकी पूजा करें। श्रीराधाकृष्ण के मंदिर में ध्वजा, पुष्पमाला, वस्त्र, तोरण आदि अर्पित करें तथा श्रीराधाकृष्ण की प्रतिमा को सुगंधित पुष्प, धूप, गंध आदि से सुसज्जित करें। मंदिर के बीच में पांच रंगों से मंडप बनाकर उसके अंदर सोलह दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं। उस कमलयंत्र के बीच में श्रीराधाकृष्ण की युगल मूर्ति पश्चिम दिशा में मुख कर स्थापित करें तत्पश्चात अपनी शक्ति के अनुसार पूजा की सामग्री से उनकी पूजा अर्चना कर नैवेद्य चढ़ाएं। दिन में इस प्रकार पूजा करने के पश्चात रात में जागरण करें। जागरण के दौरान भक्तिपूर्वक श्रीकृष्ण व राधा के भजनों को सुनें।
शास्त्रों के अनुसार जो मनुष्य इस प्रकार श्रीराधाष्टमी का व्रत करता है उसके घर सदा लक्ष्मी निवास करती है। यह व्रत सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला है। जो भक्त इस व्रत को करते हैं उसे विष्णुलोक में स्थान मिलता है।
भाद्र मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को कृष्ण प्रिया राधाजी का जन्म हुआ था,अत: यह दिन राधाष्टमी के रूप में मनाया जाता है।
बरसाना को राधा जी की जन्मस्थली माना जाता है।
बरसाना
मथुरा से 50 कि.मी. दूर उत्तर-पश्चिम में और गोवर्धन से 21 कि.मी. दूर
उत्तर में स्थित है। यह भगवान श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा जी की जन्म स्थली
है। यह पर्वत के ढ़लाऊ हिस्से में बसा हुआ है। इस पर्वत को ब्रह्मा पर्वत
के नाम से जाना जाता है।
बरसाना में राधा-कृष्ण भक्तों का सालों भर
तांता लगा रहता है। श्रद्धालु इस दिन बरसाना की ऊँची पहाड़ी पर स्थित गहवर
वन की परिक्रमा करते हैं तथा लाडली जी राधारानी के मंदिर में दर्शन कर खुशी
मनाते हैं।
दिन के अलावा पूरी रात बरसाना में गहमागहमी रहती है। विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन किए जाते हैं।
ब्रज भूमि पर ही भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था और यहीं पर उन्होंने अपना यौवन बिताया।
जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो ! मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो !!
तन्हाई की कब्रों में अब,दफ़्न हुए सारे अरमां !
दम निकले उसकी चरणों में,घर में जिसके राधा पूजा हो !
जीवन के धुंधले दर्पण में ,पास न कोई दूजा हो !
मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो !!
पंकज पथिक प्रेम का मारा,अथाह नीर में कुम्हलाया !
नैवेद्य- पात्र में उसे सजा लो,जब भी कोई राधा पूजा हो !
जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !
मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो !!
अस्तित्व हीन पंकज पूजा बिन,पंकज बिन सूनी पूजा !
खो जाओ एक दूजे में तुम,जहाँ भी पावन राधा पूजा हो !
जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !
मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो !!
कीचड़ का मै रहने वाला,तूं है प्रमाणशासनेश्वरी !
एक राह के दोनों राही,तुम ही तो मेरी पूजा हो !
जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !
मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो !!
प्रेम राग हर दिशि में गूंजे,हो जाये जग मतवाला !
“राह” की बस अर्ज़ यही है,घर-घर प्रेम की पूजा हो !
जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !
मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में राधा पूजा हो_______
Friday, September 21, 2012
"ये जीवन समर्पित,चरण में तुम्हारे"|
"हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणों में"
..
अपने चरणों की रज , सावरे दीजिये ,,,
जिंदगी ये हमारी ,सवर जायेगी ...
लाख अवगुण भरे है ,गिनाये तो क्या ..
शर्म खुद पर बहुत है , बताये तो क्या ...
माफ़ गर ना करोगे ,दयालु हमे ..
जिंदगी ये हमारी , बिखर जायेगी ..
अपने चरणों ....
आप दाता दयावान दानी बड़े ...
कितने पापी चरण राज को पाकर तरे ...
महिमा चरणों की , भगवन है मालुम हमें ..
राह सत्संग की , हमको भी मिल जायेगी ..
अपने चरणों ...
अब निभालो निभालो , कन्हैया हमे ...
अपने चरणों से ,अब तो लगालो हमे ...
'नन्दू' वादा करे सावरे हम खड़े ..
उम्र दर पे तुम्हारे गुजर जायेगी ...
अपने चरणों .
लाख अवगुण भरे है ,गिनाये तो क्या ..
शर्म खुद पर बहुत है , बताये तो क्या ...
माफ़ गर ना करोगे ,दयालु हमे ..
जिंदगी ये हमारी , बिखर जायेगी ..
अपने चरणों ....
आप दाता दयावान दानी बड़े ...
कितने पापी चरण राज को पाकर तरे ...
महिमा चरणों की , भगवन है मालुम हमें ..
राह सत्संग की , हमको भी मिल जायेगी ..
अपने चरणों ...
अब निभालो निभालो , कन्हैया हमे ...
अपने चरणों से ,अब तो लगालो हमे ...
'नन्दू' वादा करे सावरे हम खड़े ..
उम्र दर पे तुम्हारे गुजर जायेगी ...
अपने चरणों .
Saturday, September 15, 2012
शास्त्रों के अनुसार तुलसी का पौधा पवित्र और पूजनीय माना गया है। जिन लोगों के घर में तुलसी का पौधा होता है उन्हें कई प्रकार के चमत्कारी फायदें प्राप्त होते हैं।
तुलसी को संजीवनी बूटी भी कहा जाता है। इसका उपयोग कई प्रकार की औषधियों में किया जाता है।
तुलसी के पत्ते भोजन को शुद्ध और पवित्र करते हैं। इसीलिए सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण के समय भोजन में तुलसी के पत्ते डालें जाते हैं।
शास्त्रों के अनुसार इंसान की मृत्यु के बाद शव के मुख में तुलसी के पत्ते डाले जाते हैं। इस संबंध में ऐसा माना जाता है कि इससे मृत व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है।
तुलसी घर-आंगन में होने से वातावरण शुद्ध और पवित्र बना रहता है। इस पौधे से कई प्रकार के वास्तु दोष भी समाप्त हो जाते हैं।
जिस घर में तुलसी का पौधा होता है वहां सभी देवी-देवताओं की कृपा बरसती है। घर-परिवार के सदस्यों की नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा होती है।
लसी के पौधे में प्रतिदिन पानी देने और उसकी कांट-छांट करने, उसका ध्यान रखने से त्वचा संबंधी कई बीमारियां में लाभ होता है।
तुलसी के पत्तों को दांतों से चबाकर नहीं खाना चाहिए, बल्कि उसे निगल लेना चाहिए। तुलसी के पत्तों में एक विशेष प्रकार का अम्ल होता है जो कि हमारे दांतों के लिए अच्छा नहीं होता।
पानी में तुलसी के पत्ते डालकर पीने से पानी एक टॉनिक का काम करता है। इससे कई प्रकार के रोगों में राहत मिलती है।
बिना उपयोग तुलसी के पत्ते कभी नहीं तोडऩा चाहिए। ऐसा करने पर व्यक्ति को दोष लगता है। अनावश्यक रूप से तुलसी के पत्ते तोडऩा तुलसी को नष्ट करने के समान माना गया है।
Friday, September 14, 2012
बंसी की धुन पे नाची रे राधा हो के दीवानी,
काहना के रंग रच गयी राधा रानी।
किसना के तन मन बस गयी रे राधा हो के दीवानी॥
मोहन के नैनो में भरी मधुशाला।
दो घुट आँखो से पी गयी रे, राधा हो के दीवानी॥
गिरधर मुरारी का चंदा सा मुखड़ा।
देखा तो सुध बुध खो गयी रे, राधा हो के दीवानी॥
मोर मुकुट धर सांवर सांवरिया।
बांकी सी चित हर गयी रे, राधा हो के दीवानी॥
माधव के माथे पे लत घुंघराली।
घुंघराली लत में सिमट गयी रे राधा हो गयी दीवानी
गिरधर मुरारी का चंदा सा मुखड़ा।
देखा तो सुध बुध खो गयी रे, राधा हो के दीवानी॥
मोर मुकुट धर सांवर सांवरिया।
बांकी सी चित हर गयी रे, राधा हो के दीवानी॥
माधव के माथे पे लत घुंघराली।
घुंघराली लत में सिमट गयी रे राधा हो गयी दीवानी
Wednesday, September 12, 2012
पुराने समय से ही हिन्दू धर्म में तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना जाता है। घर के आंगन में तुलसी का पौधा हो तो घर का कलह और अशांति दूर होती है। इसके साथ ही तुलसी का पौधा होने पर घर-परिवार में महालक्ष्मी की विशेष कृपा भी रहती है। शास्त्रों में भगवान विष्णु और तुलसी के विवाह का वर्णन मिलता है। इस कारण तुलसी को विष्णुप्रिया भी कहा जाता है।'
तुलसी का पौधा पूज्य और पवित्र तो है साथ ही इसमें कई आयुर्वेदिक गुण भी हैं। तुलसी के औषधीय गुणों से कफ आदि रोगों में बचाव हो जाता है।
शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसलिए तुलसी के पत्तों का सेवन प्रतिदिन करना चाहिए। तुलसी के पत्तों का सेवन करने का भी एक खास तरीका है। इस तरीके से ही तुलसी का सेवन करना चाहिए अन्यथा इसके बुरे प्रभाव का सामना करना पड़ सकता है।
शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसलिए तुलसी के पत्तों का सेवन प्रतिदिन करना चाहिए। तुलसी के पत्तों का सेवन करने का भी एक खास तरीका है। इस तरीके से ही तुलसी का सेवन करना चाहिए अन्यथा इसके बुरे प्रभाव का सामना करना पड़ सकता है।
तुलसी के पत्तों में पारा धातु भी विद्यमान होती है जो कि पत्तों को चबाने से दांतों पर लगती है। यह हमारे दांतों के लिए फायदेमंद नहीं है। इससे दांत और मुंह से संबंधित रोग का खतरा बना रहता है। अत: तुलसी के पत्तों को बिना चबाए निगलना चाहिए।
Tuesday, September 11, 2012
त्रेतायुग में मयार्दापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने बतौर राजा जिस तरह शासन व्यवस्था स्थापित की, वह आज भी रामराज्य नाम से भगवान राम की तरह ही आदर्श व लोकप्रिय है। यह शासन व्यवस्था खुशहाल जीवन का भी आदर्श बन गई। यही वजह है कि व्यावहारिक तौर पर परिवार, समाज या राज्य में सुख और सुविधाओं से भरी व्यवस्था के लिए आज भी इसी रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है।
अक्सर जिस रामराज्य को केवल सुख-सुविधाओं का पर्याय माना जाता है। असल में, वह केवल सुविधाओं के नजरिए से ही नहीं बल्कि उसमें रहने वाले नागरिकों के साफ-सुथरे आचरण, व्यवहार, सोच और मर्यादाओं के पालन की वजह से भी श्रेष्ठ शासन व्यवस्था थी।
शास्त्रों के मुताबिक रामराज्य से जुड़ी कुछ खास बातें, जो धर्म के पैमाने पर आदर्श और हर काल में अपनाने के लिए बेहतर हैं, किंतु कलियुग में हावी अधर्म से या यूं कहें कि आज के भागदौड़ भरे जीवन में धर्म से बनी दूरी से हैरान करने वाली भी लगती हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने स्वयं रामचरित मानस में कहा है - दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहहिं काहुहि ब्यापा।। इस चौपाई के मुताबिक राम राज्य में शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक तीनों ही दु:ख नहीं थे।
(1)मान्यता यह भी है कि पर्वतों ने अपनी सभी संपत्ति, मणि आदि और सागर ने रत्न, मोती रामराज्य के लिए दे दिए। इसलिए वहां के नागरिक शौक-मौज के जीवन की लालसा नहीं रखते थे बल्कि कर्तव्य परायण और संतोषी थे। (2)रामराज्य में कोई भी गरीब नहीं था। रामराज्य में कोई मुद्रा भी नहीं थी। माना जाता है कि सभी जरूरत की चीजों का बिना कीमत के लेन-देन होता था। अपनी जरूरत के मुताबिक कोई भी किसी भी वस्तु को ले सकता था। इसलिए बंटोरने की लालसा रामराज्य के लोगों में नहीं थी। (3) राम राज्य में रहने वाला हर नागरिक उत्तम चरित्र का था। (4)सभी नागरिक आत्म अनुशासित थे, वे शास्त्रो व वेदों के नियमों का पालन करते थे,जिससे वह सेहतमंद व निडर रहने के तनाव, शोक व हर परेशानियों से दूर रहते थे। (5)सभी नागरिक बुरी आदतों और विकारों से यानी वह काम, क्रोध व मद से दूर थे। (6) नागरिकों का एक-दूसरे के लिए ईर्ष्या या शत्रु भाव नहीं था। इसलिए सभी को एक-दूसरे से अपार प्रेम भी था। (7) सभी नागरिक विद्वान, शिक्षित, कार्य कुशल, गुणी और बुद्धिमान थे। (8)सभी धर्म और धार्मिक कर्मों में लीन और निस्वार्थ भाव से भरे थे। (9)रामराज्य में सभी नागरिकों के परोपकारी होने से सभी मन और आत्मा के स्तर पर शांत ही नहीं बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी शांति और सुकून से रहते थे।
अक्सर जिस रामराज्य को केवल सुख-सुविधाओं का पर्याय माना जाता है। असल में, वह केवल सुविधाओं के नजरिए से ही नहीं बल्कि उसमें रहने वाले नागरिकों के साफ-सुथरे आचरण, व्यवहार, सोच और मर्यादाओं के पालन की वजह से भी श्रेष्ठ शासन व्यवस्था थी।
शास्त्रों के मुताबिक रामराज्य से जुड़ी कुछ खास बातें, जो धर्म के पैमाने पर आदर्श और हर काल में अपनाने के लिए बेहतर हैं, किंतु कलियुग में हावी अधर्म से या यूं कहें कि आज के भागदौड़ भरे जीवन में धर्म से बनी दूरी से हैरान करने वाली भी लगती हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने स्वयं रामचरित मानस में कहा है - दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहहिं काहुहि ब्यापा।। इस चौपाई के मुताबिक राम राज्य में शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक तीनों ही दु:ख नहीं थे।
(1)मान्यता यह भी है कि पर्वतों ने अपनी सभी संपत्ति, मणि आदि और सागर ने रत्न, मोती रामराज्य के लिए दे दिए। इसलिए वहां के नागरिक शौक-मौज के जीवन की लालसा नहीं रखते थे बल्कि कर्तव्य परायण और संतोषी थे। (2)रामराज्य में कोई भी गरीब नहीं था। रामराज्य में कोई मुद्रा भी नहीं थी। माना जाता है कि सभी जरूरत की चीजों का बिना कीमत के लेन-देन होता था। अपनी जरूरत के मुताबिक कोई भी किसी भी वस्तु को ले सकता था। इसलिए बंटोरने की लालसा रामराज्य के लोगों में नहीं थी। (3) राम राज्य में रहने वाला हर नागरिक उत्तम चरित्र का था। (4)सभी नागरिक आत्म अनुशासित थे, वे शास्त्रो व वेदों के नियमों का पालन करते थे,जिससे वह सेहतमंद व निडर रहने के तनाव, शोक व हर परेशानियों से दूर रहते थे। (5)सभी नागरिक बुरी आदतों और विकारों से यानी वह काम, क्रोध व मद से दूर थे। (6) नागरिकों का एक-दूसरे के लिए ईर्ष्या या शत्रु भाव नहीं था। इसलिए सभी को एक-दूसरे से अपार प्रेम भी था। (7) सभी नागरिक विद्वान, शिक्षित, कार्य कुशल, गुणी और बुद्धिमान थे। (8)सभी धर्म और धार्मिक कर्मों में लीन और निस्वार्थ भाव से भरे थे। (9)रामराज्य में सभी नागरिकों के परोपकारी होने से सभी मन और आत्मा के स्तर पर शांत ही नहीं बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी शांति और सुकून से रहते थे।
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